डीयू कैंपस में DUSU चुनाव का नया रूप, पोस्टरों की जगह पत्ते बने प्रचार का हथियार
DUSU Election: डूसू चुनाव में इस बार पत्तों के बैज, कुल्हड़ पर चाय और कपड़े के पोस्टरों से प्रचार हो रहा है. कोर्ट की सख्ती के बाद कैंपस अब साफ-सुथरा दिख रहा है. 18 सितंबर को चुनाव होंगे.

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव इस बार बिल्कुल नए रंग-रूप में नजर आ रहे हैं. कोर्ट और प्रशासन की सख्ती के बाद छात्र संगठनों को अब पुराने तरीकों से हटकर पर्यावरण-हितैषी और रचनात्मक तरीके अपनाने पड़ रहे हैं. प्रिंटेड पर्चों और बेतरतीब पोस्टरों की जगह अब सूखे पत्तों, हाथ से लिखे पोस्टरों और कपड़े के बैनरों ने ले ली है.
हाई कोर्ट की सख्ती से आया बदलाव
पिछले साल डीयू कैंपस में चुनावी प्रचार के नाम पर जगह-जगह बेतरतीब पर्चे और पोस्टरों का ढेर लग गया था. हालत इतनी बिगड़ गई कि मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंचा.
कोर्ट ने साफ-सफाई के साथ-साथ भविष्य में इस तरह की गंदगी पर रोक लगाने के निर्देश दिए. इसी वजह से इस बार डूसू चुनाव प्रचार का नज़ारा बिल्कुल अलग है. पूरे नॉर्थ और साउथ कैंपस में इस बार न गंदगी है, न दीवारों पर चिपके पोस्टर.
18 सितंबर को होंगे चुनाव
डूसू चुनाव 18 सितंबर को होने हैं और कैंपस पूरी तरह साफ-सुथरा दिख रहा है. इस बीच छात्र संगठनों ने प्रचार का नया रास्ता खोज लिया है. शहीद भगत सिंह कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने सूखे पत्तों को बैज की तरह इस्तेमाल किया है. इन पत्तों पर ‘ABVP’ लिखा गया है और इन्हें छात्रों में बांटा जा रहा है. यह तरीका छात्रों के बीच काफी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.
डोर-टू-डोर कैंपेन पर सबसे ज्यादा भरोसा
एबीवीपी के प्रदेश मंत्री सार्थक शर्मा का कहना है कि इस बार प्रचार का सबसे बड़ा हथियार डोर-टू-डोर कैंपेन है. यानी कार्यकर्ता खुद छात्रों के बीच जाकर उनसे बातचीत कर रहे हैं और संगठन की नीतियों के बारे में बता रहे हैं.
वहीं, नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने भी इसी रणनीति को अपनाया है. एनएसयूआई के मीडिया डिपार्टमेंट चेयरमैन रवि पांडेय ने बताया कि उनकी प्राथमिकता तीन बड़े मुद्दों पर है, बेहतर कैंपस इंफ्रास्ट्रक्चर और छात्र सुविधाएं, आरक्षण का पूरी तरह क्रियान्वयन और दिल्ली विश्वविद्यालय को महिला सुरक्षा व लैंगिक समानता का मॉडल बनाना.
कुल्हड़ वाली चाय से प्रचार
एनएसयूआई ने प्रचार को अलग अंदाज में पेश करने की तैयारी की है. संगठन ने मिट्टी के कुल्हड़ पर ‘NSUI’ लिखकर छात्रों को चाय पिलाने का प्लान बनाया है. चाय के साथ चुनावी चर्चा होगी और इसी दौरान संगठन की नीतियों पर बातचीत की जाएगी. साथ ही, NSUI भी कपड़े और जुट (jute) के पोस्टरों का इस्तेमाल कर रही है ताकि पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे.
एसोसिएशन ऑफ स्टूडेंट्स फॉर अल्टरनेटिव पॉलिटिक्स (ASAP) अभी प्रचार को धीमे अंदाज में चला रही है. संगठन ने अपने कार्यकर्ताओं को कॉलेजों में जाकर व्यक्तिगत बातचीत और ग्राउंड लेवल पर छात्रों से जुड़ने के निर्देश दिए हैं.
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) का कहना है कि वे तो पहले से ही पर्चों और प्रिंटेड पोस्टरों के विरोध में थे. इसलिए उन्हें यह पहल काफी सराहनीय लग रही है.
इस बार का चुनाव प्रचार छात्रों की रचनात्मकता और पर्यावरण संरक्षण, दोनों का मिलाजुला रूप दिखा रहा है. एबीवीपी के कार्यकर्ता पत्तों पर “Join ABVP” और “May I Help You” जैसे संदेश लिखकर छात्रों को बांट रहे हैं. दूसरी ओर, कपड़ों के बैनर और हाथ से बने पोस्टरों ने प्रचार को एक अलग पहचान दी है.
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Source: IOCL



























