Delhi News: दिल्ली में यमुना का 'लोहा पुल' हुआ इतिहास, 150 साल बाद अब नई पटरी पर दौड़ेगी ट्रेन
Delhi News in Hindi: दिल्ली का 150 साल पुराना यमुना लोहा पुल बंद होगा. नए आधुनिक रेलवे ब्रिज से ट्रेनों की रफ्तार और सुरक्षा बढ़ेगी. पुराने पुल को हेरिटेज के रूप में संरक्षित करने की तैयारी है.

दिल्ली के रेल नेटवर्क में एक बड़ा बदलाव दर्ज होने जा रहा है. यमुना नदी पर बना 150 साल पुराना ‘लोहा पुल’, जिसने कभी दिल्ली को कोलकाता से जोड़कर देश के विकास को नई दिशा दी थी, अब बंद होने जा रहा है. इसकी जगह ले रहा है आधुनिक तकनीक से बना नया रेलवे ब्रिज, जो सुरक्षा और रफ्तार दोनों में बड़ा बदलाव लाएगा.
दिल्ली और शाहदरा के बीच बना यह ऐतिहासिक पुल डेढ़ सदी तक उत्तर और पूर्व भारत के बीच सबसे अहम रेल कड़ी रहा. लाखों यात्रियों और भारी माल ढुलाई का बोझ उठाते-उठाते अब इसकी संरचना कमजोर पड़ चुकी है. बढ़ते ट्रैफिक और सुरक्षा चिंताओं के चलते रेलवे ने इसे बंद करने का फैसला लिया है.
नए पुल से बढ़ेगी रफ्तार और सुरक्षा
गुरुवार (20 मार्च) से दिल्ली से रवाना होने वाली ट्रेनें नए कंक्रीट और स्टील से बने पुल पर चलेंगी. यह पुल आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीक से तैयार किया गया है, जो हाई-स्पीड ट्रेनों और भारी मालगाड़ियों का भार आसानी से संभाल सकता है. अब तक जहां पुराने पुल पर ट्रेनों की स्पीड 10 से 20 किमी प्रति घंटा तक सीमित रहती थी. वहीं नए पुल पर बिना स्पीड रोक-टोक के संचालन संभव होगा. इससे यात्रा समय घटेगा और ट्रेनों की लेटलतीफी में भी कमी आएगी.
चरणबद्ध तरीके से हो रहा बदलाव
रेलवे इस बदलाव को एक साथ लागू करने के बजाय चरणों में आगे बढ़ा रहा है. पहले चरण में दिल्ली से बाहर जाने वाली ट्रेनों को नए पुल पर शिफ्ट किया जा रहा है, जबकि दिल्ली आने वाली ट्रेनें अभी कुछ समय तक पुराने ट्रैक का इस्तेमाल करेंगी. धीरे-धीरे पूरे ऑपरेशन को नए पुल पर स्थानांतरित कर दिया जाएगा.
19वीं सदी की इंजीनियरिंग का जीवित इतिहास
1866-67 में करीब 3,500 टन रॉट आयरन से बना यह पुल उस दौर की इंजीनियरिंग का बड़ा उदाहरण था. लगभग 1000 फीट लंबे इस पुल पर 1867 में पहली बार भाप इंजन ट्रेन दौड़ी थी, जिससे दिल्ली सीधे कोलकाता से जुड़ गई. इसके बाद व्यापार, डाक सेवा और सैन्य आवाजाही में बड़ा बदलाव आया और यह देश के सबसे व्यस्त रेल रूट्स की रीढ़ बन गया.
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दो मंजिला डिजाइन और बहुआयामी उपयोग
इस पुल की बनावट इसे और खास बनाती थी. ऊपरी हिस्से में रेलवे ट्रैक थे, जबकि निचला हिस्सा सड़क और पैदल मार्ग के रूप में इस्तेमाल होता रहा. 1857 के बाद दिल्ली के पुनर्निर्माण और विस्तार में इस पुल की महत्वपूर्ण भूमिका रही और यह आम लोगों के लिए यमुना पार करने का भरोसेमंद रास्ता बना रहा.
अब हेरिटेज के रूप में बचाने की तैयारी
रेलवे इस ऐतिहासिक पुल को पूरी तरह हटाने के बजाय इसे हेरिटेज साइट के रूप में संरक्षित करने पर विचार कर रहा है. इसे म्यूजियम या वॉकिंग ट्रेल के रूप में विकसित किया जा सकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक धरोहर को करीब से देख सकें. इस बदलाव के साथ दिल्ली का रेल नेटवर्क एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. जहां एक ओर इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय समाप्त हो रहा है, वहीं दूसरी ओर आधुनिकता और तेज रफ्तार की नई कहानी लिखी जा रही है.
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