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पश्चिम बंगाल चुनाव: बुनियादी मसलों पर हावी होती मंदिर-राजनीति

बंगाल की सियासी नब्ज समझने वाले मानते हैं कि ममता यह जान चुकी हैं कि बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड इस बार उनके लिए भारी पड़ सकता है, सो उन्होंने भी इसकी काट के लिए मंदिर-राजनीति को ही अपनाने का फैसला किया है.

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के चुनाव में इस बार पहचान आधारित राजनीति हावी होती दिखाई दे रही है. ममता बनर्जी का किला ढहाने के लिये बीजेपी जहां मंदिर मार्ग का रास्ता अपनाते हए तुष्टिकरण की राजनीति पर करारी चोट कर रही है, तो वहीं हिंदुत्व कार्ड से डरती दिख रहीं ममता को भी अपनी सत्ता बचाने के लिये मजबूरन मंदिर की शरण लेनी पड़ी है. पिछले दस सालों में ऐसा शायद पहली बार हुआ जब ममता को बार-बार चिल्लाते हुए लोगों को यह याद दिलाना पड़ रहा है कि वे भी एक हिंदू की ही बेटी हैं. आलम यह है कि मंदिर राजनीति के साये में राज्य के लोगों से जुड़े तमाम बुनियादी मसले हाशिये पर जा चुके हैं.

बंगाल की सियासी नब्ज समझने वाले मानते हैं कि ममता यह जान चुकी हैं कि बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड इस बार उनके लिए भारी पड़ सकता है, सो उन्होंने भी इसकी काट के लिए मंदिर-राजनीति को ही अपनाने का फैसला किया है. यही वजह है कि उम्मीदवारी के एलान के बाद बीते मंगलवार को उन्होंने अपने पहले नंदीग्राम दौरे में ख़ुद को बार-बार ब्राह्मण की बेटी और स्थानीय निवासी होने का ढिंढोरा पीटा. यही नहीं, ख़ुद को बीजेपी और शुभेंदु अधिकारी से ज़्यादा हिंदू साबित करने के लिए रैली के मंच से ही उन्होंने चंडीपाठ भी किया.

उल्लेखनीय है कि चंडीपाठ राज्य के सबसे बड़े त्योहार दुर्गापूजा के समय करने की परंपरा है. इस चुनाव में सबसे हाई प्रोफ़ाइल सीट बनी नंदीग्राम पर अबकी सत्ता के दोनों दावेदारों यानी टीएमसी और बीजेपी का सब कुछ दांव पर लगा है. अपनी नाक और साख का सवाल बन चुकी इस सीट का नतीजा ही दोनों दलों और उनके उम्मीदवारों के साथ ही राज्य का भविष्य भी तय करेगा.

पूर्व मेदिनीपुर ज़िले में हल्दिया नदी के किनारे बसे इस अनाम-से कस्बे ने ही ममता को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने की नींव रखी थी. साल 2007 में यहां हुआ ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ममता के सियासी सफर का ऐसा टर्निंग पॉइंट था, जिसने महज चार साल के भीतर ही उन्हें पूरे बंगाल की सत्ता सौंप दी.

दरअसल, नंदीग्राम का जातीय गणित बताता है कि यहां बीजेपी और ममता को हिंदुत्व कार्ड खेलने की ज़रूरत आख़िर क्यों पड़ी है. इस विधानसभा क्षेत्र में 30 फ़ीसदी अल्पसंख्यक जबकि 70 प्रतिशत हिंदू वोटर हैं. वैसे यहां करीब 40 फीसदी दलित वोटर भी हैं. बीजेपी को इन हिंदू वोटरों पर भरोसा है तो ममता को अल्पसंख्यक वोटरों पर. लेकिन ममता इस हक़ीक़त से वाकिफ़ हो चुकी हैं कि अल्पसंख्यकों के वोटों के दम पर चुनाव जीतना बेहद मुश्किल है. लिहाज़ा हिन्दू वोट पाने की ख़ातिर ममता को बीजेपी की उस राह पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जिसका वह अब तक मुखर विरोध करती आईं हैं.

हालांकि दोनों पार्टियां एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए तरह-तरह की रणनीति अपना रही हैं, लेकिन उसमें साम्प्रदायिकता के छोंक का तड़का दोनों तरफ साफ नजर आ रहा है. बीजेपी कहीं ममता को बाहरी बता रही हैं तो कहीं उन पर तुष्टिकरण के आरोप लगाए जा रहे हैं. नंदीग्राम में ममता ने अपना परिचय 'घरेर मेये' यानी घर की लड़की के तौर पर देते हुए बीजेपी को हिंदू कार्ड खेलने से बाज़ आने की चेतावनी दी है. उनकी इस चेतावनी में डर का ऐसा अदृश्य साया भी साथ है, जिसने "फाइटर दीदी" को हिन्दुत्व की राह चलने पर मजबूर किया है और यही नंदीग्राम के साथ पूरे बंगाल का भविष्य भी तय करेगा.

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