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ब्लॉग - इसलिए विराट लगते हैं सुपरमैन

सचिन तेंडुलकर को 100 शतक बनाने में 24 साल लग गए जबकि इंटरनेशनल क्रिकेट में ठीक ठीक लगा लें तो विराट को कुल जमा 9 साल हुए हैं, उसी में उन्होंने 50 शतक जमा दिए.

अनुराग श्रीवास्तवा 

कोलकाता के नीरस टेस्ट में विराट कोहली के शतक ने कुछ जान फूंकी. बारिश की वजह से वैसे भी कोलकाता टेस्ट के पांच में से तीन दिन का भी खेल पूरा नहीं हो पाया. खैर कोलकाता टेस्ट की बात बाद में. पहले तो बात उस बल्लेबाज़ की जिसे देखकर लगता है कि शतक बनाना दुनिया का सबसे आसान काम है. सचिन तेंडुलकर को 100 शतक बनाने में 24 साल लग गए जबकि इंटरनेशनल क्रिकेट में ठीक ठीक लगा लें तो विराट को कुल जमा 9 साल हुए हैं, उसी में उन्होंने 50 शतक जमा दिए. सवाल ये उठता है कि आखिर ये कैसे हुआ. क्यों शतक लगाना एक समय क्रिकेट में बल्लेबाजी का सबसे बड़ा काम लगता था और विराट के साथ क्यों ये आंकड़े छोटे लगते हैं.

सचिन- विराट में ये है अंतर
देखिए सचिन और विराट के बीच का अंतर समझना बहुत जरुरी है. सचिन एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार से आते हैं और उनके पिता मराठी के बड़े साहित्यकारों में से एक रहे हैं. पिता और घर के संस्कार दोनों मैदान में भी सचिन में दिखते हैं और उनकी बैटिंग में भी. सचिन की बैटिंग में एक सौम्यता थी, वो बड़े शॉट्स लगाते थे लेकिन सौम्यता से. वहीं विराट को देखें तो कम उम्र में पिता का देहांत हुआ और दिल्ली के पंजाबी परिवार में पले बढ़े विराट को शायद ये बात बहुत कम उम्र में ही समझ आ गई थी कि दुनिया के सामने खुद को मजबूत दिखाना है. उनकी बैटिंग में भी दुनिया को जलाकर राख कर दूंगा वाली छाप दिखती है.

सचिन जब क्रिकेट खेलते थे तो कई साल तक अपने चाचा के पास भी रहे और खुद सचिन ने कई बार कहा है कि चाचा- चाची ने उनको क्रिकेट और संस्कार दोनों मां बाप की ही तरह दिए. दूसरी तरफ विराट को देखें तो कम उम्र में बेमिसाल प्रतिभा थी. कम उम्र में क्रिकेट खेलना और उससे कमाना शुरू किया. उनके लिए क्रिकेट पहला प्यार भी था और कमाई का जरिया भी और किसी भी पंजाबी परिवार में कमाई का जरिया ही एक तरह से जीवन बन जाता है. विराट के लिए क्रिकेट जीवन भी है और जीवन चलाने का जरिया भी. अब विराट की कमाई करोड़ों में है तो उनके लिए जीने खाने की समस्या सामने नहीं होती लेकिन जो डर, जो तेवर उनके डीएनए में घुस चुके हैं, उससे अलग होना भी मुमकिन नहीं है. इसलिए मैदान पर जब विराट बैटिंग करने उतरते हैं तो उनके लिए शतक आसान लगता है. उनके शॉट्स फैंस को भले ही अविश्सनीय लगते हैं लेकिन विराट के लिए वो शॉट्स सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट थ्यौरी की तरह हैं.

इसलिए ही सचिन की क्रिकेट में एक शांति दिखती थी, उथल पुथल नहीं. इसलिए सचिन के शतक तक पहुंचने का संघर्ष, उनकी कलात्मकता, उनकी मेहनत सब दिखती थी. विराट की क्रिकेट में शतक के मुकाम तक पहुंचना दिखता है, बाकी चीजें उनके विस्फोटक व्यक्तित्व और क्रिकेट दोनों की परछाई में छिप जाती है. सचिन और विराट दोनों मध्यमवर्ग में ही पले हैं लेकिन परवरिश और परिस्थितियां दोनों की अलग अलग हैं जो उनकी बैटिंग में भी दिखती है.

इसलिए कप्तान भी आक्रामक हैं विराट
दिल्ली के पश्चिम विहार की पंजाबी परवरिश विराट की कप्तानी में भी दिखती है. इसलिए मैदान पर वो अक्सर लड़ने पर उतारू रहते हैं क्योंकि उनका एक सीधा सा सवाल होता है कि तुम मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हो. ये कुछ एंग्री यंग मैन वाली वही छवि है जो रुपहले पर्दे पर अमिताभ बच्चन ने उकेरी थी. अपील करना हो या फिर विकेट लेने के बाद जश्न मनाना, विराट के लिए हर मैदान उनके बचपन की उस गली की ही तरह है जहां वो कॉलोनी के बाकी बच्चों के साथ खेलते थे. विराट के जश्न में साबित करने का एक अलहदा ऐलान होता है. विराट की कप्तानी सिर्फ एक आधार पर टिकी है और वो है जीत. इसके लिए वो अपील और जश्न के माध्यम से विरोधियों को धमकाने-चमकाने किसी से गुरेज नहीं करते. विराट क्रिकेट की इस नई पीढ़ी में जेंटलमैन नहीं हैं, वो एक योद्धा हैं जिसे सिर्फ लड़ना और जीतना आता है. वो गली में इसी तरह लड़कर क्रिकेट खेले और जीते और अब इंटरनेशनल मैदानों पर भी वो वही कर रहे हैं. विराट की कप्तानी लक्ष्यों और ललकार पर आधारित है.

 

TWITTER - @anuragashk

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