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'8-9 साल और राष्ट्रपति रहूंगा...', क्या अमेरिकी संविधान को ताक पर रखकर फिर चुनाव लड़ेंगे ट्रंप, अगर नामुमकिन तो ऐसा बयान क्यों?

Trump Third Tenure: अमेरिका में कोई भी व्यक्ति दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं बन सकता, लेकिन ट्रंप इन दिनों तीसरे कार्यकाल को लेकर चर्चा में हैं. यानी उनका इरादा अगला चुनाव लड़ने का भी है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 4 मई 2026 को व्हाइट हाउस में एक बिजनेस समिट के दौरान कहा कि वे 'अब से 8 या 9 साल बाद पद छोड़ेंगे.' जब वहां मौजूद लोग इसे मजाक समझकर हंसने लगे, तो ट्रंप ने फौरन कहा, 'मैं मजाक नहीं कर रहा हूं.' उनके इस बयान ने अमेरिकी राजनीति में भूचाल ला दिया, क्योंकि अमेरिकी संविधान के 22वें संशोधन के अनुसार कोई भी व्यक्ति दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं चुना जा सकता. फिर ट्रंप ऐसी बातें क्यों कह रहे हैं और क्या सचमुच इसके पीछे कोई बड़ी योजना है?

अमेरिकी 22वां संशोधन और इसकी अनिवार्यता

अमेरिकी संविधान में 22वां संशोधन 1951 में लागू किया गया था, जो स्पष्ट रूप से कहता है, 'किसी भी व्यक्ति को राष्ट्रपति के पद पर दो बार से ज्यादा नहीं चुना जाएगा.' दरअसल फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट को चार बार (1932, 1936, 1940 और 1944) राष्ट्रपति चुना गया था, जिसके बाद सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण को रोकने के लिए यह संशोधन लाया गया. ट्रंप 2016 और 2024 में दो बार राष्ट्रपति चुने जा चुके हैं, इसलिए संविधान के तहत वे 2028 का चुनाव नहीं लड़ सकते.

तीसरे कार्यकाल के लिए कानूनी रास्ते और बाधाएं

ट्रंप के कार्यकाल की शुरुआत होते ही, रिपब्लिकन पार्टी के सांसद एंडी ओगल्स ने 23 जनवरी 2025 को एक संविधान संशोधन प्रस्ताव पेश किया था, जिसका उद्देश्य 22वें संशोधन को बदलकर ट्रंप के लिए तीसरा कार्यकाल संभव बनाना था. इस प्रस्ताव में कहा गया कि 'कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति पद के लिए तीन बार से ज्यादा नहीं चुना जाएगा.' लेकिन यह बिल सदन में वोटिंग तक नहीं पहुंच सका और ठंडे बस्ते में चला गया.

अमेरिकी संविधान में संशोधन करना बेहद जटिल प्रक्रिया है, फिर वो ट्रंप के लिए हो या किसी और के लिए. संशोधन के लिए कांग्रेस के दोनों सदनों (प्रतिनिधि सभा और सीनेट) में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है. फिर 50 राज्यों में से कम से कम 38 राज्यों (तीन-चौथाई) की विधायिकाओं से अनुमोदन लेना होता है. मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में रिपब्लिकन पार्टी के पास इतना बहुमत नहीं है.

सीनेट की 100 सीटों में से रिपब्लिकन के पास सिर्फ 52 सीटें हैं, जबकि संशोधन के लिए 67 सीटों की जरूरत होगी. प्रतिनिधि सभा की 435 सीटों में से उनके पास 220 सीटें ही हैं. इसके अलावा, कई राज्यों में डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार है, जो ऐसे संशोधन का समर्थन करने की संभावना नहीं रखती.

तो फिर ट्रंप के बयानों के पीछे की राजनीतिक रणनीति क्या है?

विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर ए. के. पाशा का मानना है कि ट्रंप के ये बयान कोरी कानूनी महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं. वे लगातार 'तीसरे कार्यकाल' का जिक्र कर अपने समर्थकों में यह संदेश देते हैं कि उनका काम अभी अधूरा है. उनके बिना 'अमेरिका को फिर से महान बनाने' का एजेंडा पूरा नहीं हो सकता. इससे उनका जनाधार मजबूत बना रहता है और रिपब्लिकन पार्टी पर उनकी पकड़ बनी रहती है. 2026 के मध्यावधि चुनावों से पहले यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है, ताकि उनकी पार्टी कांग्रेस में बहुमत हासिल कर सके और उनके नीतिगत एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सके.

एक्सपर्ट्स ने एक अन्य संभावित रास्ते की ओर इशारा किया है. हैमिल्टन कॉलेज के प्रोफेसर फिलिप क्लिंकनर के मुताबिक, ट्रंप 2028 के चुनाव में खुद राष्ट्रपति पद का चुनाव न लड़कर, उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ सकते हैं और जेडी वेंस या किसी अन्य वफादार नेता को नाममात्र का राष्ट्रपति बना सकते हैं. यह ठीक वैसी ही रणनीति है, जैसी रूस में व्लादिमीर पुतिन ने 2008 में अपनाई थी.

पुतिन ने संविधान की दो-कार्यकाल की सीमा खत्म होने पर दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बनाकर खुद प्रधानमंत्री का पद संभाला और फिर 2012 में वापस राष्ट्रपति बन गए. कानूनी एक्सपर्ट्स इस बात पर बंटे हुए हैं कि क्या 22वां संशोधन ऐसे किसी दांव की अनुमति देता है, लेकिन यह चर्चा ट्रंप के करीबियों के बीच जरूर हो रही है.

ट्रंप का तीसरी बार राष्ट्रपति बनना बेहद पेचीदा

बहरहाल, ट्रंप का यह दावा कि वे '8-9 साल' तक राष्ट्रपति रहेंगे, संवैधानिक रूप से लगभग असंभव है. एक औपचारिक संविधान संशोधन के लिए जरूरी राजनीतिक संख्याबल उनके पास नहीं है. हालांकि, ये बयान उनकी राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा हैं, जो उनके समर्थकों को सक्रिय रखते हैं और 2026 के चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी के लिए माहौल बनाते हैं. साथ ही, सत्ता में बने रहने के लिए 'पुतिन मॉडल' जैसे अप्रत्यक्ष रास्तों की चर्चा भी जोर पकड़ रही है. फिलहाल, यह सब संभावनाएं ही हैं, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि आने वाले समय में अमेरिकी राजनीति में सत्ता और संविधान के बीच खींचतान और तेज होने वाली है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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