जम्मू-कश्मीर: पंचायत चुनाव पर घमासान, 2027 तक टलने का खतरा
Jammu Kashmir Panchayat Elections: जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव 2027 तक टलने का खतरा है. राज्य चुनाव आयोग ने सरकार को 31 अगस्त का अल्टीमेटम दिया है, वहीं चुनाव में देरी पर सियासी घमासान जारी है.

जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने की जद्दोजहद के बीच जमीनी स्तर के लोकतांत्रिक संस्थानों (पंचायत और स्थानीय निकाय) के चुनावों को लेकर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं. वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में पंचायती राज व्यवस्था के तीनों स्तर और नगर निगम पूरी तरह से खाली पड़े हैं. नगर पालिकाओं का कार्यकाल 2023 के अंत में, पंचायतों का जनवरी 2024 में और ब्लॉक/जिला विकास परिषद (BDC/DDC) का कार्यकाल फरवरी 2026 में खत्म हो चुका है. ऐसे में पूरे केंद्र शासित प्रदेश में जमीनी स्तर पर कोई चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं है.
SEC का अल्टीमेटम: अगस्त तक फैसला नहीं, तो 2027 तक टलेंगे चुनाव
जम्मू-कश्मीर राज्य चुनाव आयोग (SEC) ने पंचायत और DDC चुनाव कराने को लेकर 31 अगस्त की डेडलाइन तय की है. आयोग के अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि यदि अगस्त के अंत तक सरकार की ओर से औपचारिक फैसला नहीं लिया जाता है, तो सर्दियों और बर्फबारी के कारण यह चुनाव इस साल नहीं हो पाएंगे. ऐसी स्थिति में प्रदेशवासियों को स्थानीय निकाय चुनावों के लिए मार्च-अप्रैल 2027 तक का लंबा इंतजार करना पड़ सकता है.
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सियासी आरोप-प्रत्यारोप: NC बनाम BJP-PDP
चुनावों में हो रही इस देरी को लेकर प्रदेश में सियासी घमासान मचा हुआ है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि चुनाव 'सही समय' पर होंगे. नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुख्य प्रवक्ता तनवीर सादिक के मुताबिक, "केंद्र शासित प्रदेश की चुनी हुई सरकार के पास कोई अधिकार नहीं है. राज्य का दर्जा और चुनाव कराने का फैसला केंद्र और एलजी प्रशासन को करना है."
दूसरी ओर, विपक्षी दल पीडीपी और बीजेपी इस देरी के लिए सीधे तौर पर नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. पीडीपी महासचिव गुलाम नबी हंजूरा ने आरोप लगाया कि एनसी सरकार इसे राज्य के दर्जे की वापसी के साथ जोड़कर चुनावों में रोड़ा अटका रही है. वहीं, बीजेपी प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस पंचायती राज की बहाली में सबसे बड़ी रुकावट बन गई है.
OBC आरक्षण की रिपोर्ट बनी बड़ी अड़चन
इस पूरी चुनाव प्रक्रिया में एक बड़ी तकनीकी रुकावट अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण की रिपोर्ट भी है. पूर्व जस्टिस जनक राज कोतवाल की अध्यक्षता वाले आयोग ने अपनी अंतिम सिफारिशें फरवरी 2025 में ही सरकार को सौंप दी थीं, लेकिन यह रिपोर्ट अभी तक कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार कर रही है. राज्य चुनाव आयोग ने इस मुद्दे पर सरकार से दो बार स्पष्टीकरण भी मांगा है, क्योंकि इसके लागू हुए बिना वार्डों का आरक्षण और रोटेशन तय नहीं किया जा सकता.
सभी दल मानते हैं कि चुनाव टलने से विकास के अहम काम ठप पड़ गए हैं और पंचायतों के लिए मिलने वाला लगभग ₹1,000 करोड़ का केंद्रीय फंड अटका हुआ है. मतदाता सूची में 3.39 लाख नए मतदाताओं के जुड़ने के बावजूद जमीनी लोकतंत्र की बहाली फिलहाल राजनीतिक दांव-पेंच और नौकरशाही की फाइलों में उलझी हुई नजर आ रही है.
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