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Lalu Prasad Yadav Birthday:  शादी के 22 साल बाद आखिर क्यों राबड़ी देवी लालू यादव को कहने लगी 'साहेब'

Lalu Prasad Yadav Birthday: शादी के बाद राबड़ी देवी लालू यादव को 'ईह' कह कर बुलाती थीं. 'ईह' का प्रयोग अक्सर बिहारी पत्नियां अपने पतियों के लिए करती हैं. इससे जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा संकर्षण ठाकुर की किताब 'बंधु बिहारी' में दिया हुआ है.

Lalu Prasad Yadav Birthday: बिहार की राजनीति की जब-जब चर्चा होगी एक नाम लिए बिना हर चर्चा अधूरी मानी जाएगी और वो नाम है सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की. लालू बिहार के वो नेता हैं जो अपने भाषण के कारण राष्ट्रीय स्तर पर भी उतने ही मशहूर हैं जितने बिहार में हैं. क्या पक्ष और क्या विपक्ष, हर दल का नेता जब लालू प्रसाद यादव सदन के अंदर से लेकर बाहर तक बोलते तो उनको ध्यान से सुनने लगता और उनकी मजाकिया बातों पर ठहाके लगाकर हंसता है.

साल 1948 में आज ही के दिन यानी 11 जून को बिहार के फुलवरिया में पैदा हुए लालू प्रसाद यादव का 1954 में पटना आगमन हुआ. 1965 में स्कूली शिक्षा खत्म की और 1966 में पटना विश्व विद्यालय में दाखिला ले लिया. यहीं से उनकी छात्र राजनीति में दिलचस्पी पैदा हुई और वो उतर गए राजनीति के मैदान में. बस फिर क्या था, साल 1967 से 1969 तक पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के महासचिव चुने गए. 1970 में बीए पास कर ली, हालांकि छात्रसंघ के अध्यक्ष पद का चुनाव हार गए. इसके बाद पटना पशु चिकित्सा महाविद्यालय में क्लर्क के पद पर नौकरी शुरू कर दी. 

हालांकि लालू प्रसाद यादव की किस्मत जैसे राजनीति में तय थी. साल 1973 में राबड़ी देवी से विवाह हो गया. विवाह के बाद कानून की पढ़ाई करने के लिए पटना विश्वविद्यालय में फिर से दाखिला लिया. इस बार पिछली बार जो कमी रह गई थी वो भी पूरी हुई. लालू प्रसाद यादव पटना विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष चुन लिए गए.

आगे राजनीति पथ पर उनका रास्ता तय होता गया. 1974 में संपूर्ण बिहार छात्र आंदोलन के प्रमुख बने. जयप्रकाश नारायण के पर्यवेक्षण में छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया. अगले ही साल यानी 1975 में इमरजेंसी के दौरान मीसा के तहत गिरफ्तार हुए और जेल गए.

साल 1977 में पहली बार जनता पार्टी की टिकट पर छपरा से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत गए. इसके बाद 1980 में सोनपुर से विधायक चुने गए. फिर 1985 में इसी विधानसभा सीट से दोबारा जीते.

अब साल था 1989 और लालू प्रसाद यादव को एक और बड़ी जिम्मेदारी मिली. वो बिहार विधानसभा में  कर्पूरी ठाकुर की जगह विपक्ष के नेता बने. इसी साल छपरा से सांसद चुने गए और साल 1990 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लालू प्रसाद यादव बैठे.

उनका जादू 1995 की बिहार विधानसभा में भी चला और पार्टी चुनाव जीत गई, लालू दोबारा मुख्यमंत्री बने. साल 1996 में वो जनता दल के अध्यक्ष बने. इसके बाद अगले साल यानी साल 1997 में जनता दल टूट कर विभाजित हो गई और लालू प्रसाद यादव ने राष्ट्रीय जनता दल बनाया. यहां से लालू प्रसाद यादव के लिए आगे की राह थोड़ी मुश्किल हो गई. चारा घोटाला मामले में आरोप पत्र दाखिल हुआ और लालू प्रसाद यादव पर पद छोड़ने का दवाब बनाया जाने लगा, मगर लालू अब तक राजनीति की पिच के एक मंझे हुए खिलाड़ी बन गए थे. उन्होंने बड़ा दांव खेला और पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया.

साल 2000 में राघोपुर और दानापुर से विधायक चुने गए.लेकिन विधानसभा में पार्टी को बहुमत नहीं मिला. हालांकि कांग्रेस के समर्थन से राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बनाए रखने में कामयाब रहे.

इधर आय से अधिक संपत्ति के मामले में तीसरा आरोपपत्र उनके खिलाफ दाखिल हुआ. हालांकि इन सबसे लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक यात्रा नहीं रुकी और साल 2004 में जब मनमोहन सिंह की सरकार बनी तो लालू प्रसाद यादव को रेल मंत्री के रूप में बड़ी जिम्मेदारी दी गई. हालांकि साल 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में NDA ने बिहार बिधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बना ली और 15 साल बाद 'लालू परिवार का सत्ता पर 'अधिकार' खत्म हो गया.

इसके बाद साल 2009 में मनमोहन सिंह की सरकार में लालू प्रसाद यादव का मंत्री पद भी चला गया. चारा घोटाला मामले में वो बुरी तरह फंसते गए और साल 2013 में दोषी ठहराए गए. चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लग गया. साल 2015 में सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने के नाम पर लालू-नीतीश एक हो गए.  दरअसल 2015 विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को सर्वाधिक 81 सीटें मिली थी. नीतीश को जनता परिवार का मुखिया बनाया गया. लेकिन साल 2017 में नीतीश कुमार ने लालू का साथ छोड़ NDA के साथ फिर सरकार बना ली.

इसके बाद लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाला मामले में जेल हो गई और उनके अनुपस्थिति में उनके बेटे तेजस्वी यादव तमाम कोशिशों में लग गए, लेकिन उसके बावजूद भी बिहार की सत्ता हासिल नहीं हुई. इस दौरान तेजस्वी लगातार पिता से जेल में मिलकर 'राजनीतिक ज्ञान' लेते रहे और इसी का नतीजे रहा कि 2020 विधानसभा चुनाव में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. इससे न केवल तेजस्‍वी का कद बढ़ा, बल्कि लालू को भी को मजबूती मिली. फिलहाल लालू जेल से बाहर अपने परिवार के साथ हैं और उनके बाहर आने के बाद बिहार की राजनीति एक बार फिर गर्म है. सियासी हलचल देखने को मिल रही है. अब देखना होगा कि क्या आने वाले दिनों में लालू फिर अपना कोई दांव खेलते हैं या नहीं.

जब राबड़ी देवी लालू प्रसाद यादव को 'ईह' से साहब कहकर बुलाने लगीं

जितनी दिलचस्प लालू की राजनीतिक यात्रा है उतनी ही उनकी और राबड़ी देवी की शादी और उसके बाद की कहानी भी. राबड़ी देवी का जन्म 1959 में गोपालगंज में हुआ था. जब लालू प्रसाद यादव से उनकी शादी हुई तो वो केवल 14 साल की थीं. जबकि उस वक्त लालू प्रसाद यादव की उम्र 25 साल थी. शादी के तीन साल बाद गौना हुआ. कहा जाता है कि लालू प्रसाद यादव हर खुशी के मौके पर राबड़ी देवी को गुलाब का फूल देते हैं, फिर चाहे उनका जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह या फिर छठ पूजा.

शादी के बाद राबड़ी देवी लालू यादव को 'ईह' कह कर बुलाती थीं. 'ईह' का प्रयोग अक्सर बिहारी पत्नियां अपने पतियों के लिए करती हैं. इससे जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा संकर्षण ठाकुर की किताब 'बंधु बिहारी' में दिया हुआ है.

लेखक ने लिखा है,'' वर्ष 1973 में जब उनका विवाह हुआ तो राबड़ी देवी के पास न तो अपने पति को 'साहेब' कह कर बुलाने की समझ थी, न कारण. वह 14 साल की ग्रामीण बालिका थीं, जिन्हें शायद शब्दों के वजन का ज्ञान नहीं था और उस वक्त लालू यादव 'साहेब' थे भी नहीं. वे पटना पशु चिकित्सा महाविद्यालय के निचले दर्जे के एक कर्मचारी थे. जो सबकी टेबल तक चाय और एक अफसर से दूसरे तक फाइल पहुंचाता था. इसलिए 'ईह' पर्याप्त था.''

आगे संकर्षण ठाकुर ने लिखा है, ''  1995 के मध्य में किसी समय विवाह के 22 साल और नौ बच्चों के जन्म के बाद, राबड़ी देवी ने लालू यादव को संबोधित करने के अपने तरीके में बदलाव लाने का निश्चय किया. वे उन्हें 'साहेब' कहकर बुलाने लगीं.''

 संकर्षण ठाकुर ने लिखा है, ''लालू पहले मुख्यमंत्री थे जिन्होंने पूरे कार्यकाल के लिए कार्यालय में रहने के बाद दोबारा साल 1995 में सत्ता बनाए रखी. अब उन्हें 'ईह' कहने से काम नहीं चलने वाला था. वो अपने घर में एक बेहतर खिताब के अधिकारी थे. इसलिए लालू यादव राबड़ी देवी के लिए 'साहेब' बन गए. आगे दुनिया भी उन्हें इसी नाम से जाननेवाली थी, साहेब मास्टर'''

 

(जानकारी  संकर्षण ठाकुर की किताब 'बंधु बिहारी' से ली गई है.)

संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.

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