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मोरबी में पुल गिरने से पहले भी हो चुकी हैं ऐसी बड़ी दुर्घटनाएं, जो थीं लापरवाही और इंसानी चूक का नतीजा

भारत में इस तरह की पहली दुर्घटना नहीं है. इससे पहले हुए हादासों से भी सरकार या प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया है. खास बात ये है कि मोरबी की तरह ही इन दुर्घटनाओं में भी लापरवाही या इंसानी चूक पाई गई थी.

गुजरात के मोरबी शहर में मच्छु नदी पर केबल पुल हादसे में मरने वालों की संख्या बढ़कर सोमवार को 134 हो गई है. यह पुल करीब एक सदी पुराना था और मरम्मत के बाद हाल ही में इसे लोगों के लिए खोला गया था. रविवार की शाम इस पुल पर लोगों की काफी भीड़ इकट्ठा हो गई थी. इस बीच ज्यादा वजन होने के चलते पुल टूट गया और सैकड़ों लोग नदी में गिर गए.

राजकोट के रेंज महानिरीक्षक अशोक यादव ने बताया, 'पुल टूटने की घटना में मरने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 134 हो गयी है.' राज्य के सूचना विभाग ने बताया कि राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) के पांच दल, राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) के छह दल, वायु सेना का एक दल, सेना की दो टुकड़ियां तथा भारतीय नौसेना के दो दलों के अलावा स्थानीय बचाव दल तलाश अभियान में शामिल हैं.  तलाश अभियान रात भर चला, जो अब भी जारी है.

हालांकि भारत में इस तरह की पहली दुर्घटना नहीं है. इससे पहले हुए हादासों से भी सरकार या प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया है. खास बात ये है कि मोरबी की तरह ही इन दुर्घटनाओं में भी लापरवाही या इंसानी चूक पाई गई थी.


भोपाल गैस कांड

साल 1984...तारीख थी 2 -3 दिसंबर की रात...भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी की फैक्टरी से जहरीली गैस लीक होती है और धीरे-धीरे इसने पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया.  रात में सो रहे लोगों को दम घुटने लगा. नींद खुली तो पीड़ित सांस लेने के लिए घरों से बाहर आ गए. लेकिन बाहर वो जहरीली गैस मौत बनकर इंतजार कर रही थी. लोग जितनी सांस अंदर खींचते वो शरीर में घुस रही थी.

कई लोग तो सोते हुए मौत के आगोश में चले गए और जो बच गए वो अंधे हो गए. इस गैस के प्रकोप आज भी उस इलाके में देखा जा सकता है. आंकड़ों की मानें तो इस कांड में 10 हजार लोगों की मौत हो गई थी. हालांकि ये संख्या आज तक विवादों में है.

यह घटना इंसानी चूक और लापरवाही का नतीजा था. फैक्टरी में गैस लीक की जांच ठीक से नहीं होती थी. भारत में आज भी कई ऐसे फैक्टरियां कायदा-कानून को ताक पर रखकर चलाई जाती हैं. 

कोलकाता के अस्पताल में अग्निकांड

9 दिसंबर साल 2011 को कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में सुबह 3 बजे आग लग गई. घटना के वक्त अस्पताल में सभी मरीज और स्टाफ सो रहे थे. आग ने धीरे-धीरे अस्पताल को चपेट में ले लिया. मरीज उस आग में फंस गए. सभी खिड़कियों में लोहे की ग्रिल लगी थी. अस्पताल के अंदर धुआं फैलने लगा जिससे वहां मौजूद लोगों का दम घुटने लगा.

अस्पताल का स्टाफ पूरी तरह से असहाय नजर आ रहा था. लेकिन अस्तपताल के बगल में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों ने मोर्चा संभाला और कई मरीजों को बाहर निकालने में जुट गए. इन लोगों ने खिड़की में लगी ग्रिल को तोड़कर कई मरीजों और स्टाफ के लोगों को बाहर निकाला.  घटना के वक्त 160 मरीज अस्पताल में थे जिनमें से 89 की मौत हो गई.  जिसमें 4 अस्पताल  के कर्मचारी शामिल थे.

इस घटना की जांच में भी लापरवाही की बात सामने आई थी. पाया गया कि अस्पताल मैनेजमेंट ने आग से बचाव के प्रावधानों का पालन नहीं किया था. साथ ही आपातकाल के समय के लिए बनाए एसओपी का भी ध्यान नहीं रखा गया.

कोलकाता के गिरीश पार्क में पुल गिरा 

साल 2009 की तारीख 31 मार्च को दोपहर के आसपास गिरीश पार्क में निर्माणाधीन पुल का एक हिस्सा गिर गया. इस घटना में 27 लोगों की मौत हो गई और 78 लोग घायल हो गए.

जांच पाया गया कि इस पुल के बनाने की समय सीमा कई बार पूरी हो चुकी थी. प्रोजेक्ट की लागत लगातार बढ़ती जा रही थी. जो बिल्डर इसे बना रहा था वो राज्य सरकार से लगातार फंड जारी करने का मांग कर रहा था. दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से दबाव भी था कि आने वाले इलेक्शन से पहले इस प्रोजेक्ट को पूरा करना है.

दिल्ली के ललितापार्क में बिल्डिंग गिरी

15 नवंबर 2010 को पश्चिमी दिल्ली के ललिता पार्क इलाके में पांच मंजिला इमारत गिर गई जिसमें 60 से ज्यादा  लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए. घटना के समय इस बिल्डिंग में अच्छी-खासी भीड़ थी. जांच में पाया गया कि बिल्डिंग के निर्माण में घटिया क्वालिटी का सामान लगाया गया था और गैर-कानूनी तरीके से इसकी मंजिलों का निर्माण किया गया था. इसके साथ ही उस समय आई बाढ़ भी इसके ढहने की एक वजह मानी गई थी.

लेकिन इस घटना से साफ हो गया था कि अवैध निर्माण को लेकर सरकारी अमला किस तरह से उदासीन बना रहता है. इस तरह के मामले में दिल्ली में हुई इस घटना के बाद भी सामने आते रहते हैं लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई सख्त  कदम नहीं उठाए गए हैं.

महाकुंभ मेला में भगदड़

धार्मिक आयोजन के दौरान भारत में भगदड़ की कई घटनाएं हो चुकी हैं. साल 1954 में प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ के दौरान हुई भगदड़ में 800 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई. इस घटना में 100 से ज्यादा लोग घायल भी हुए थे. इसी तरह साल 2005 में महाराष्ट्र के सतारा जिले के मंढेर देवी मंदिर में हुई भगदड़ में 350 लोगों की मौत और 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे.

 

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