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Bastar: बस्तर संभाग में स्कूल ड्रॉपआउट, बीते 3 सालों में 40 हजार बच्चों ने छोड़ी पढ़ाई

इसमें प्राथमिक से लेकर हायर सेकेंडरी तक के बच्चे शामिल हैं. लगातार पढ़ाई छोड़ने की वजहों को लेकर शिक्षा विभाग के पास कोई जवाब नहीं है. इसमें ज्यादातर बच्चे नक्सल प्रभावित इलाकों से हैं.

Bastar News: स्कूली शिक्षा को लेकर छत्तीसगढ़ के बस्तर (Bastar) में हालात अभी सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं. राइट टू एजुकेशन एक्ट लागू करने के बावजूद भी बड़ी संख्या में बस्तर संभाग में स्कूल ड्रॉपआउट छात्र सामने आ रहे हैं. बीते तीन साल में ही 40 हजार बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं.  इन 40 हजार बच्चों में से 13 हजार 495 मिडिल कक्षा के छात्र रहे हैं. ज्यादातर बच्चे नक्सल प्रभावित इलाकों से हैं, नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सली खुद अपनी पाठशाला चलाते हैं.  ऐसे में ना चाह कर भी बच्चों को नक्सलियों के पाठशाला में शामिल होना पड़ता है. हालांकि, पुलिस का दावा है कि जिस तरह से एंटी नक्सल ऑपरेशन अंदरूनी इलाकों में चलाए जा रहे हैं ऐसे में नक्सलियों की पाठशाला लगभग बंद हो चुकी है. इसके बावजूद जिस बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं यह चिंता का विषय है.

नये संस्थान खुलने के बाद भी स्कूल छोड़ रहे बच्चे
दरअसल, बस्तर संभाग में बीते 3 सालों में  40 हजार बच्चे अपनी पढ़ाई छोड़ चुके हैं. इसमें प्राथमिक से लेकर हायर सेकेंडरी तक के बच्चे शामिल हैं. बच्चों की लगातार पढ़ाई छोड़ने की वजहों को लेकर शिक्षा विभाग के पास कोई उचित जवाब नहीं है. राइट टू एजुकेशन एक्ट लागू होने के बावजूद भी प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की पढ़ाई में बच्चों को जोड़े रखने में शिक्षक कामयाब नहीं हो रहे हैं. शिक्षा विभाग की वेबसाइट यूडीआई (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफॉरमेशन)  सिस्टम से मिले आंकड़ों के मुताबिक बस्तर जिले में बीते 3 सालों में करीब 2 हजार बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी है. जबकि, पूरे बस्तर संभाग में यह आंकड़ा 40 हजार के करीब है. प्राथमिक कक्षाओं के 12 हजार 256 बच्चों ने स्कूल छोड़ा है. जबकि, माध्यमिक कक्षा में 13 हजार 495 बच्चे शिक्षा से दूर हो चुके हैं. 

शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर होगी कार्रवाई
हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी में भी बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई छोड़कर ड्रॉप आउट की श्रेणी में हैं. ऐसे समय जब नक्सल प्रभावित इलाकों में भी बंद पड़े स्कूलों को खोलने का दावा किया जा रहा है और राज्य शासन की पोटाकेबिन, कस्तूरबा आश्रम, जैसी सुविधाएं संचालित की जा रही हैं.  जिला स्तर पर केंद्रीय विद्यालय, आत्मानंद स्कूल खोले जा रहे हैं. इन ड्रॉप आउट बच्चों के आंकड़े शिक्षा विभाग की तैयारियों पर भी सवालिया निशान उठाते हैं. खासकर अंदरूनी इलाकों में अभी हालात ऐसे हैं कि शिक्षक महीनों स्कूल नहीं जाते हैं, जिसकी वजह से छात्र नियमित स्कूल नहीं जा रहे और पढ़ाई नहीं कर रहे हैं. ये भी छात्रों के ड्रॉप आउट्स की एक वजह है. कोरोना के दौरान सबसे ज्यादा ड्रॉप आउट्स छात्रों की आशंका थी, लेकिन इसकी बजाय छत्तीसगढ़ में साल 2020-21 में जहां बच्चों का ड्रॉप आउट रेट 13.4% था, वहीं साल 2019- 20 में यह 18 प्रतिशत था. 

कुल मिलाकर बच्चों के लगातार पढ़ाई छोड़ने से यह चिंता का विषय है. हालांकि, बस्तर के कमिश्नर घनश्याम धावड़े का कहना है कि घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र को छोड़ बाकि जगहों पर बच्चे आधी अधूरी पढ़ाई नहीं छोड़े इसके लिए सख्त निर्देश शिक्षा विभाग के अधिकारियों को दिया गया है. बावजूद अगर इस तरह की स्थिति निर्मित होती है तो जरूर इस पर कार्रवाई होगी. उन्होंने कहा कि 20 सालों से बंद स्कूलों को भी साथ दोबारा शुरू किया गया है. यहां बच्चों की संख्या भी बढ़ रही है ऐसे में ड्रॉप आउट्स बच्चों  की संख्या हैरान करने वाली है.

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