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कौन थे कबीरदास, जिनकी मजार पर आज पीएम मोदी ने चढ़ाई चादर?

कबीर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय की रुढ़ियों के घोर आलोचक थे. अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मस्जिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे.

नई दिल्ली: "आया है किस काम को किया कौन सा काम, भूल गए भगवान को कमा रहे धनधाम" ये शब्द 15वीं सदी के कवि और संत कबीर के हैं. हिंदी साहित्य में कबीर का स्थान एक बेहद तर्कवादी और मानवीय मूल्यों के रचनाकार के रूप में है. कबीर के जन्म को लेकर कई किंवदन्तियां हैं. कुछ लोगों के उनुसार कबीर विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे. ब्राह्मणी ने उस नवजात शिशु को वाराणसी में लहरतारा ताल के पास फेंक दिया था. फिर उस बच्चे को नीरू नाम जुलाहा अपने घर लाया और उसका पालन पोषण किया. वहीं कुछ लोगों का मानना है कि कबीर जन्म से ही मुसलमान थे. युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से उन्हें हिंदु धर्म की बातें मालूम हुईं. कहा जाता है कि एक रात कबीर गंगा की सीढ़ीयों पर पड़े हुए थे और गंगास्नान के लिए जाते वक्त रामानन्द का पैर कबीर के उपर पड़ा. उनके मुंह से राम-राम निकल गया. इसके बाद कबीर ने रामानन्द को अपना गुरु मान लिया. कबीर खुद लिखते हैं, "हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये."

कबीर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय की रुढ़ियों के घोर आलोचक थे. कबीर लिखते हैं,"कंकर पत्थर जोरि के मस्जिद लयी बनाय. ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय." कबीर एक ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे. अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मस्जिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे. कबीर की कोई पारंपरिक रुप से पढ़ाई लिखाई नहीं हुई थी. कबीर कहते हैं, "मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ." कबीर ने स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा है. उन्होंने बस मुंह से शब्दों को बोला और उनके शिष्यों ने उनके ग्रंथ लिखे.

कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या अलग-अलग है. एच.एच विल्सन के अनुसार कबीर के नाम आठ ग्रंथ है. वहीं जी.एच वेस्टकॉट ने बताया है कि कबीर के 84 ग्रंथ हैं. कबीर की वाणी संग्रह 'बीजक' नाम से प्रसिद्ध है. इसके तीन भाग रमैनी, सबद और सारवी हैं. ये भी माना जाता है कि हिंदी भाषा में पहली बार कबीर ने ही गज़ल लिखा था. "हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या?" कबीर के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं. कबीर कहते हैं, "माला फेरत जुग गया फिरा ना मन का फेर, कर का मनका छोड़ दे मन का मन का फेर" कबीर की रचनाओं में अनेक भाषाओं जैसे कि अरबी, फारसी, भोजपुरी, पंजाबी, बुंदेलखंडी, ब्रज, खड़ीबोली आदि के शब्द मिलते हैं इसलिए इनकी भाषा को 'पंचमेल खिचड़ी' या 'सधुक्कड़ी' भाषा कहा जाता है.

पीएम मोदी कबीर की मजार पर चढ़ाएंगे चादर

आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यूपी में कबीर के नाम पर बने संतकबीर नगर जाएंगे. वे कबीर की 500वीं पुण्यतिथि के मौके पर मगहर में उनकी समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करेंगे और कबीर की मजार पर चादर भी चढ़ाएंगे. इस मौके पर हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी पीएम मोदी जाएंगे.

बता दें की मोदी के दौरे से पहले कल तैयारियों का जाजया लेने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ संतकबीरनगर पहुंचे थे. जब वे मजार देखने गए तो वहां एक मुस्लिम शख्स ने उन्हें टोपी पहनाने की कोशिश की तो उन्होंने साफ मना कर दिया. इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है. पीएम मोदी भी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने मुस्लिम टोपी पहनने से इकार कर दिया था.

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