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बांग्लादेश सरकार को दिक्कत हिंदुओं से या फिर ISKCON से, माजरा क्या है?

मोहम्मद युनूस तो प्रधानमंत्री बनने के बाद अगस्त महीने में ही बांग्लादेश के सबसे मशहूर मंदिर ढाकेश्वरी मंदिर में जाकर आश्वासन देकर आ गए थे, तो फिर उनकी सरकार ने इस्कॉन के खिलाफ सख्त रवैया क्यों अपनाया.

बांग्लादेश में इस्कॉन से जुड़े चिन्मय प्रभु की गिरफ्तारी के मुद्दे ने इतना तूल पकड़ा है कि भारत और बांग्लादेश के संबंध भी दांव पर लग गए हैं. भारत ने गिरफ्तारी पर आपत्ति जताई तो बांग्लादेश भी भड़क गया और उसने कहा कि इस मुद्दे पर भारत को दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए. सवाल ये है कि आखिर बांग्लादेश में इस्कॉन ऐसा क्या करता है कि बांग्लादेश सरकार उसे प्रतिबंधित करना चाहती है. क्या बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ जो रहा है, उसके लिए इस्कॉन का काम जिम्मेदार है या फिर बांग्लादेश की ये नई सरकार ही हिंदुओं के खिलाफ है. आखिर क्या है बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रही जुल्म-ओ-सितम की हकीकत ?

सबसे पहले बात करते हैं बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की. तो आज की तारीख में बांग्लादेश में करीब 1 करोड़ 35 लाख हिंदू रहते हैं. इस हिसाब से भारत और नेपाल के बाद बांग्लादेश पूरी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हिंदू आबादी वाला देश है., लेकिन बांग्लादेश की आबादी के लिहाज से देखें तो ये संख्या महज 7.95 फीसदी के आस-पास ही है. इस्लाम के बाद हिंदू धर्म ही बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा धर्म भी है, इसके बावजूद बांग्लादेश में हिंदू आबादी कभी सुरक्षित नहीं रही और उनकी आबादी साल दर साल घटती रही. बांग्लादेश के बनने के तुरंत बाद जब जनगणना हुई तो 1974 में बांग्लादेश में हिंदू आबादी करीब 13.50 फीसदी थी, जो अब 8 फीसदी से भी कम हो गई है.
 
बांग्लादेश के हिंदुओं के सामने सबसे बड़ा संकट तब आया, जब 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट हो गया. शेख हसीना को अपना ही मुल्क छोड़कर भागना पड़ा. शेख हसीना भारत आ गईं और उनके पीछे रह गए बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदू जिनके ऊपर नई सरकार ने जुल्म-ओ-सितम की इंतहा कर दी. अगस्त से लेकर नवंबर महज चार महीने के अंदर-अंदर कम से कम 500 ऐसी घटनाएं हुईं, जिसमें हिंदुओं के घर जला दिए गए, उनके मंदिर जला दिए गए और उनके ऊपर हर वो जुल्म किया गया, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था.

शेख हसीना के तख्तापलट के बाद मोहम्मद युनूस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन भी हुआ. मोहम्मद युनूस ने हिंदुओं पर हमले की निंदा भी की. उन्हें सुरक्षा का भरोसा भी दिया, लेकिन अब यही मोहम्मद युनूस और उनकी पूरी सरकार बांग्लादेश में इस्कॉन के पीछे पड़ गई है और उसपर बैन लगाने के लिए अदालत तक पहुंच गई है. हालांकि, अदालत ने बांग्लादेश में इस्कॉन पर बैन लगाने से इनकार कर दिया है, लेकिन बांग्लादेश में इस्कॉन के सबसे बड़े चेहरे चिन्मय प्रभु अब भी जेल में हैं और उनकी रिहाई के लिए बांग्लादेश के हिंदू आंदोलनरत हैं.

सवाल है कि मोहम्मद युनूस ने ऐसा क्यों किय. वो तो प्रधानमंत्री बनने के बाद अगस्त महीने में ही बांग्लादेश के सबसे मशहूर मंदिर ढाकेश्वरी मंदिर में जाकर आश्वासन देकर आ गए थे, फिर ये नौबत क्यों आई? क्या मोहम्मद युनूस हिंदुओं के साथ, लेकिन इस्कॉन के खिलाफ हैं. चलिए जरा इसको भी समझने की कोशिश करते हैं. दरअसल बांग्लादेश में जो हिंदू हैं, वो बंगाली हिंदू हैं और बंगाल में या तो देवी दुर्गा की पूजा होती है या फिर मां काली की और भगवान शिव की. अविभाजित बंगाल में तो हिंदुओं के यही सबसे बड़े देवता थे. तो बंगाल के विभाजन के बाद भी जो हिंदू पहले पूर्वी पाकिस्तान और फिर 1971 में बने बांग्लादेश में रहे, उनके भी आराध्य यही देवी-देवता रहे, लेकिन फिर बांग्लादेश में इस्कॉन आ गया.

इस्कॉन का पूरा नाम है इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस. इसको हिंदी में कहते हैं अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ. 11 जुलाई 1966 को स्वामी श्रीलप्रभुपाद ने इस्कॉन की स्थापना की थी. करीब 58 साल में ही इस्कॉन ने पूरी दुनिया में 100 से ज्यादा मंदिर बना लिए हैं, जिनके 10 लाख से भी ज्यादा फॉलोवर्स हैं. भारत के अलावा अमेरिका, रूस और ब्रिटेन में तो इस्कॉन मंदिर हैं हीं, इस्लामिक देश पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी इस्कॉन के मंदिर हैं. अगर सिर्फ बात बांग्लादेश की ही करें तो वहां पर कुल मंदिरों की संख्या 40 हजार से भी ज्यादा हैं, जिनमें कम से कम 10 मंदिर इस्कॉन के हैं.

इस्कॉन का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि अब बांग्लादेश की सरकार को भी दूसरे मंदिरों और उनके प्रमुखों से उतना डर नहीं लगता, जितना डर इस्कॉन से लगता है. इसकी वजह ये है कि इस्कॉन एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसे अपने लिए समर्थन जुटाना और दूसरे हिंदू मंदिरों की तुलना में आसान हो जाता है. इसके अलावा अभी इस्कॉन के ही बड़े संत चिन्मय प्रभु की अगुवाई में बांग्लादेश में एक नई संस्था बनी है, जिसका नाम है बांग्लादेश सम्मिलित सनातन जागरण जोत. यह समूह बांग्लादेश में हिंदुओं की बेहतर सुरक्षा की मांग कर रहा है और कह रहा है कि शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में हिंदू असुरक्षित हो गए हैं और नए अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद युनूस भी हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर काम नहीं कर रहे हैं.

ऐसे में बांग्लादेश की सरकार ने हिंदुओं की सम्मिलित आवाज को दबाने के लिए चिन्मय प्रभु पर दबाव बनाया और जब नहीं माने तो उन्हें देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया. इसका इकलौता मकसद सिर्फ ये है कि चिन्मय प्रभु की गिरफ्तारी से बांग्लादेश के हिंदू अपनी आवाज न उठा पाएं, लेकिन मोहम्मद युनूस की सरकार ने जिस आवाज को दबाने की कोशिश की, वो आवाज अब भारत ने ही उठा ली है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मसले पर दखल दिया है और कहा है कि बांग्लादेश गलत कर रहा है. वहीं, बांग्लादेश में भी मोहम्मद युनूस घिर गए हैं, क्योंकि ढाका हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कर दिया है कि वो इस्कॉन पर कोई बैन नहीं लगाने जा रहा है. तो अब तय मोहम्मद युनूस और उनकी सरकार को करना है कि वो अपने देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करके भारत के साथ संबंध बेहतर रखना चाहते हैं या फिर वो भी चीन के दबाव में आकर भारत से संबंध खराब करना चाहते हैं. अगर संबंध खराब होते हैं, तो बांग्लादेश को कितना नुकसान होगा, शायद मोहम्मद युनूस को इस बात का इल्म भी नहीं होगा.
 
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