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पोप फ्रांसिस की ऐतिहासिक इराक यात्रा, सुरक्षा जोखिम और कोरोना वायरस के बावजूद क्यों हो रहे रवाना?

कोरोना वायरस महामारी की शुरुआत से पोप फ्रांसिस की पहली विदेश यात्रा होने जा रही है. ईसाई समुदाय के सबसे बड़े धार्मिक गुरू की इराक यात्रा पर कई वजहों से चिंता बनी हुई है. एक तो कोरोना वायरस का मामला और दूसरा आतंकवादी हमलों का खतरा, लेकिन पोप फ्रांसिस अपनी यात्रा को दृढ़ हैं.

कोरोना वायरस और सुरक्षा जोखिम की चिंता के बावजूद ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरू पोप फ्रांसिस आज इराक की ऐतिहासिक यात्रा के लिए रवाना हो रहे हैं. महामारी की शुरुआत से ये अब तक उनकी पहली विदेश यात्रा है. चार दिवसीय यात्रा के क्रम में धर्मगुरू छह शहरों का दौरान करेंगे. इस दौरान उनकी मुलाकात धार्मिक और सियासी नेताओं से होगी. उनका कहना है कि यात्रा का मकसद इस्लाम के साथ बातचीत को बढ़ावा देना और इराक के ईसाई समुदाय का समर्थन करना है.

कोरोना वायरस और सुरक्षा जोखिम के बीच पोप की यात्रा 

पोप का इराक के सबसे सम्मानित शिया मुस्लिम धर्मगुरू से मुलाकात, मोसुल में प्रार्थना सभा में शिरकत और स्टेडियम में जनसभा को संबोधित करने का भी कार्यक्रम है. आतंकवादी हमलों से जूझ रहे देश और कोरोना वायरस मामलों में वृद्धि के बीच पोप की यात्रा पर चिंता जताई जा रही है. इराक समेत वेटिकन के पादरियों ने यात्रा के समय को अनुपयुक्त बताया है और उम्मीद की है कि पोप उसे स्थगित करेंगे. लेकिन उन्होंने वैश्विक मंच पर वापसी के लिए प्रतिबद्धता जताई है. पिछले साल मार्च में जब रोम और इटली में पहली बार लॉकडाउन लगाया था, तो उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए 'पिंजरे में पोप' होना कहा था.

इराक की यात्रा से ईसाई धर्मगुरू क्या हासिल करना चाहते हैं? बीबीसी के मुताबिक, रोमन कैथोलिक चर्च के प्रमुख इराक में सताए हुए ईसाई समुदाय को प्रोत्साहित और सियासी और अन्य धार्मिक नेताओं के साथ शांति का आह्वान करना चाहते हैं. यात्रा की पूर्व संध्या पर वीडियो संदेश में इराक के लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "मैं तीर्थयात्री के तौर पर, एक पश्चातापी तीर्थयात्री के तौर पर आतंकवाद और वर्षों जंग के बाद सुलह और खुदा से क्षमा की खातिर आ रहा हूं. खुदा से दिलों को सांत्वना और जख्मों पर मरहम चाहता हूं."

1999 में तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सरकार के साथ बातचीत विफल होने के बाद पोप जॉन पॉल द्वितीय ने यात्रा को स्थगित कर दिया था. बीते दो दशकों से अब तक, दुनिया के सबसे पुराने ईसाई समुदायों में से एक की आबादी 1.4 मिलियन से घटकर करीब 2 लाख 50 हजार तक पहुंच गई है. धार्मिक रूप से प्रेरित हिंसा के चलते बहुत सारे लोगों को देश छोड़ना पड़ा था. अमेरिका की अगुवाई में 2003 के हमले ने भी स्थिति को और ज्यादा खराब किया. 2014 में इस्लामिक स्टेट के उदय के चलते भी हजारों लोगों को घर से बेघर होना पड़ा. आईएस के हमले में ऐतिहासिक चर्च को नुकसान पहुंचा, संपत्ति जब्त कर ली गई और ईसाई समुदाय को टैक्स अदा करने का विकल्प दिया गया.

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