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UP Assembly Elections 2022: 115 सीटों पर गेमचेंजर, 12 जिलों में 15 प्रतिशत से ज्यादा वोट, यूपी की पॉलिटिक्स में ऐसा है ब्राह्मणों का दबदबा

UP Elections: उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को एक मजबूत वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है, जिसे अपने पाले में करने के लिए हर पार्टी पूरा जोर लगाए हुए हैं. जब चुनाव का ऐलान भी नहीं हुआ था, तभी से सारी पार्टियां पूरे प्रदेश में प्रबुद्ध ब्राह्मण सम्मेलन, सभाएं कर रही थीं.

Brahmin Voters in UP: राजनीति की शतरंज में उसी का बादशाह जीतता है, जो एक-एक मोहरे पर सही चाल चलता है. कहते हैं यूपी की सियासत में जितने जातियों को साध लिया, उसके गद्दी तक पहुंचने का रास्ता भी साफ हो गया. दलितों, मुस्लिमों से लेकर जाटों के समीकरण को सेट करने में जुटी पार्टियों के लिए ब्राह्मण वोटर (Brahmin Politics Uttar Pradesh) भी कम जरूरी नहीं हैं. 

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को एक मजबूत वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है, जिसे अपने पाले में करने के लिए हर पार्टी पूरा जोर लगाए हुए हैं. जब चुनाव का ऐलान भी नहीं हुआ था, तभी से सारी पार्टियां पूरे प्रदेश में प्रबुद्ध ब्राह्मण सम्मेलन, सभाएं कर रही थीं. परशुराम की मूर्ति का कहीं सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने अनावरण किया, कहीं बीजेपी के नेताओं ने. 

सूबे की सियासत में कहां हैं ब्राह्मण

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी 12-14 प्रतिशत के आसपास है. करीब 115 सीटें ऐसी हैं, जहां ब्राह्मण मतदाताओं का अच्छा खासा प्रभाव है. 12 जिले ऐसे हैं, जहां 15 फीसदी से ज्यादा ब्राह्मण वोटर हैं. इनमें गोरखपुर, महराजगंज, संत कबीरनगर, इलाहाबाद, कानपुर, चंदौली, वाराणसी, अमेठी, जौनपुर, देवरिया, बस्ती और बलरामपुर शामिल हैं. मध्य बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 100 सीटें तो ऐसी हैं, जहां ब्राह्मण मतदाता ज्यादा तो नहीं हैं लेकिन वहां किसी प्रत्याशी का खेल बनाने और बिगाड़ने का दमखम रखते हैं. 

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यूपी में रह चुके हैं 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री

उत्तर प्रदेश में 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों ने 20 साल तक राज किया है. ये हैं 2 बार के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी और श्रीपति मिश्रा. 

सत्ता के करीबी रहे हैं ब्राह्मण

भले ही उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी मुसलमानों और दलितों (20-20 फीसदी) से कम रही हो लेकिन रणनीति व समझदारी से वोटिंग के मामले में चुनावी पंडित उनसे बेहतर किसी को नहीं मानते. इसी खासियत के कारण हर पार्टी नेतृत्व ने ब्राह्मण नेताओं को अपने करीब रखा. 

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कभी कांग्रेस, कभी बसपा कभी बीजेपी के साथ...

यूपी में ब्राह्मण किसी एक पार्टी के पारंपरिक वोटर बनकर नहीं रहे. एक दौर ऐसा था, जब वह पारंपरिक रूप से कांग्रेस के साथ थे.  1980 में जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट पेश हुई और 10 साल बाद लागू हुई तो देश के सबसे बड़े सूबे की सियासत में दलित-ओबीसी की राजनीति हावी हो गई. मंडल कमीशन की रिपोर्ट के बाद बीजेपी भी सत्ता में आई लेकिन नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ नहीं आया. बताया जाता है कि 2007 में मायावती ने ब्राह्मणों का समर्थन हासिल कर ही सत्ता का स्वाद चखा था. इसके बाद वह 2012 में सपा के साथ हो गए. 2017 में उन्होंने बीजेपी का समर्थन किया. 

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किस पार्टी से कितने ब्राह्मण विधायक कब पहुंचे यूपी विधानसभा

अगर पिछले 5 विधानसभा चुनाव का रिकॉर्ड देखें तो हर पार्टी ने ब्राह्मणों पर दांव चला है और इसका उनको सियासी फायदा भी मिला. बसपा से 1993 में कोई ब्राह्मण विधायक नहीं जीत पाया था. लेकिन 1996 में 2, 2004 में 4, 2007 में 41, 2012 में 10 ब्राह्मण विधायक विधानसभा में बैठे. 2017 में भी बसपा ने 66 ब्राह्मणों को टिकट दिया था. 

1993 में बीजेपी से 17, 1994 में 14, 2002  में 8, 2007 में 3 और 2012 में 6 ब्राह्मण विधायकों ने जीत हासिल की. 2017 में भी 17% से ज्यादा ब्राह्मण एमएलए चुने गए. रुख सपा की ओर करें तो उसके 1993 में 2 एमएलए, 1996 में 3, 2002 में 10 , 2007 में 11 और 2012 में 21 ब्राह्मण विधायकों ने जीत हासिल की. 

2017 में भी सपा ने 10% ब्राह्मणों को टिकट दिया था. वहीं कांग्रेस से 1993 में 5 विधायक, 1996 में 4, 2002 में 1, 2007 में 2 और 2012 में 3 ब्राह्मण विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे जबकि 2017 में कांग्रेस ने 15% ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था. यूपी विधानसभा में 2002 में यूपी में 41 ब्राह्मण विधायक थे, 2007 में 56, 2012 और 2017 में 47-47 विधायक. अब देखना यह होगा कि 2022 के चुनावों में ब्राह्मण वोटर किस करवट बैठते हैं.

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