Xप्लेन: अब बीजेपी संगठन के बाद PM मोदी कैबिनेट बदलेगी? क्या मिले संकेत
Modi Cabinet Reshuffle: मोदी कैबिनेट में बदलाव की संभावना बहुत मजबूत है. परिसीमन बिल और दक्षिण-पश्चिम की पार्टियों से गठबंधन अटका है. कैबिनेट बदलाव एक-दो मंत्रियों का नहीं, बड़े पैमाने पर हो सकता है.

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम के बाद अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चा है. सूत्रों के मुताबिक, संगठन में बदलाव महज एक 'ट्रेलर' था, असली 'फिल्म' यानी कैबिनेट में बड़ा बदलाव अभी बाकी है. यह बदलाव की बातें सिर्फ हवा-हवाई नहीं हैं, बल्कि इसके संकेत मिलना शुरू हो गए हैं. तो क्या वाकई मोदी कैबिनेट बदलेगी, क्या संकेत मिल रहे और कितना बदलाव मुमकिन है...
एक्सपर्ट्स पैनल
- अमिताभ तिवारी- पॉलिटिकल एंड इलेक्शन एनालिस्ट
- रशीद किदवई- पॉलिटिकल एक्सपर्ट
मोदी कैबिनेट विस्तार की चर्चा क्यों तेज हुई?
अगस्त 2026 तक मोदी सरकार तीसरे कार्यकाल का करीब आधा वक्त पूरा कर चुकी है. पिछले कुछ महीनों में कई ऐसे घटनाक्रम हुए हैं, जिन्होंने कैबिनेट फेरबदल की अटकलों को हवा दी है:
- धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: पिछले महीने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दिया, जिसके बाद प्रह्लाद जोशी को अतिरिक्त प्रभार दिया गया.
- रवनीत सिंह बिट्टू का पद छोड़ना: 24 जुलाई 2026 को राज्यसभा का कार्यकाल पूरा होने के बाद रेलवे और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने पद छोड़ दिया.
- जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा: जून 2026 में राज्यसभा कार्यकाल पूरा होने के बाद अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने भी इस्तीफा दिया.
- मंत्रियों को संगठन की जिम्मेदारी: कई केंद्रीय मंत्रियों को पहले ही संगठन में अहम जिम्मेदारियां दे दी गई हैं. राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष और पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया है.
- संसद सत्र का समापन: मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संसद के मानसून सत्र (अगस्त 2026) के खत्म होने से पहले कैबिनेट विस्तार की संभावना कम थी. अब सत्र समाप्त हो चुका है और संगठन की नई टीम भी आ गई है, ऐसे में सबकी नजर संभावित कैबिनेट विस्तार पर है.
'एक व्यक्ति-एक पद' का फॉर्मूला और पीयूष गोयल का क्या होगा?
बीजेपी की नई टीम में सबसे चर्चित नाम केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल का है, जिन्हें पार्टी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया है. यह नियुक्ति इसलिए अहम है क्योंकि वे एकमात्र ऐसे केंद्रीय मंत्री हैं, जिन्हें नितिन नवीन की नई टीम में जगह मिली है.
बीजेपी का 'एक व्यक्ति-एक पद' का अलिखित नियम है, जिसके तहत कोई नेता एक साथ सरकार और संगठन, दोनों में बड़ी जिम्मेदारी नहीं निभा सकता. इसी वजह से गोयल की नियुक्ति के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या उन्हें कैबिनेट से हटाकर पूरी तरह संगठन की जिम्मेदारी दी जाएगी.
हालांकि, अमिताभ तिवारी कहते हैं कि यह नियम पूरी तरह से लागू नहीं होता. इसका सबसे बड़ा उदाहरण जे.पी. नड्डा हैं, जो जून 2024 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री बने और जनवरी 2026 में नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने तक वे बीजेपी अध्यक्ष भी बने रहे. ऐसे में यह साफ नहीं है कि गोयल को तुरंत कैबिनेट से हटाया ही जाएगा. गोयल फिलहाल अमेरिका के साथ चल रही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की बातचीत का नेतृत्व कर रहे हैं, इसलिए उन्हें हटाना सरकार के लिए आसान फैसला नहीं होगा.
किन-किन नेताओं को मिल सकती है कैबिनेट में जगह?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इन 3 नामों का कैबिनेट में शामिल होने के चांस ज्यादा है:
- अनुराग ठाकुर: हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को बीजेपी की नई संगठनात्मक टीम में जगह नहीं मिली है. ऐसे में उनके मोदी कैबिनेट में वापसी की संभावना बढ़ गई है. उन्हें पार्टी का प्रखर और मजबूत युवा चेहरा माना जाता है.
- तेजस्वी सूर्या: बीजेपी युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद तेजस्वी सूर्या अब संगठन में किसी बड़ी जिम्मेदारी में नहीं हैं. 2019 से बेंगलुरु दक्षिण से सांसद, वे पार्टी के प्रखर वक्ता और युवा चेहरे माने जाते हैं. इससे उन्हें कैबिनेट में जगह मिल सकती है.
- राघव चड्ढा: अप्रैल 2026 में आम आदमी पार्टी (AAP) छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए सात राज्यसभा सांसदों में राघव चड्ढा का नाम शामिल है. संगठन की नई टीम में उन्हें जगह नहीं मिली है, जिससे अटकलें तेज हो गई हैं कि उन्हें कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है. 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बीजेपी उन पर दांव लगा सकती है. वहीं, AAP से आए एक अन्य नेता संदीप पाठक को बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है.
UP चुनाव और दक्षिण-पश्चिम की पार्टियों का समीकरण
अमिताभ तिवारी के मुताबिक, यह वह हिस्सा है जिसे सबसे कम समझा गया है, लेकिन शायद यही सबसे अहम वजह है कि कैबिनेट विस्तार में देरी हो रही है. अंदरखाने खबर है कि बीजेपी अपने पाले में दक्षिण और पश्चिम की पार्टियों को सरकार में शामिल करना चाह रही है. यह कोई छोटा मामला नहीं है. यह NDA के विस्तार की बड़ी रणनीति का हिस्सा है.
- दक्षिण भारत: बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. तमिलनाडु और केरल में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं. फिलहाल NDA की सरकार दक्षिण भारत में सिर्फ आंध्र प्रदेश में है. ऐसे में बीजेपी दक्षिण की क्षेत्रीय पार्टियों को NDA में लाने की कोशिश कर रही है. अगर ये पार्टियां NDA में शामिल होती हैं, तो उन्हें कैबिनेट में प्रतिनिधित्व देना होगा और इसी के लिए जगह बचाकर रखी जा सकती है.
- पश्चिम भारत: यहां सबसे बड़ा समीकरण राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) को लेकर है. केंद्रीय मंत्री और RPI(A) प्रमुख रामदास आठवले ने 17 अगस्त 2026 को साफ संकेत दिए कि कैबिनेट फेरबदल 'बहुत जल्द' हो सकता है. आठवले ने यह भी कहा कि शरद पवार के नेतृत्व वाली NCP (SP) को NDA में शामिल होना चाहिए. इससे सरकार की विकास योजनाओं को मजबूती मिलेगी. उन्होंने सुझाव दिया कि अगर शरद पवार इसके लिए राजी होते हैं तो NCP (SP) के 8 सांसद NDA में शामिल हो सकते हैं.
इसके अलावा, आठवले ने यह भी संकेत दिया कि फेरबदल में बीजेपी और उसकी सहयोगी NCP (अजित पवार गुट) से नए चेहरों को शामिल किया जा सकता है. यानी कैबिनेट विस्तार में देरी की एक बड़ी वजह यह हो सकती है कि बीजेपी पहले दक्षिण और पश्चिम की पार्टियों के साथ गठबंधन की बातचीत पूरी कर लेना चाहती है, ताकि नए सहयोगियों को भी मंत्रिमंडल में जगह दी जा सके.
परिसीमन बिल: क्या सबसे बड़ी अड़चन?
यह दूसरा बड़ा मुद्दा है जिसे समझना जरूरी है.

मानसून सत्र 13 अगस्त 2026 को समाप्त हो गया, लेकिन संसद को औपचारिक रूप से सत्रावसान नहीं किया गया, ताकि सरकार जरूरत पड़ने पर कम समय में फिर से सदन बुला सके.
परिसीमन बिल और कैबिनेट विस्तार में क्या कनेक्शन है?
रशीद किदवई के मुताबिक, परिसीमन बिल पास कराना सरकार की पहली प्राथमिकता है. अगर यह बिल पास हो जाता, तो कैबिनेट विस्तार हो सकता था. लेकिन बिल अटका हुआ है और इसी के चलते कैबिनेट विस्तार में भी देरी हो रही है. दूसरी तरफ, विपक्षी दलों खासकर DMK ने इस बिल पर कुछ आश्वासन मांगे हैं, जिससे मामला और पेचीदा हो गया है.
यानी कैबिनेट विस्तार की राह में दो बड़ी रुकावटें हैं- एक तरफ दक्षिण-पश्चिम की पार्टियों के साथ गठबंधन की बातचीत, दूसरी तरफ परिसीमन विधेयक का अधर में लटकना.
तो अब क्या होगा आगे?
अमिताभ तिवारी का कहते हैं, 'बीजेपी के संगठनात्मक बदलाव का काम पूरा हो चुका है. मोदी सरकार में कई खाली पद हैं और अगले साल 7 राज्यों में चुनाव हैं. ऐसे में कैबिनेट विस्तार की संभावना काफी मजबूत है. हालांकि, अभी तक इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि कब और किस हद तक फेरबदल होगा. इतना तय है कि संगठन में बदलाव के बाद अब सरकार में बदलाव की बारी है. यह बदलाव आने वाले दिनों में किसी भी वक्त हो सकता है.'























