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चिंता: जल संकट है देश की सबसे बड़ी समस्या, नहीं किए गए उपाय तो बूंद-बूंद के लिए तरस जाएंगे लोग

देश के बड़े शहरों में पानी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है. लोगों के पास पीने का पानी नहीं है. समस्या के सामने आने के बाद सरकारें अस्थाई उपाए कर रही हैं. लेकिन देश में जिस स्तर का जल संकट होने वाला है इसके लिए बड़े स्तर पर प्लानिंग की जरूरत है. तभी भयानक जल संकट से बचा जा सकता है, नहीं तो पीने के पानी लिए लोग दरबदर हो जाएंगे.

नई दिल्ली: देश के कई इलाकों में लोग पानी की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं. इसकी गंभीरता का अंदाजा चेन्नई और बेंगलुरु में पानी के लिए दरबदर लोगों की स्थिति को देखकर लगाया जा सकता है. जहां एक घड़े पानी के लिए घंटों-घंटों तक लोगों को कतार में देखा जा सकता है. वहीं कल ही 'मन की बात' कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पानी को 'पारस' बताकर जल संरक्षण पर जोर दे चुके हैं.

जल संकट की गहराती समस्या पर सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने पिछले साल एक रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं. नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 21 शहरों में अगले साल तक ग्राउंड वाटर खत्म हो जाएगा और इन शहरों के लोगों को पानी के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर होना पड़ेगा.

भारत में जल संकट का ये है कारण

भारत के लोग सबसे अधिक ग्राउंड वाटर का इस्तेमाल करते हैं. अमेरिका और चीन को मिलाकर जितना पानी जमीन से निकाला जाता है उतना अकेले भारत से निकाला जाता है. यहां पीने के पानी का आधा से अधिक भाग ग्राउंड वाटर से आता है. देश में जितना पानी जमीन के अंदर से निकाला जा रहा है उसका 89 फीसदी इस्तेमाल कृषि कार्य में सिंचाई के लिए होता है. घर के अन्य कार्यों के लिए 9 फीसदी इस पानी का इस्तेमाल होता है जबकि 2 फीसदी पानी का इस्तेमाल उद्योग-धंधों में होता है.

चिंता: जल संकट है देश की सबसे बड़ी समस्या, नहीं किए गए उपाय तो बूंद-बूंद के लिए तरस जाएंगे लोग

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक ये जल संकट का कारण

साल 2015 में जल संसाधन पर बने एक स्टैंडिंग कमिटी ने पाया कि देश में ग्राउंड वाटर का सबसे अधिक इस्तेमाल कृषि और पीने के लिए होता है. भूमिगत जल के इसी दोहण का परिणाम है कि साल 2007 से 2017 के बीच देश में भूमिगत जल के लेयर में 61 फीसदी की कमी आई है. ये आंकड़े सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) ने पिछले साल लोकसभा में पेश किया था. इस रिपोर्ट का जल संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत तैयार किया गया है. ग्राउंड वाटर में कमी के पीछे जनसंख्या में वृद्धि, तेजी से शहरीकरण, औद्योगिकरण और कम वर्षा को माना गया है.

देश में पानी का विभाजन असमान है-

देश में पानी की उपलब्धता और उसका विभाजन भी असमान है. नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 84 फीसदी ग्रामीणों के पास सप्लाई वाटर का कनेक्शन नहीं है. वहीं 75 फीसदी घरों में पीने के पानी की उपलब्धता घर के अंदर नहीं है. उन्हें कहीं और से पीने का पानी मंगाना पड़ता है. आईआईटी खड़गपुर और कनाडा की एक यूनिवर्सिटी के द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर भारतीय राज्यों में भूमिगत जल में पूर्वी भारत की तुलना में ज्यादा कमी आई है.

बड़े शहरों के लोग करते हैं पानी का अधिक इस्तेमाल

पानी के असमान विभाजन का इस बात से भी पता चलता है कि देश के बड़े शहरों- दिल्ली और मुंबई में लोग स्टैंडर्ड वाटर लिमिट (150 लीटर पानी हर व्यक्ति प्रतिदिन) से अधिक जल का इस्तेमाल करते हैं जबकि अन्य शहरों के लोगों को सिर्फ 40-50 लीटर पानी ही प्रतिदिन मिल पाता है.

डब्ल्यूएचओ ने 25 लीटर का तय कर रखा है मानक

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, एक व्यक्ति को एक दिन में 25 लीटर पानी की आवश्यकता खाने और पीने की जरूरतों के लिए है. अन्य उपलब्ध पानी से साफ-सफाई और नहाने का काम किया जाता है. लेकिन हम देखते हैं कि इससे कहीं अधिक मात्रा में लोग पानी का इस्तेमाल करते हैं.

2024 तक हर घर में नल का जल पहुंचाने का लक्ष्य- मोदी सरकार 

मोदी सरकार ने जल संकट का समाधान करने के लिए अपने दूसरे कार्यकाल में जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया है. इस मंत्रालय ने लक्ष्य बनाया है कि साल 2024 तक देश के सभी घरों में नल का जल उपलब्ध कराया जाएगा. इसके माध्यम से सरकार पानी के इस्तेमाल को नियंत्रित भी करना चाहती है. एक ये भी चिंता की बात है कि देश में 40 फीसदी पाइप्ड वाटर सप्लाई में लिकेज की समस्या है.

पानी है भरपूर, विवेकपूर्ण इस्तेमाल से दूर होगा जलसंकट

अंकगणित के दृष्टिकोण से देखें तो देश में पानी की कोई समस्या नहीं है. लेकिन इसकी शर्त एक ही है कि हम पानी का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करें. सेंट्रल वाटर कमीशन के मुताबिक देश में हर साल 3 हजार बिलियन क्यूबिक मीटर पानी की जरूरत है जबकि यहां हर साल 4 हजार बिलियन क्यूबिक मीटर बारिश होती है. इतनी अधिक होने के बावजूद जल संकट की समस्या देश में इसलिए है कि क्योंकि हम बारिश के जल का संग्रह नहीं कर पाते हैं.

देश में 80 फीसदी पानी का नहीं हो पाता शुद्धिकरण

देश में वाटर ट्रीटमेंट की भी हालत बहुत खराब है. घरों से निकलने वाले 80 फीसदी से अधिक पानी का ट्रीटमेंट नहीं हो पाता है और ये दूषित पानी के तौर पर नदियों में जाकर उसे भी दूषित करते हैं. इसी के साथ देश में सिर्फ 8 फीसदी बारिश के जल का भंडारण किया जाता है जो कि विश्व में सबसे कम है. पहले के समय में जिस तरह तालाबों के माध्यम से बारिश के जल को जमीन के अंदर पहुंचाया जाता था वह भी अब आबादी बढ़ने और शहरीकरण के कमजोर कानूनों के कारण खत्म होता जा रहा है.

इजराइल घरों में इस्तेमाल होने वाले 100 फीसदी पानी को शुद्ध करता है

इस मामले में इजराइल दुनिया के देशों के लिए एक उदाहरण है. यहां घरों में इस्तेमाल होने वाले 100 फीसदी पानी को फिर से साफ किया जाता है और इसका 94 फीसदी भाग फिर से घरों में इस्तेमाल के लिए सप्लाई किया जाता है. यहां सिंचाई कार्य में आधा से अधिक पानी पहले से इस्तेमाल किया हुआ होता है. भारत भी इजराइल से सीखकर पानी का विवेकपूर्ण इस्तेमाल कर सकता है. इससे देश के बड़े शहरों में पानी संकट खत्म हो सकता है.

जिलों में तेजी से कम हो रहा है जलस्तर

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट जिसे साल 2015 में संसद में पेश किया गया था के मुताबिक साल 1995 में जहां देश के 92 फीसदी जिलों में जहां ग्राउंड वाटर की आदर्श स्थिति थी वही यह कम होकर साल 211 में 71 फीसदी हो गया. वहीं, 1995 में जहां तीन फीसदी जिलों में ग्राउंड वाटर का अत्यधित इस्तेमाल हो रहा था वहीं, 2011 में यह आंकड़ा 15 फीसदी तक पहुंच गया और ये आंकड़ा दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है जो कि पानी की समस्या की भयावहता बताने के लिए काफी है.

सिर्फ अमीर ही आने वाले समय में जरूरतों को पूरी कर पाएंगे- यूएन रिपोर्ट

वहीं, यूएन ह्यूमन राइट्स की एक रिपोर्ट का कहना है कि विश्व उस दिशा में तेजी से बढ़ रहा है जहां सिर्फ अमीर लोग ही मूलभूत जरूरतों की भी पूर्ति कर सकेंगे. यूएन रिपोर्ट के मुताबिक साल 2030 तक पानी की जरूरतें दोगुनी बढ़ जाएंगी. इससे करोड़ों लोग जलसंकट की चपेट में आ सकते हैं. इसी संस्था की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक भारत जनसंख्या में चीन को अगले एक दशक में पीछे छोड़ देगा जबकि साल 2050 तक 41.6 करोड़ लोग शहरों में बस जाएंगे.

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