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Sri Lanka Crisis: आर्थिक संकट, स्थिरता, विदेशी मदद! किस तरफ आगे बढ़ रहा है श्रीलंका

Sri Lanka Crisis: श्रीलंका IMF से 3 बिलियन डॉलर का बेलआउट पैकेज सुरक्षित करना चाहता है ताकि विदेशी भंडार के सूखने से उत्पन्न आर्थिक संकट से निपटा जा सके.

Sri Lanka Crisis: श्रीलंका में भारी राजनीतिक उथल-फुथल के बाद नई सरकार का गठन हो गया है हालांकि देश की मुश्किलें कम नहीं हुई है. मंत्रिमंडल ने नव-निर्वाचित राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे (Ranil Wickremesinghe) की अगुवाई में पहली बार शनिवार (23 जुलाई) को बैठक की और आर्थिक संकट (Economic Crisis) से जूझ रहे देश में एक सप्ताह के भीतर स्थिति सामान्य करने के तरीकों पर चर्चा की. विक्रमसिंघे प्रशासन के लिए राह आसान नहीं है. श्रीलंका (Sri Lanka) की नई सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हमले के बाद शनिवार को अंतरराष्ट्रीय समुदाय (International Community), मानवाधिकार संगठनों (Human Rights Organizations) और विपक्ष की ओर से नये दबाव का सामना करना कर रही है.

इस बीच श्रीलंका और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के बीच अगले दौर की चर्चा को लेकर भी सवाल बने हए हैं. श्रीलंका IMF से 3 बिलियन डॉलर का बेलआउट पैकेज सुरक्षित करना चाहता है ताकि विदेशी भंडार के सूखने से उत्पन्न आर्थिक संकट से निपटा जा सके. बता दें द्वीप राष्ट्र ने IMF के साथ कई दौर की चर्चा की है, लेकिन अब इसके दिवालिएपन को देखते हुए परिदृश्य अलग है. हालांकि बुधवार को IMF के प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने कहा था कि वैश्विक निकाय श्रीलंका के साथ वार्ता को "जितनी जल्दी हो सके" पूरा करने की उम्मीद करता है.

सरकार को IMF को देना होगा यह आश्वासन ?
विक्रमसिंघे प्रशासन अगस्त तक आईएमएफ को ऋण पुनर्गठन पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने की योजना बना रहा है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को यह आश्वासन देना होगा कि ऋण स्थिरता बहाल की जाएगी. सरल शब्दों में, इसका मतलब यह दिखाना है कि श्रीलंका अपने ऋणों को चुकाने की क्षमता के साथ धन की अपनी जरूरतों को संतुलित कर सकता है.

इसके अलावा श्रीलंका आईएमएफ वार्ता में एक बड़ा कारक विक्रमसिंघे प्रशासन की स्थिरता और उसको जनता का सर्मथन भी होगा. इस मुद्दे पर पर विक्रमिंघे प्रशासन को बड़ी मुश्किल हो सकती है. विक्रमसिंघे की लोकप्रियता सवालों के गहरे में है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक  विक्रमसिंघे के निर्वाचन के दौरान प्रदर्शनकारी कोलंबो में "गो, रानिल, गो" नारा लगा रहे थे.

विक्रमसिंघे के खिलाफ प्रदर्शन तब ही शुरू हो गए थे जब वह प्रधानमंत्री बने थे. गोटाबाया राजपक्षे के साथ विक्रमसिंघे की निकटता की वजह सेप्रदर्शनकारियों को उनके कार्यालय पर धावा बोल दिया और पीएम के रूप में उनके इस्तीफे की मांग की.

मंत्रिमंडल की बैठक में क्या हुआ
राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे की अगुवाई में हुई नए मंत्रिमंडल की बैठक शनिवार को हुई. डेली मिरर’ अखबार ने सूत्रों के हवाले से बताया कि उन्होंने इस पर चर्चा की कि देश में प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति सचिवालय जैसे सरकारी संस्थानों और स्कूलों का कामकाज नियमित करके एक सप्ताह के भीतर स्थिति सामान्य होनी चाहिए.

मंत्रिमंडल को सूचित किया गया कि एक महीने के लिए पर्याप्त ईंधन है और कोटा व्यवस्था के तहत वितरण तेज किया जाना चाहिए.

शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमले के बाद दबाव में नई सरकार
बता दें श्रीलंका के सुरक्षा बलों ने राष्ट्रपति विक्रमसिंघे के आदेश पर शुक्रवार को तड़के छापेमारी कर कोलंबो में राष्ट्रपति कार्यालय के बाहर डेरा डाले हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों को जबरन खदेड़ दिया. कार्रवाई के दौरान सुरक्षा बलों ने दो पत्रकारों और दो वकीलों पर भी हमला किया था. अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों और वकीलों समेत 11 लोगों को गिरफ्तार भी किया है.

इसके बाद से श्रीलंका सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव झेल रही है. वैश्विक अधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) ने कहा कि राष्ट्रपति विक्रमसिंघे को तुरंत सुरक्षा बलों को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल के सभी गैरकानूनी इस्तेमाल को रोकने का आदेश देना चाहिए. इसने मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को रिहा करने और दुर्व्यवहार के लिए जिम्मेदार लोगों की जांच करके मुकदमा चलाने की भी मांग की.

श्रीलंका में अमेरिकी राजदूत (US Ambassador) जूली चुंग ने ट्वीट किया, ‘‘हम अधिकारियों से संयम बरतने और घायलों को तत्काल चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने का आग्रह करते हैं.’’ श्रीलंका में ब्रिटिश उच्चायुक्त सारा हल्टन ने कहा, ‘‘हमने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के महत्व को स्पष्ट कर दिया है.’’

नव नियुक्त राष्ट्रपति और सरकार के लिए यह घटनाक्रम एक बड़ा झटका है.

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