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यूपी: मुलायम सिंह के इस लाडले नेता ने सपा से बगावत कर थामा कांग्रेस का दामन, 1993 में सपा-बसपा गठबंधन को दी थी मात

कानपुर के रहने वाले पूर्व सांसद राकेश सचान का आसपास के जनपदों में दबदबा है. कुर्मी वोटरों में उनकी जबर्दस्त पैठ है. अकबरपुर लोकसभा सीट,फतेहपुर लोकसभा सीट और घाटमपुर विधानसभा सीट पर सबसे अधिक संख्या कुर्मी वोटरों की है. कुर्मी वोटर किसी भी राजनीतिक पार्टी का गणित बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं.

कानपुर: समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव के सबसे करीबी और कद्दावर नेता पूर्व सांसद राकेश सचान ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. राकेश सचान ने सपा-बसपा गठबंधन के खिलाफ फतेहपुर लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरने का मन बना लिया है. सपा का ये नेता बहुत ही जल्द कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली है.राकेश सचान ने 1993 विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के कैंडीडेट को हरा कर अपनी क्षमता का परिचय दिया था. 2019 लोकसभा चुनाव सपा-बसपा गठबंधन मिलकर चुनाव लड़ने जा रहे हैं. फतेहपुर लोकसभा सीट बसपा के खाते में जाने नाराज राकेश सचान ने 1993 का इतिहास दोहराने की चेतावनी दी है.

कानपुर के रहने वाले पूर्व सांसद राकेश सचान का आसपास के जनपदों में दबदबा है. कुर्मी वोटरों में उनकी जबर्दस्त पैठ है. अकबरपुर लोकसभा सीट,फतेहपुर लोकसभा सीट और घाटमपुर विधानसभा सीट पर सबसे अधिक संख्या कुर्मी वोटरों की है. कुर्मी वोटर किसी भी राजनीतिक पार्टी का गणित बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं.

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सपा बसपा गठबन्धन हो चुका है. जिसमे फतेहपुर लोकसभा सीट बसपा के खाते में चली गई.राकेश सचान का मानना है कि 2014 का लोकसभा चुनाव फतेहपुर में हारने के बाद मैं लगातार वहा पर अपनी जमीन मजबूत कर रहा था. एक-एक बूथ पर जाकर अपनी टीम खड़ी की है. इसके लिए दिन रात मेहनत की है और जब चुनाव का वक्त आया तो यह सीट बसपा के खाते में चली गई. इस सम्बन्ध में जब राष्ट्रीय अध्यक्ष से बात की तो उन्होंने कहा सब ठीक हो जाएगा. कोई अश्वासन नहीं मिलने से नाराज राकेश सचान अब कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली है.

राकेश सचान ने कांग्रेस ज्वाइन करने से पहले कांग्रेस पार्टी के सामने कई शर्ते भी रखी थीं. शर्तो में लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्या सिंधिया की कम से कम दो रैली उनके क्षेत्र में होनी चाहिए. इसके साथ ही कांग्रेस के अन्य नेता और फ़िल्मी सितारे भी रोड शो करें.

राकेश सचान ने डीएवी कॉलेज से छात्र राजनीति कर पॉलटिक्स का हुनर सीखा. 1992 में उन्होंने जनतादल पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और सक्रिय राजनीति में उतर गए. 1993 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने थे बीजेपी के बढ़ते जनाधार को रोकने के लिए मुलायम सिंह यादव और कांसीराम ने साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया था.

1993 में घाटमपुर विधानसभा सीट से सपा-बसपा गठबंधन ने संयुक्त प्रत्याशी विजय सचान को मैदान में उतारा था. वहीं जनतादल ने राकेश सचान को गठबंधन के प्रत्याशी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतार दिया. जब चुनाव का परिणाम आया तो सभी हैरत में पड़ गए राकेश सचान ने रिकार्ड वोटो से जीत हासिल की. तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह से बहुत प्रभावित हुए और राकेश सचान को सपा ज्वाइन करने का ऑफर दिया था. राकेश सचान ने जनतादल छोड़कर सपा के सक्रिय सदस्य बन गए.

राकेश सचान को 1996 विधानसभा चुनाव में सपा ने घाटमपुर से अपना प्रत्याशी बनाया लेकिन इस चुनाव में वो बसपा के राजाराम पाल से हार गए. इसके बाद 2002 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने फिर वापसी की. इसके साथ ही अब मुलायम सिंह उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी देने का मन बना चुके थे. राकेश सचान को 2009 में फतेहपुर लोकसभा सीट से कैंडीडेट बनाया गया था. राकेश सचान ने बसपा के महेंद्र प्रसाद निषद को लगभग एक लाख वोटो से हरा कर धमाकेदार जीत दर्ज की थी. इस जीत के राकेश सचान मुलायम सिंह और शिवपाल सिंह बेहद करीबी बन गए.

2014 के लोकसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव में फतेहपुर से सांसद और केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने राकेश सचान को 306270 वोटों से हराया था. बल्कि राकेश सचान फतेहपुर में तीसरे स्थान पर रहे थे और बसपा के अफजल सिद्दकी दूसरे स्थान पर रहे थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की साध्वी निरंजन ज्योति को 485,994 वोट मिले थे. बसपा के अफजल सिद्दकी को 298,788 वोट मिले थे. सपा के राकेश सचान को 179,724 वोट मिले थे.

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