MP सिविल जज परीक्षा को लेकर विक्रांत भूरिया का हमला, 'BJP और उसके सिस्टम को एक भी काबिल आदिवासी...'
MP News: आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने आरोप लगाते हुए कहा कि आदिवासियों को सिस्टमैटिक तरीके से सिस्टम से बाहर किया जा रहा है. 2022 सिविल जज परीक्षा वापस हो.

मध्य प्रदेश में आदिवासियों के मुद्दे पर कांग्रेस ने बीजेपी और राज्य की सरकार को घेरा है. आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधायक विक्रांत भूरिया ने कहा कि मध्य प्रदेश में 2 करोड़ के करीब आदिवासी हैं, लेकिन सिविल जज परीक्षा 2022 का रिजल्ट दिखाता है कि BJP और उसके सिस्टम को एक भी काबिल आदिवासी नहीं मिला. इस परीक्षा में 121 सीट आदिवासियों के लिए आरक्षित थीं, लेकिन एक का भी सिलेक्शन नहीं हुआ. उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि आदिवासियों को सिस्टमैटिक तरीके से सिस्टम से बाहर किया जा रहा है. 2022 सिविल जज परीक्षा वापस हो और इसकी उच्च स्तरीय जांच हो.
उन्होंने कहा, ''साल 2021 से अभी तक एक भी आदिवासी का सिलेक्शन नहीं हुआ है. इन 191 पोस्ट में एससी से सिर्फ एक अभ्यार्थी का सेलेक्शन हुआ है. न तो एसटी कैंडिडेट का सेलेक्शन हो रहा है और न ही एससी का सेलेक्शन हो रहा है. तो क्या ये आरक्षण को ख़त्म करने का एक षड्यंत्र है. क्या आदिवासियों के लिए पूरे सिस्टम का दरवाजा बंद कर दिया गया है. आदिवासियों के लिए माइग्रेंट पॉलिसी बननी चाहिए.''
मध्य प्रदेश में 2 करोड़ के करीब आदिवासी हैं, लेकिन सिविल जज परीक्षा 2022 का रिजल्ट दिखाता है कि BJP और उसके सिस्टम को एक भी काबिल आदिवासी नहीं मिला।
— Congress (@INCIndia) November 21, 2025
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2 करोड़ आदिवासियों के प्रतिनिधित्व की लड़ाई- विक्रांत भूरिया
विक्रांत भूरिया ने ये भी कहा, ''ये रिजल्ट तो यही दिखाता है कि आदिवासियों को सिस्टमैटिक तरीके से सिस्टम से बाहर किया जा रहा है. यह सिस्टमैटिक भेदभाव है. मध्य प्रदेश में ये 121 सीटों की लड़ाई नहीं है. ये मध्य प्रदेश के 2 करोड़ आदिवासियों के प्रतिनिधित्व की लड़ाई है और इसे पूरी ताकत से हमलोग आखिरी दम तक लड़ेंगे.''
'SIR में जल्दबाजी से आदिवासियों को ज्यादा नुकसान'
इसके साथ ही उन्होंने SIR का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा, ''SIR में की गई जल्दबाजी से आदिवासियों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर राज्यों में आदिवासी पलायन पर हैं. हालात ये हैं कि 70% से ज्यादा गांव खाली पड़े हुए हैं, ये सरकार आदिवासियों को रोजगार नहीं दे पाई. SIR की प्रक्रिया जानबूझकर ऐसे समय में की गई, जब आदिवासी घरों में नहीं हैं. ये आदिवासियों को सिस्टमैटिक तरीके से वोटिंग प्रक्रिया से बाहर करने की साजिश है.''
SIR में की गई जल्दबाजी से आदिवासियों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है।
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ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर राज्यों में आदिवासी पलायन पर हैं। हालात ये हैं कि 70% से ज्यादा गांव खाली पड़े हुए हैं, ये सरकार आदिवासियों को रोजगार नहीं दे पाई।
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'कॉर्पोरेट घरानों के फायदे के लिए पेड़ों को काटा जा रहा'
कांग्रेस नेता ने आगे कहा, ''मध्य प्रदेश के सिंगरौली को छावनी में तब्दील किया गया है. बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों के फायदे के लिए वहां लगातार पेड़ों को काटा जा रहा है. पुलिस को एजेंट बना दिया गया है. हजारों आदिवासियों को नोटिस भेजे जा रहे हैं. लोगों को जिला बदर किया जा रहा है. ये PESA कानून और वन अधिकार एक्ट का खुला उल्लंघन है.''



















