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Explained: कल US में मिडटर्म चुनाव, वोटिंग प्रक्रिया, ट्रंप का भविष्य और भारत पर असर, जानिए A टू Z

यदि डेमोक्रेट पार्टी संसद में मजबूत होती है, तो वे राष्ट्रपति ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीतियों और व्यापार समझौतों की और अधिक सूक्ष्म जांच कर सकते हैं. इससे भारत के साथ होने वाले व्यापारिक वार्ताओं और शुल्कों पर असर पड़ सकता है.

अमेरिका की राजनीति में 'मिडटर्म चुनाव' अमेरिकी राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के ठीक आधे समय यानी दो साल बाद आयोजित किए जाते हैं. ये चुनाव इस बात की दिशा तय करते हैं कि राष्ट्रपति के बाकी बचे कार्यकाल में संसद का रुख क्या रहेगा. दुनिया भर की निगाहें इस बात पर टिकी रहती हैं कि अमेरिकी मतदाता किस प्रकार अपनी नाराजगी या समर्थन दर्ज कराते हैं. आइए इस पूरी प्रक्रिया, इसके इतिहास, वोटिंग के दिन की दिलचस्प वजहों, डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक भविष्य और भारत पर इसके पड़ने वाले प्रभावों को विस्तार से समझते हैं.

अमेरिका में हमेशा नवंबर के पहले मंगलवार को ही वोट क्यों डाले जाते हैं?
अमेरिका में चुनाव के लिए नवंबर महीने के पहले मंगलवार को चुनने का इतिहास काफी दिलचस्प और व्यावहारिक जरूरतों से जुड़ा है. 1845 में अमेरिकी कांग्रेस ने एक संघीय कानून पास किया था जिसके तहत चुनाव के लिए नवंबर के पहले सोमवार के बाद आने वाले मंगलवार को तय किया गया.

19वीं सदी में अमेरिका एक मुख्य रूप से कृषि प्रधान देश था. नवंबर का समय वह होता था जब गर्मियों और शरद ऋतु की फसल की कटाई का काम लगभग पूरा हो चुका होता था. किसान अपने खेतों के काम से थोड़े निश्चिंत होते थे, जिससे वे मतदान प्रक्रिया में हिस्सा ले सकते थे.

उस दौर में परिवहन के साधन सीमित थे और लोगों को मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए मीलों का सफर तय करना पड़ता था. रविवार का दिन ईसाई धर्म के मानने वालों के लिए चर्च जाने और विश्राम का दिन होता था. इसलिए सोमवार का दिन लोगों को यात्रा शुरू करने और पोलिंग बूथ तक पहुंचने के लिए दिया गया, ताकि वे मंगलवार को आराम से अपना वोट डाल सकें.

कानून यह भी तय करता था कि चुनाव नवंबर की पहली तारीख को नहीं हो सकता, क्योंकि पहली तारीख को व्यापारी वर्ग अपने महीने के शुरुआती वित्तीय हिसाब-किताब (लेखा-जोखा) में व्यस्त रहता था. इसलिए नवंबर के पहले सोमवार के बाद आने वाला मंगलवार सबसे सटीक और व्यावहारिक दिन साबित हुआ.

मिडटर्म चुनाव की वोटिंग प्रक्रिया और नियम
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति चुनाव से काफी अलग होते हैं. यहां राष्ट्रपति पद के लिए 'इलेक्टोरल कॉलेज' प्रणाली होती है, लेकिन मिडटर्म चुनावों में सीधे तौर पर जनता कांग्रेस के सदस्यों और स्थानीय अधिकारियों का चुनाव करती है.

इस चुनाव के जरिए अमेरिकी संसद यानी 'कांग्रेस' के दोनों सदनों प्रतिनिधि सभा और सीनेट के नए प्रतिनिधियों का चुनाव होता है. इसमें सभी 435 सीटों पर चुनाव होते हैं, जिनका कार्यकाल दो साल का होता है.

सीनेट में कुल 100 सीटें होती हैं, जिनमें से एक तिहाई (यानी लगभग 33 या 34 सीटें) पर हर मिडटर्म चुनाव में मतदान होता है, क्योंकि सीनेटरों का कार्यकाल 6 साल का होता है.

गवर्नर चुनाव: इसके अलावा कई राज्यों में गवर्नरों और स्थानीय विधियों के चुनाव भी इसी समय संपन्न होते हैं.

मुकाबला किसके बीच और किन मुद्दों पर?

इस बार के मिडटर्म चुनावों में मुख्य मुकाबला पारंपरिक रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी के बीच है. चुनाव विश्लेषक इसे मुख्य तौर पर चार मुद्दों पर आधारित मान रहे हैं

मुद्रास्फीति और महंगाई: आम नागरिकों की जेब पर पड़ रहा बोझ और बढ़ती कीमतें मतदाताओं के लिए सबसे बड़ा चिंता का विषय हैं. 

संस्थागत अविश्वास : सरकार और प्रशासनिक तंत्र के प्रति जनता का घटता भरोसा चुनाव में एक बड़ा कारक बन रहा है.

आव्रजन और सीमा सुरक्षा: अमेरिकी सीमाओं की सुरक्षा और प्रवासियों से जुड़े नियम और कानून इस बार के सबसे गर्माए हुए राजनीतिक मुद्दों में शामिल हैं.

भू-राजनीतिक संघर्ष और विदेश नीति: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे तनाव और युद्ध की स्थितियों ने भी अमेरिकी मतदाताओं को प्रभावित किया है.

डोनाल्ड ट्रंप का राजनीतिक भविष्य 
इन मध्यावधि चुनावों को मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन और उनकी नीतियों पर एक बड़े ' जनमत संग्रह' के रूप में देखा जा रहा है. यदि विपक्षी डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा या सीनेट पर नियंत्रण हासिल करने में सफल हो जाते हैं, तो ट्रंप प्रशासन के लिए अपने एजेंडे और विधेयकों को पारित कराना बेहद कठिन हो जाएगा.

कांग्रेस में बहुमत खोने का मतलब है कि विपक्षी दल राष्ट्रपति के फैसलों की कड़ी जांच शुरू कर सकते हैं, समन जारी कर सकते हैं और कई मामलों में प्रशासनिक नीतियों पर लगाम कस सकते हैं.

यह चुनाव इस बात की भी रूपरेखा तय करेगा कि आने वाले समय में व्हाइट हाउस और आगामी राष्ट्रपति चुनावों के लिए रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति कितनी मजबूत या कमजोर रहेगी.

भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?
अमेरिका के ये मिडटर्म चुनाव भले ही घरेलू मुद्दों पर केंद्रित हों, लेकिन इसके भू-राजनीतिक और आर्थिक परिणाम भारत जैसे देशों पर भी गहरा असर डालते हैं. यदि डेमोक्रेट पार्टी संसद में मजबूत होती है, तो वे राष्ट्रपति ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीतियों और व्यापार समझौतों की और अधिक सूक्ष्म जांच कर सकते हैं. इससे भारत के साथ होने वाले व्यापारिक वार्ताओं और शुल्कों पर असर पड़ सकता है.

भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंध आमतौर पर दोनों दलों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स) के द्विपक्षीय समर्थन पर टिके रहे हैं. हालांकि, संसद के भीतर शक्ति संतुलन बदलने से रक्षा तकनीक के हस्तांतरण, आपूर्तिकर्ता श्रृंखला और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी से जुड़े विधेयकों की गति प्रभावित हो सकती है.

आव्रजन और एच-1बी (H-1B) जैसे कार्य वीजा से जुड़े नियमों पर अमेरिकी संसद का रुख भारतीय पेशेवरों और छात्रों के भविष्य को प्रभावित करता है. कांग्रेस में बदलता समीकरण इन नीतियों में फेरबदल का कारण बन सकता है.

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव सिर्फ कागजी या प्रशासनिक औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि यह अमेरिकी लोकतंत्र की दिशा, राष्ट्रपति के राजनीतिक भविष्य और वैश्विक कूटनीति की चाल तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण मील के पत्थर हैं.

संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.

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