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Vande Mataram: नेहरू के वक्त में क्यों नहीं लागू हुआ पूरा वंदेमातरम्?

साल 1937 में कांग्रेस के अधिवेशन में वंदेमातरम को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी आपत्ति दर्ज करवाई थी और कहा था कि इसे राष्ट्रीय गीत नहीं होना चाहिए.

भारत का राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम अब अधूरा नहीं बल्कि पूरा गाया जाएगा. और अब किसी भी सरकारी आयोजन में इस राष्ट्रीय गीत के कुछ 6 छंद ही गाए जाएंगे, जिसकी अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड की होगी. लेकिन सवाल है कि क्यों. आखिर जो राष्ट्रीय गीत 26 जनवरी 1950 से ही भारत के संविधान का हिस्सा है, उसे अब तक अधूरा ही क्यों गाया जाता था. आखिर जिस गीत में कुल 6 छंद हैं, उसके दो छंदों को ही आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय गीत क्यों माना गया था.

आखिर संविधान सभा में वो कौन सी बहस थी, जिसने बंकिम चंद चटर्जी के आनंदमठ से निकले इस गीत के शुरुआती दो छंदों को ही भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी और सबसे जरूरी सवाल कि क्या इस गीत के जो चार छंद अभी सरकार ने राष्ट्रीय गीत के तौर पर अंगीकृत किए हैं, उसको रोकने के जिम्मेदार नेहरू थे. आखिर क्या है वंदेमातरम के उन चार छंदों में जिन्हें संविधान लागू होने के 77 साल बाद शामिल किया गया और अब क्यों सरकार के इस फैसले पर एक नई बहस शुरू हो गई है, जिसके तार बंगाल के विधानसभा चुनाव से भी जुड़ने लगे हैं, आज क्लियर कट बात होगी इन्हीं मुद्दों पर. 

वंदेमातरम की रचना करने वाले थे बंकिम चंद्र चटर्जी. साल 1875 में ही उन्होंने इसके सभी 6 पद लिख दिए थे. लेकिन पहली बार इसे प्रकाशित किया गया था 1882. और तब भी ये एक अलग कविता नहीं बल्कि बंकिम चंद चटर्जी के बंगाली उपन्यास आनंद मठ का हिस्सा था, जिसमें संस्कृतनिष्ठ बंगाली में ये कविता दर्ज हुई थी. तब भारत पर अंग्रेजों का शासन था और इस कविता का शीर्षक वंदेमातरम अंग्रजों के खिलाफ चल रही लड़ाई का सबसे बड़ा नारा बन गया था. हर आंदोलनकारी, हर विरोध प्रदर्शन, हर एक क्रांति का अगर कोई एक और सर्वसम्मत नारा था तो वो था वंदेमातरम और इंकलाब जिंदाबाद.

खुद रविंद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में इस गीत को गाया था और पूरा गाया था. 1901 में जब कलकत्ता में फिर से कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तो दक्षिणा चरण सेन ने फिर से इस गीत को पूरा गाया. साल 1905 में जब बनारस में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था तो कवयित्री सरला देवी चौधरानी ने भी पूरा वंदेमातरम गाया था. इसके दो साल बाद जब भीखाजी कामा ने भारत का पहला झंडा बनाया था तो उस झंडे के बीच में भी वंदेमातरम शब्द लिखा गया था. और इस तरह से वंदेमातरम हर हिंदुस्तानी की जुबान पर रच-बस गया था.

फिर साल आया 1937. कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था. वंदेमातरम को लेकर तब ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी आपत्ति दर्ज करवा दी थी और कहा था कि इसे राष्ट्रीय गीत नहीं होना चाहिए. मुस्लिम लीग की आपत्ति थी कि इस्लाम में खुदा के अलावा किसी और की इबादत नहीं की जा सकती, जबकि वंदे मातरम के अंतिम पदों में मातृभूमि की तुलना देवी दुर्गा और लक्ष्मी से की गई है, और ये इस्लाम के धार्मिक उसूलों के खिलाफ है. मुस्लिम लीग के अलावा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भी यही दलील दी थी. जबकि कांग्रेस के ही एक और कद्दावर नेता पुरुषोत्तम दास टंडन का तर्क था-

'वंदेमातरम गीत को गाते हुए हजारों क्रांतिकारियों ने फांसी के फंदे को चूमा था, लिहाजा इसे हटाना उन शहीदों के अपमान जैसा होगा. ये एक गीत नहीं बल्कि भारत की 'आध्यात्मिक आत्मा' है, बहुसंख्यक आबादी की भावना है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए.'

ऐसे में कांग्रेस ने इस मुद्दे को हल करने के लिए एक कमिटी बनाई. इस कमिटी में मौलाना अबुल कलाम आजाज, जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, आचार्य नरेंद्र देव और खुद रविंद्रनाथ टैगोर मौजूद थे, जिनका लिखा जन-गण-मन तब तक प्रकाशित हो चुका था और वो भी उनकी लंबी बंगाली कविता भारत भाग्य विधाता का एक अंश ही था. विवाद सामने आने पर सुभाष चंद्र बोस ने रविंद्रनाथ टैगौर से सुझाव मांगा कि क्या करना चाहिए. रविंद्र नाथ टैगोर ने कहा-

'वंदेमातम का मूल देवी दुर्गा की आराधना है. ये बिल्कुल ही स्पष्ट है और इसमें कोई भी संदेह नहीं है. बेशक, बंकिम चंद्र अंत में दुर्गा को बंगाल के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ दिखाते हैं, लेकिन किसी भी मुसलमान से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह देशभक्ति के नाम पर दस हाथों वाली देवी की पूजा अपने देश के तौर पर करे. उपन्यास आनंदमठ साहित्य की एक कृति है, और इसलिए यह गीत उसमें उपयुक्त है. लेकिन संसद सभी धार्मिक समूहों के मिलन का स्थान है, और वहां यह गीत उपयुक्त नहीं हो सकता.'

फिर महात्मा गांधी से भी सुझाव मांगा गया तो उनकी भी राय कमोबेश ऐसी ही थी. तब नेहरू से भी राय मांगी गई और उन्होंने भी रविंद्र नाथ टैगोर के उठाए सवालों का ही समर्थन किया. और कहा-

'वंदेमातरम के शुरुआती दो पद देशभक्ति से ओत-प्रोत हैं और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन चुके हैं. अंतिम पदों में धार्मिक रूपक अधिक हैं, जो एक धर्मनिरपेक्ष देश के आधिकारिक प्रतीक के लिए शायद उपयुक्त न हों.'

ऐसे में तय हुआ कि वंदेमातरम कविता के शुरुआती दो पद, जिसमें कोई धार्मिक चरित्र नहीं है, उसे भारत के राष्ट्रीय गीत के तौर पर स्वीकार किया जाएगा. और यही हुआ भी. 1937 में ही वंदेमातरम के शुरुआती दो पद भारत के आधिकारिक राष्ट्रीय गीत के तौर पर स्वीकृत किए गए और बाकी के चार पदों को राष्ट्रीय गीत से हटा दिया गया.

इसकी वजह ये थी कि वंदेमातरम कविता का जो मूल है, उसमें भारत देश को एक देवी की तरह देखा गया है. उसकी समृद्धि की बात की गई है, उसकी पूजा की बात की गई है और उसे देवी दुर्गा के तौर पर दर्शाया गया है. लेकिन इस कविता के जो दो शुरुआती पद हैं, उसमें सिर्फ देश की बात है, मातृभूमि की बात है और इन दोनों ही पदों में कोई भी धार्मिक चरित्र नहीं है. लिहाजा 1937 में कांग्रेस के अधिवेशन में इस कविता के दो पदों को राष्ट्रीय गीत के तौर पर मान्यता दी गई.

इसके बाद जब भारत आजाद हुआ और उसका अपना संविधान बनकर तैयार हुआ तो 24 जनवरी 1950 को वंदेमातरम को भारतीय संविधान में जगह दी गई और उसे भारत के राष्ट्रीय गीत के तौर पर शामिल किया गया. उस वक्त संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के पास एक विकल्प ये भी था कि वो संविधान सभा में वोटिंग करवाते और जिस तरफ ज्यादा वोट होते, उसकी बात सुनी जाती. लेकिन ऐसे में एक पक्ष की हार होती और दूसरे की जीत. लिहाजा किसी भी तरह का विवाद न हो, इसके लिए बतौर अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने एक वक्तव्य जारी किया और कहा-

'जन गण मन के नाम से जानी जाने वाली शब्दों और संगीत की रचना भारत का राष्ट्रगान है, जिसमें शब्दों में ऐसे बदलाव किए जा सकते हैं जैसा सरकार समय आने पर अधिकृत करे. और वंदे मातरम गीत, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे जन गण मन के समान ही सम्मानित किया जाएगा और उसे इसके बराबर का दर्जा प्राप्त होगा. मुझे आशा है कि इससे सदस्य संतुष्ट होंगे. '

राजेंद्र प्रसाद के इस वक्तव्य के बाद बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. लिहाजा सभी सदस्यों ने वंदेमातरम के दो पदों को राष्ट्रीय गीत के तौर पर सहमति दे दी और फिर वो हमारा राष्ट्रीय गीत बन गया. आज की तारीख में भी जब संसद का सदन शुरू होता है तो उसकी शुरुआत भले ही जन गण मन से होती हो, लेकिन सदन का समापन वंदेमातरम के ही शुरुआती दो पदों से होता है. हालांकि सरकार के नए नियम के बाद अब सब बदल गया है.

और सबसे बड़ा बदलाव ये है कि वंदेमातरम अब अधूरा नहीं बल्कि पूरा गाया जाएगा और इसमें वो चार पद भी शामिल किए जाएंगे, जिन्हें रविंद्रनाथ टैगोर के सुझाव और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के वक्तव्य के बाद हटा संविधान से हटा दिया गया था. साथ ही कुछ और भी बदलाव हुए हैं. जैसे-

# पूरा वंदेमातरम 3 मिनट 10 सेकेंड की अवधि में गाया जाएगा.
# अगर वंदेमातरम और जन गण मन दोनों ही गाया जाना हो, तो वंदेमातरम पहले गाया जाएगा.
# केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश के अनुसार तिरंगा फहराने के अवसरों, राष्ट्रपति के आगमन से जुड़े कार्यक्रमों और अन्य औपचारिक आयोजनों में पूरा वंदे मातरम गाया जाएगा.
#आकाशवाणी और दूरदर्शन पर राष्ट्रपति देश के नाम राष्ट्र के नाम संबोधन देंगे तब भी पहले और बाद में राष्ट्रगीत बजाना अनिवार्य होगा.
# वंदेमातरम गाए जाने के दौरान सभी श्रोता सावधान मुद्रा में खड़े रहेंगे.
# अगर किसी समाचार, फिल्म या डॉक्यूमेंट्री में राष्ट्रगान फिल्म के हिस्से के रूप में बजता है, तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाएगी.

अब ये नए बदलाव लागू हुए हैं तो जाहिर है कि वो पुरानी बहस फिर से शुरु होगी, जिसके जरिए एक तबके को इस पूरे वंदेमातरम पर आपत्ति होगी. इसके जरिए नए विवाद खड़े करने की भी कोशिश होगी. और आज न तो मौलाना अबुल कलाम आजाद हैं कि वो अपनी बात कहके विवाद को खत्म करें और न ही डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जो एक वक्तव्य के जरिए पूरे विवाद को शुरू होने से पहले ही खत्म कर दें. क्योंकि अब बात राष्ट्रीय गीत को संविधान में शामिल करने की नहीं है बल्कि अब बात विधानसभा चुनाव की भी है, जो इस वंदेमातरम के परिप्रेक्ष्य में बंगाल के लिए जरूरी हो जाती है.

अविनाश राय एबीपी लाइव में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. अविनाश ने पत्रकारिता में आईआईएमसी से डिप्लोमा किया है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएट हैं. अविनाश फिलहाल एबीपी लाइव में ओरिजिनल वीडियो प्रोड्यूसर हैं. राजनीति में अविनाश की रुचि है और इन मुद्दों पर डिजिटल प्लेटफार्म के लिए वीडियो कंटेंट लिखते और प्रोड्यूस करते रहते हैं.

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