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तालिबान बढ़ा रहा भारत की तरफ दोस्ती का हाथ, क्या धोखे की साजिश है उस पार?

पाकिस्तान का फ़ॉस्टर चाइल्ड माना जाने वाला तालिबान भारत की तरफ झुक रहा है. अफ़गानिस्तान की तालिबानी सरकार ने कहा कि भारत इस देश में 20 रुकी हुई परियोजनाओं को फिर से शुरू कर सकता है.

अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार ने 30 नवंबर को एक ऐलान कर पूरी दुनिया को चौंका दिया है. तालिबान ने कहा कि भारत इस देश में अपनी रुकी हुई परियोजनाओं को दोबारा से शुरू कर सकता है. उधर जब भारत के पड़ोसी देश में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी ने पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा खोल रखा हो ऐसे में तालिबान का भारत को न्योता देना बहुत कुछ कह रहा है.

दरअसल 28 नवंबर को टीटीपी के रक्षा प्रमुख मुफ्ती मुजाहिम ने एक खत के जरिये पाकिस्तानी सरकार खिलाफ के युद्धविराम खत्म करने का ऐलान किया था और उसके एक ही दिन बाद अफगानिस्तानी तालिबान के भारत को लेकर सकारात्मक रूख अपनाने में दुनिया को साजिश की बू आ रही है.

तालिबान के भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने को लेकर इसी देश के खुफिया विभाग के पूर्व अधिकारियों ने भारत को आगाह भी किया है. उनका कहना है कि तालिबानी हुकूमत वाला अफगानिस्तान भारत से रिश्ते बेहतर भले ही कर लें, लेकिन किसी भी कीमत पर उसे अपनी सुरक्षा पर कोताही नहीं बरतनी चाहिए. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर तालिबान भारत से क्या चाहता है? 

तालिबान क्यों ले रहा दिलचस्पी भारत में?

तालिबान ने बुधवार को कहा कि भारत अफगानिस्तान में 20 रुकी हुई परियोजनाओं को फिर से शुरू कर सकता है. अफगानिस्तान के न्यूज चैनल टोलो न्यूज ने अफगानिस्तान के शहरी विकास और आवास मंत्रालय (एमयूडीएच) के हवाले से कहा, "उम्मीद है कि भारत देश के कई प्रांतों में कम से कम 20 परियोजनाओं पर काम फिर से शुरू करेगा.

एमयूडीएच के प्रवक्ता मोहम्मद कमाल अफगान ने ये भी कहा," ये परियोजनाएं पूर्व सरकार के दौरान लागू की गई थीं, लेकिन राजनीतिक परिवर्तन या अन्य मुद्दों की वजह से देरी हुई.वे अब इन परियोजनाओं को फिर से शुरू करने में दिलचस्पी रखते हैं." दरअसल भारत ने काबुल में 90 मिलियन डॉलर में अफगान संसद का निर्माण किया. इस इमारत में एक ब्लॉक का नाम पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखा गया है.

इस बीच "पजवोक अफगान न्यूज ने कहा कि शहरी विकास और भूमि मामलों के कार्यवाहक मंत्री मौलवी हमदुल्ला नोमानी ने भारत के बिजनेस समुदाय से अफगानिस्तान के शहरी विकास क्षेत्र में निवेश करने की अपील की है. मंत्रालय ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा कि कार्यवाहक मंत्री नोमानी ने काबुल में भारतीय दूतावास के प्रभारी चार्जेज द अफेयर (उपराजदूत) भारत कुमार से मुलाकात की. 

इस दौरान कार्यवाहक मंत्री नोमानी ने कहा, "भारतीय व्यवसायी शहरी और आवासीय क्षेत्र में निवेश कर सकते हैं, खास तौर से न्यू काबुल सिटी परियोजना में." नुमानी ने आगे कहा, "भारत ने अतीत में अफगानिस्तान में कुछ परियोजनाओं पर काम किया है, भुगतान न होने की वजह से उनमें से कुछ अधूरी रहीं." उन्होंने भारत सरकार से अधूरी परियोजनाओं के बारे में भी अपना रुख साफ करने को कहा.

इस मुलाकात के दौरान अफगानी मंत्री मौलवी हमदुल्ला नोमानी ने भारतीय उपराजदूत से नागरिक और शहरी विकास क्षेत्र में अफगान इंजीनियरों को अधिक हुनरमंद बनाने और उनकी कुशलता बढ़ाने के लिए भी योगदान देने की अपील की. इसके लिए मास्टर और पीएचडी डिग्री के लिए अफगान नागरिकों को छात्रवृत्ति देने की मांग की गई है.

टोलो न्यूज की रिपोर्ट की माने तो एमयूडीएच ने कहा कि भारत के चार्जेज द अफेयर कुमार ने रिश्तों को सुधारने और अफगानिस्तान में दिल्ली की परियोजनाओं को फिर से शुरू करने में दिलचस्पी दिखाई है. उपराजदूत कुमार ने अफगानिस्तान के शहरी विकास और आवास मंत्री हमदुल्लाह नोमानी के साथ काबुल की एक बैठक में ये बात कही थी. 

अफगान बाशिंदों, अखबार,अर्थशास्त्रियों को भी आस

टोलो न्यूज के मुताबिक, अफगानिस्तान के अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि परियोजनाओं के फिर से शुरू होने से यहां नौकरी के अवसर बढ़ेंगे और देश में विकास को बढ़ावा मिलेगा. एक अफगानी अर्थशास्त्री दरिया खान बहीर का कहना है,"इन परियोजनाओं की बहाली लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकती है और अफगानी लोगों की आय बढ़ा सकती है और अफगानिस्तान को राजनीतिक अलगाव से बाहर निकाल सकती है."

वहीं अर्थशास्त्री नाज़कमिर ज़िरमल ने कहा, "इन परियोजनाओं के फिर से शुरू होने से ग़रीबी और बेरोज़गारी के स्तर में कमी आएगी. अफगानियों का मानना ​​है कि परियोजनाओं को लागू करने से नौकरी के अवसर बढ़ेंगे, गरीबी और बेरोजगारी कम होगी और देश में विकास को बढ़ावा मिलेगा. 

क्या है भारत का रुख?

भारत के चार्जेज द अफेयर (उपराजदूत) भारत कुमार ने कहा कि अफगानिस्तान का एमयूडीएच मंत्रालय सभी बताई गई परियोजनाओं के बारे में जानकारी साझा कर सकता है. वह भारत सरकार को उनकी परेशानियों को सुलझाने और सभी परियोजनाओं को इस्तेमाल के लिए तैयार करने के अनुरोध  का संदेश देंगे. उन्होंने आगे कहा कि उन्हें नई काबुल परियोजना के बारे में कुछ जानकारी मिली है और वो उनके बारे में भारतीय निवेशकों से जरूर बात करेंगे. 

दरअसल अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता पर काबिज होने के बाद भारत को अफगानिस्तान में अपने सभी प्रोजेक्ट बंद करने पड़े थे. इसके बाद भारत ने यहां अपना दूतावास  बंद कर दिया था. इस दूतावास ने यहां  कुछ महीने पहले फिर से काम करना शुरू किया है. हालांकि यहां भारत में अभी भी सुरक्षा के मुद्दों को लेकर चिंता है. हाल ही में यहां इस्लामिक स्टेट आतंकवादियों ने कई नागरिक परियोजनाओं, धार्मिक स्थलों और रूसी दूतावास को निशाना बनाया था.

भारत के अफगानिस्तान में प्रोजेक्ट खास

दरअसल अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार के आने से पहले भारत ने यहां लगभग तीन बिलियन डॉलर की डेवलपमेंट और कैपेसिटी बिल्डिंग प्रोजेक्ट में निवेश किया था. अफगानिस्तान में भारत की मदद से चलने वाली महत्वपूर्ण परियोजनाओं में साल 2016 में हेरात प्रांत में 42 मेगावॉट (42MW) के सलमा बांध का उद्घाटन रहा. इसे  अफगान-भारत मैत्री बांध के तौर पर में जाना जाता है.

यहां की अन्य हाई-प्रोफाइल परियोजना 218-किमी जरांज-डेलाराम राजमार्ग शामिल है जो भारत के सीमा सड़क संगठन ने बनाया है. जरांज ईरान के साथ अफगानिस्तान की सीमा के करीब एक जगह है. भारत ने काबुल में 90 मिलियन डॉलर में अफगान संसद भी बनाई है. 2016 में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और प्रधानमंत्री मोदी ने काबुल में मरम्मत के बाद खोले गए स्टोर पैलेस का उद्घाटन किया. इसे 19वीं शताब्दी के अंत में बनाया गया था.

भारत ने काबुल में एक महत्वपूर्ण अस्पताल भी बनाया है. इससे पहले भारत यहां मानव संसाधन के विकास, पेशेवरों को प्रशिक्षण देने और भारत में पढ़ाई के लिए अफगान छात्रों को बड़ी संख्या में छात्रवृत्ति और प्रवेश की पेशकश जैसी मदद करता रहा है. यहां शुरू की गई अधिकतर भारतीय परियोजनाएं लोगों को फायदा देने वाली हैं जो अफगानिस्तान के सभी 34 प्रांतों में हैं. इनका मकसद इसे एक आत्मनिर्भर देश बनाना था.  भारत ने अफगानिस्तान से क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने के लिए एयर फ्रेट कॉरिडोर और चाबहार पोर्ट को शुरू किया है.

मौजूदा वक्त में  भारत अफगानिस्तान में मानवीय हालातों को लेकर बेहद चिंता करता रहा है. यही वजह है कि भारत ने अफगानिस्तान को मानवीय मदद भी दी है.  इनमें 40,000 मीट्रिक टन गेहूं के साथ ही जरूरी जीवन रक्षक दवाएं की लगभग 50 टन मेडिकल एड भी शामिल हैं. इसमें  टीबी की दवाएं, कोविड वैक्सीन की 500,000 खुराकें, जरूरी मेडिकल, सर्जिकल सामान और 28 टन अन्य आपदा राहत सामग्री शामिल हैं.

अफगानिस्तान के पूर्व खुफिया चीफ ने किया आगाह

अफगानिस्तान के पूर्व खुफिया प्रमुख रहे रहमतुल्लाह नबील ने भारत को इस देश को लेकर आगाह किया है.  उनका कहना है कि भारत को अफगानिस्तान के साथ दोस्ती के रिश्तों में बेहद सावधानी बरतने की जरूररत है. उसे अपनी सुरक्षा को लेकर सचेत रहना चाहिए, क्योंकि इस देश में विश्व के खतरनाक आतंकी संगठन अपना आशियाना बनाए हुए हैं.

इनमें भारत के जम्मू-कश्मीर में आतंकी वारदातों को अंजाम देने वाले लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद भी शामिल है. द हिंदू अखबार को को दिए इंटरव्यू में नबील ने कहा कि भारत के खुद के फायदे के लिए तालिबान सरकार  के साथ बातचीत जरूरी थी, लेकिन भारत सरकार को इस देश के पुराने नेताओं से भी राब्ता रखना चाहिए.

गौरतलब है कि नबील अफगानिस्तान के दो पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और अशरफ गनी के वक्त राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय (NDS) के डायरेक्टर रहे थे. 6 साल के अपने 2010 से 2015 के कार्यकाल के वक्त उन्होंने भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करने में अहम योगदान दिया था.

भारत ने साल 2021 में उन्हें सुरक्षा कारणों से वीजा देने से इंकार कर दिया था. इस बात का जिक्र नबील ने अमेरिका और यूरोपीय संघ के तालिबान विरोधी अफगान नेताओं के एक सम्मेलन के दौरान किया था. वो भारत के साथ अपने अच्छे और दोस्ताना रिश्तों को लेकर तालिबान के आंख की किरकिरी रहे हैं. 

टीटीपी, तालिबान और पाकिस्तान का रिश्ता
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को  पाकिस्तानी तालिबान (टीटीपी) भी कहते हैं. अब तक पाकिस्तान में आए सभी चरमपंथी संगठनों में से टीटीपी सबसे खूंखार  माना जाता है. मलाला यूसुफजई पर हमला करने वाला यही संगठन था.

2002 में अमेरिकी कार्रवाई के बाद अफगानिस्तान से  कई आतंकी भागकर पाकिस्तान के क़बायली इलाकों छुपने के लिए आए थे. इन के खिलाफ एक्शन लेने पर स्वात घाटी में पाकिस्तानी सेना की नाफरमानी होने लगीं और कबायली इलाकों में विद्रोही गुट पैदा होने लगे.

दिसंबर 2007 में बेयतुल्लाह मेहसूद के नेतृत्व में 13 गुट तहरीक में साथ आ गए. तहरीक का मतलब होता है अभियान इसलिए इस संगठन को तहरीक-ए-तालिबान नाम दिया गया.ये अफगानिस्तान की तालिबान से अलग है, लेकिन उनकी विचारधाराओं से काफ़ी हद तक राजी है.

दरअसल इसी टीटीपी ने 30  नवंबर को पाकिस्तान की सरकार के संग संघर्ष विराम खत्म होने का एलान कर डाला और अपने लोगों को पूरे पाकिस्तान में हमला करने का आदेश दिया. इससे पाक सेना और टीटीपी के बीच लड़ाई का जोखिम और बढ़ा है.

उधर अफगानी तालिबान से पाकिस्तान की दोस्ती से कोई इनकार नहीं कर सकता. पूर्व अफगानी सरकार तो साफ तौर पर तालिबान को पाकिस्तान का  प्रतिनिधि कहती थी और 15  अगस्त 2021 तक ऐसा भी था, लेकिन अब तालिबान महज लड़ाकों की टोली नहीं अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज है. अब वो बराबरी के रिश्ता की चाह रखते हैं.

ऐसे में पाक सरकार का तालिबान का सहारा लेकर टीटीपी को काबू करने आसान नहीं है. जब यहां के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो इस मामले के समाधान में अफगान तालिबान की मदद की आस रखते हों. इसी काम विदेश राज्यमंत्री हिना रब्बानी खर काबुल गई हों, लेकिन पाक की ये कोशिशें कितनी रंग लाएंगी ये तो वक्त ही बताएगा.

वहीं जानकारों का मानना है कि अफगान तालिबान टीटीपी को किसी कीमत पर खफा नहीं करना चाहेगा, आखिर उसने पश्चिमी देशों की सेनाओं के खिलाफ लड़ी जंग में उसका साथ जो दिया था. 

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