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YEAR Ender 2016: बड़े नेताओं ने छोड़ी BSP, मायावती के निशाने पर रहे मोदी और अखिलेश

लखनऊ: बहुजन समाज पार्टी ने इस गुजरते साल में जहां अपने कई कद्दावर नेताओं को पार्टी का दामन छोड़ते देखा वहीं नोटबंदी ने पार्टी को एक ऐसा मुद्दा दे दिया जिससे वह भारतीय जनता पार्टी पर सीधे निशाना साध सकी और पार्टी को विश्वास है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में जीत उसके ही हाथ लगेगी. मायावती को यह भी विश्वास है कि इस बार अल्पसंख्यक विशेषकर मुसलमान उनके साथ होंगे.

Mayawati

कई कद्दावर नेताओं ने किया BSP से किनारा

मायावती की पार्टी से इस साल कई कद्दावर नेताओं ने किनारा कर लिया. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य इनमें प्रमुख नाम है, जो बीएसपी छोडकर बीजेपी में शामिल हो गये. आर के चौधरी और ब्रजेश पाठक ने भी बीएसपी छोड़ दी.

अक्सर धन लेकर टिकट देने के आरोपों का सामना करने वाली मायावती ने कहा कि उनकी पार्टी देश में एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसके पास गलत तरीके से अर्जित धन नहीं है. उन्होंने माना कि टिकट चाहने वाले आर्थिक योगदान करते हैं और इस राशि का उपयोग पार्टी संगठन को मजबूत करने एवं चुनाव लड़ने में किया जाता है.

देश में अघोषित ‘आर्थिक इमरजेंसी’ लगाने का आरोप

नोटबंदी पर मायावती के तेवर काफी कड़े हैं. उन्होंने मोदी सरकार पर देश में अघोषित ‘आर्थिक इमरजेंसी’ लगाने का आरोप मढ़ा. उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘इतना बडा फैसला लेने से पहले गरीबों के बारे में नहीं सोचा गया और पूंजीपतियों को बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाया गया.’’ बीएसपी का मानना है कि नोटबंदी का यह फैसला बीजेपी के लिये विनाशकारी साबित होगा और लोग बीएसपी पर आस टिकायेंगे.

साल भर मायावती के निशाने पर एक ओर केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार रही तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की एसपी सरकार पर भी उन्होंने जमकर हमला बोला. कानून व्यवस्था के मुद्दे पर मायावती ने एसपी सरकार और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नाकाम होने का दावा करते हुए कहा कि एसपी सरकार की नीतियां ढुलमुल हैं और उसकी बीजेपी से मिलीभगत है. एसपी की सरकार बनने के बाद से ही कानून का राज समाप्त हो गया. मुसलमानों को अगले विधानसभा चुनाव में बीएसपी की ओर आकषिर्त करने की कवायद में मायावती ने कहा कि उत्तर प्रदेश के सर्वसमाज विशेषकर मुसलमानों को यह समझना बहुत जरूरी है कि एसपी में उनके हित सुरक्षित नहीं हैं. दो खेमों (अखिलेश-शिवपाल) में बंटी एसपी को वोट देने का मतलब बीजेपी को जिताना है.

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‘मोदी खुद अपने गिरेबान में झांककर देखें कि वह दूध के कितने धुले हैं’

मायावती एक ओर मुसलमानों से खुलकर वोट मांग रही हैं तो उन्हीं की पार्टी के नेता महासचिव सतीश मिश्र भाईचारा सम्मेलनों के जरिए समाज के अन्य तबकों खासकर ब्राहमणों को जोड़ने की कवायद में लगे हुए हैं.

‘नोटों की माला’ वाली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की टिप्पणी पर भी मायावती ने पलटवार करते हुए कहा कि दलित की बेटी माला पहने, ये बात प्रधानमंत्री को हजम नहीं होती. ‘‘मोदी खुद अपने गिरेबान में झांककर देखें कि वह दूध के कितने धुले हैं.’’ मूर्तियों और पार्कों के निर्माण के लिए विरोधियों के निशाने पर रहने वाली मायावती ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस बार बीएसपी की सरकार बनी तो उनका पूरा ध्यान कानून व्यवस्था दुरूस्त करने और विकास की ओर होगा.

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बीजेपी के निकाले गए नेता दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी पर बीएसपी नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी की विवादास्पद टिप्पणी भी इस वर्ष चर्चित रही.

साल 2012 में एसपी के हाथों गंवा दी सत्ता

कांशीराम द्वारा 1984 में गठित बीएसपी का मुख्य आधार उत्तर प्रदेश में ही है. मायावती ने 1993 में एसपी के साथ गठबंधन सरकार बनायी थी. दो जून 1995 को बीएसपी ने एसपी सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. इसके बाद तीन जून 1995 को बीजेपी की मदद से मायावती मुख्यमंत्री बनीं लेकिन अक्तूबर 1995 में बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया.

मायावती ने वर्ष 2007 में ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ का नारा देते हुए पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी लेकिन 2012 में एसपी के हाथों सत्ता गंवा दी. इस बार पार्टी फिर सत्ता में लौटने की आस बांधे हुए है.

वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में 21 सांसद भेजने वाली मायावती की पार्टी 2014 के आम चुनाव में खाता भी नहीं खोल पायी.

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