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परिसीमन क्या है और दक्षिणी राज्य इससे क्यों चिंतित हैं? 5 सवालों में समझें पूरी कहानी

दक्षिणी राज्यों की चिंता यह है कि अगर जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को भविष्य में संसद में अपनी कुल सीट हिस्सेदारी में नुकसान होता है, तो क्या यह उन्हें जनसंख्या नियंत्रण की सफलता की सजा देने जैसा नहीं होगा?

भारत में परिसीमन (Delimitation) एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है. परिसीमन के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय या फिर से निर्धारित की जाती हैं. इसका उद्देश्य आबादी में बदलाव के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखना है.

2026 में केंद्र सरकार ने Delimitation Bill, 2026 लोकसभा में पेश किया था. इसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के पुनर्विन्यास और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन के लिए परिसीमन आयोग का प्रावधान करना था. हालांकि, इससे जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में जरूरी विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका और इसके बाद सरकार ने Delimitation Bill भी वापस ले लिया.

इस पूरे विवाद के केंद्र में सबसे बड़ा सवाल उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का है.

दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि अगर भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्विन्यास मुख्य रूप से आबादी के आधार पर हुआ, तो जिन राज्यों ने दशकों में जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है, उनकी संसद में कुल राजनीतिक हिस्सेदारी घट सकती है. वहीं, ज्यादा आबादी वाले राज्यों को सीटों में अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा मिल सकता है.

आइए 5 सवालों में समझते हैं पूरी कहानी.

1. परिसीमन क्या है?

परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय या फिर से निर्धारित की जाती हैं.  इसका एक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों की आबादी और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच बहुत ज्यादा असंतुलन न हो.

परिसीमन के दौरान यह भी तय किया जाता है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए कितनी सीटें आरक्षित होंगी.

भारत में परिसीमन का काम परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) करता है. यह संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत गठित एक उच्चाधिकार प्राप्त निकाय है. चुनाव आयोग के मुताबिक, आयोग के आदेशों को कानून का दर्जा प्राप्त होता है और उन्हें अदालत में चुनौती देने की गुंजाइश बेहद सीमित है.


परिसीमन क्या है और दक्षिणी राज्य इससे क्यों चिंतित हैं? 5 सवालों में समझें पूरी कहानी

2. दक्षिणी राज्य परिसीमन को लेकर क्यों चिंतित हैं?

दक्षिणी राज्यों की मुख्य चिंता जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संबंध को लेकर है. तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में पिछले दशकों में प्रजनन दर और जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में कमी आई है. इसके पीछे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार नियोजन जैसे कारकों की भूमिका रही है.

दूसरी ओर, उत्तर भारत के कई राज्यों में इसी अवधि में आबादी अपेक्षाकृत तेज गति से बढ़ी. यही वजह है कि दक्षिणी राज्यों के नेताओं को डर है कि अगर लोकसभा की सीटों का पुनर्विन्यास मौजूदा जनसंख्या के अनुपात में किया गया, तो उन्हें जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने का राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है.

यह चिंता सिर्फ सीटें कम होने की नहीं है, बल्कि लोकसभा में कुल सीटों के अनुपात और राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी है.

हालांकि, केंद्र सरकार ने इसका अलग आकलन पेश किया है. अप्रैल 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि प्रस्तावित मॉडल में लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने पर दक्षिणी राज्यों की सीटें मौजूदा 129 से बढ़कर 195 हो सकती हैं और कुल सदन में उनका हिस्सा करीब 24% के आसपास बना रहेगा.

3. आबादी बढ़ने का परिसीमन पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत में अलग-अलग राज्यों की आबादी पिछले दशकों में एक समान गति से नहीं बढ़ी है. उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दक्षिणी राज्यों की तुलना में अधिक रही है. वहीं, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार काफी कम हुई है. यही अंतर परिसीमन की बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है.

अगर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का आवंटन आबादी के अनुपात में ज्यादा किया जाता है, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों की सीटों में वृद्धि हो सकती है.

दूसरी ओर, कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की सीटें बढ़ने की रफ्तार अपेक्षाकृत कम रह सकती है. इससे लोकसभा में उनकी कुल सीट हिस्सेदारी घटने की आशंका पैदा होती है.

हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य में परिसीमन के लिए कौन-सा फार्मूला अपनाया जाता है और लोकसभा की कुल सीटों की संख्या कितनी तय होती है.

इसलिए अभी यह कहना कि कौन-सा राज्य निश्चित रूप से कितनी सीटें खोएगा या पाएगा, अंतिम परिसीमन से पहले उचित नहीं होगा.

4. अगली परिसीमन प्रक्रिया कब होगी?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संविधान में लोकसभा में राज्यों को सीटों के आवंटन को लंबे समय तक 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर रखा गया है.

चुनाव आयोग के अनुसार, 84वें और 87वें संविधान संशोधनों के बाद राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का कुल आवंटन और विधानसभा सीटों की संख्या 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने तक स्थिर रखी गई थी.

यानी अब आने वाली जनगणना के आंकड़े भविष्य की परिसीमन बहस में बेहद महत्वपूर्ण होंगे.

2026 में केंद्र सरकार ने इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए Delimitation Bill पेश किया था. लेकिन संविधान संशोधन विधेयक के लोकसभा में जरूरी विशेष बहुमत हासिल नहीं करने के बाद सरकार ने Delimitation Bill वापस ले लिया. इसका मतलब है कि अप्रैल 2026 में प्रस्तावित व्यवस्था फिलहाल कानून नहीं बनी है.

5. दक्षिणी राज्य क्या कर रहे हैं?

दक्षिणी राज्यों के नेता लंबे समय से परिसीमन के संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताते रहे हैं. तमिलनाडु में यह मुद्दा खास तौर पर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. अगस्त 2026 में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने परिसीमन पर चर्चा के लिए राज्य के सांसदों की बैठक बुलाई. बैठक में शामिल सांसदों ने केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन कानून का विरोध किया, हालांकि DMK और AIADMK समेत कुछ प्रमुख दलों ने बैठक में हिस्सा नहीं लिया.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू भी पहले परिसीमन और जनसंख्या प्रबंधन के बीच संबंध को लेकर चिंता जता चुके हैं. उन्होंने कहा था कि परिसीमन और जनसंख्या प्रबंधन को अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखा जाना चाहिए.

तमिलनाडु में कम होती जन्मदर को लेकर राजनीतिक बहस इतनी तेज हुई है कि राज्य के राजनीतिक नेताओं ने भविष्य में जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संबंध को लेकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है.

आखिर दक्षिणी राज्यों का डर क्या है?

पूरे विवाद को एक सवाल में समझें तो दक्षिणी राज्यों की चिंता यह है:

“अगर जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को भविष्य में संसद में अपनी कुल सीट हिस्सेदारी में नुकसान होता है, तो क्या यह उन्हें जनसंख्या नियंत्रण की सफलता की सजा देने जैसा नहीं होगा?”

यही वजह है कि परिसीमन अब सिर्फ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है. यह मुद्दा उत्तर-दक्षिण राजनीतिक संतुलन, संघीय ढांचे, जनसंख्या नीति और संसद में राज्यों की आवाज से जुड़ गया है.

दूसरी ओर, केंद्र सरकार का तर्क है कि अगर लोकसभा की कुल सीटों में पर्याप्त वृद्धि की जाती है, तो दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ेंगी और उनकी कुल हिस्सेदारी में बड़ा बदलाव नहीं होगा. अप्रैल 2026 में अमित शाह ने इसी आधार पर कहा था कि प्रस्तावित मॉडल से दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं बल्कि फायदा होगा.

इसलिए असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस राज्य की कितनी सीटें बढ़ेंगी, बल्कि यह है कि भविष्य का परिसीमन किस फार्मूले, कितनी कुल सीटों और किस जनगणना के आधार पर किया जाएगा. यही तय करेगा कि भारत की संसद में राज्यों का राजनीतिक संतुलन आने वाले दशकों में किस तरह बदलेगा.

संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.

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