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Farmers Protest: धरना खत्म करने पर बंटे किसान संगठन, जानें क्यों हो रहा है मतभेद और आगे क्या हो सकता है?

किसान आंदोलन की आगे रणनीतियों को अंतिम रूप देने के लिए आज आपात बैठक बुलाई गई है. सूत्रों के मुताबिक 32 में से 20-22 किसान संगठन आंदोलन खत्म करना चाहते हैं.

Farmers Protest: कृषि कानूनों की वापसी के बाद अब साल भर से दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसानों का धरना खत्म करने को लेकर संयुक्त किसान मोर्चे में दो राय उभर कर सामने आई हैं. पंजाब के कई किसान संगठन आंदोलन की जीत के बाद धरना खत्म करने के पक्ष में हैं. वहीं कई किसान संगठन एमएसपी कानून और मुकदमों की वापसी समेत अन्य मांगों को लेकर धरना जारी रखना चाहते हैं. वापसी के पक्ष वाले आम सहमति बनाने की कवायद कर रहे हैं. रणनीतियों को अंतिम रूप देने के लिए आज और चार दिसंबर को किसान संगठनों की अहम बैठक होनी है. 

आंदोलन को लेकर किसानों में दो फाड़
पंजाब के 32 संगठनों की हुई बैठक में आम सहमति बनी कि संसद से कृषि कानूनों की वापसी के साथ ही आंदोलन की जीत हो चुकी है. एमएसपी कानून बनने की प्रक्रिया में समय लगेगा इसलिए सरकार को एक समयसीमा देकर वापस लौटना चाहिए. सूत्रों के मुताबिक 32 में से 20-22 करीब आधे संगठन वापसी चाहते हैं जबकि करीब 8-10 संगठन बाकी मांगें मनवाने तक रुकने के पक्ष में हैं. हालांकि पंजाब के जोगिंदर सिंह उगराहां और सरवन सिंह पंढेर हरियाणा के गुरनाम चढूनी जैसे बड़े किसान नेता धरना जारी रखने के पक्ष में हैं. इनके संगठन के किसान बड़ी संख्या में सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर बैठे हैं. 

कई मांगों पर अड़े किसान
सूत्रों की मानें तो घर वापसी के लिए दबाव बनाने वाले पंजाब के संगठनों में ज्यादा संख्या उनकी है जो आगामी विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाना चाहते हैं. घर वापसी चाहने वाले संगठनों को लगता है कि दिल्ली की सीमाओं पर साल भर से जारी धरने को खत्म करने का यह सही समय है. कीर्ति किसान यूनियन के नेता राजेन्द्र सिंह के मुताबिक, "आंदोलन जारी रहेगा, हम चाहते हैं कि आंदोलन का स्वरूप बदला जाए. एमएसपी पर देशव्यापी आंदोलन की जरूरत है." लेकिन भारतीय किसान यूनियन पंजाब के अध्यक्ष हरेंद्र सिंह लक्खोवाल ने एबीपी न्यूज से कहा कि एमएसपी कानून पर कमेटी के एलान और मुकदमों की वापसी के बिना हम धरना खत्म नहीं करेंगे. 

अब आगे क्या हो सकता है?
हालांकि संयुक्त किसान मोर्चा ने चार दिसंबर को बैठक कर आगे की रणनीति बनाने का ऐलान किया था, लेकिन कृषि कानूनों की वापसी की वजह से किसान जत्थेबंदियों को लंबे समय तक बॉर्डर पर रोके रखना एक बड़ी चुनौती होगी, मतभेद खुलकर सामने आ सकते हैं. इसको देखते हुए संयुक्त किसान मोर्चा ने चार दिसंबर से पहले आज आपात बैठक बुलाई है. इस बैठक में वो सभी 42 के करीब किसान संगठनों के नेता होंगे जो विज्ञान भवन में केंद्र सरकार से बातचीत में शामिल थे. इस बैठक का मकसद संयुक्त किसान मोर्चा के सभी नेताओं में किसान आंदोलन को खत्म करने के सर्वमान्य तरीके पर सहमति बनाने की कोशिश होगी.

क्यों हो रहा है मतभेद?
कृषि कानूनों का सबसे पहले विरोध पंजाब के किसानों ने ही किया था, उन्हीं के आह्वान पर पंजाब के साथ साथ हरियाणा के किसानों ने दिल्ली कूच किया था. जिसमें बाद में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसान भी शामिल हो गए. आंदोलन धीरे धीरे देश के कई राज्यों में फैला, आंकड़े बताते हैं कि देश में MSP पर सबसे ज्यादा खरीद पंजाब और हरियाणा में ही होती है, इसलिए उनकी MSP को लेकर प्रमुख मांग नहीं थी. पंजाब के किसानों की प्राथमिकता तीन कृषि कानूनों की वापसी और पराली जलाने पर दंडनीय कार्रवाई ना करना ही था, केन्द्र सरकार दोनों ही मांगों को पूरा कर चुकी है.

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