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भेदभाव खत्म या नया डर? UGC के नए कानून पर छात्रों की नाराजगी की आखिर वजह क्या है?

UGC New Rule Controversy: UGC ने संसद समिति और सुप्रीम कोर्ट के सामने जो आंकड़े रखे हैं, उनके मुताबिक-  2019-20 में 173 शिकायतें, 2023-24 में 378 शिकायतें और पांच साल में कुल 1160 शिकायतें मिली हैं.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियम 2026 को लेकर देशभर में विवाद तेज हो गया है. खासकर सामान्य वर्ग के छात्र और संगठन इसके खिलाफ खुलकर विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि यह नियम समानता के नाम पर एकतरफा है और इससे कैंपस में डर, अविश्वास और टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है. मामला अब सामाजिक के साथ-साथ राजनीतिक रूप भी लेता जा रहा है.

कब शुरू हुआ पूरा विवाद?
पूरा विवाद 13 जनवरी 2026 को शुरू हुआ, जब UGC ने ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशन 2026’ लागू किया. यह नियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में दिए गए 'समानता और समावेशन' के सिद्धांत पर आधारित है. इसका उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव की शिकायतों को रोकना और उनके समाधान के लिए एक तय व्यवस्था बनाना बताया गया है.

UGC का कहना क्या है
UGC का दावा है कि यह नियम- अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), दिव्यांग छात्र, शिक्षक और कर्मचारी के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए लाया गया है. आयोग का कहना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं और इसी कारण इस तरह के सख्त नियम जरूरी हो गए हैं.

इक्विटी कमेटी बनाने का प्रावधान
नए नियम के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में 9 सदस्यों वाली इक्विटी कमेटी बनाना अनिवार्य किया गया है.
इस कमेटी में शामिल होंगे:

  • संस्थान प्रमुख
  • तीन प्रोफेसर
  • एक कर्मचारी
  • दो सामान्य नागरिक
  • दो विशेष रूप से आमंत्रित छात्र
  • एक को-ऑर्डिनेटर
  • नियम के मुताबिक, इन 9 में से कम से कम 5 सदस्य SC, ST, OBC, दिव्यांग या महिला वर्ग से होना जरूरी होगा.

यहीं से शुरू हुआ विरोध
आलोचकों और छात्रों का कहना है कि इस पूरी व्यवस्था में सामान्य वर्ग के लिए कोई अनिवार्य प्रतिनिधित्व नहीं रखा गया है. उनका आरोप है कि भले ही कानून भेदभाव रोकने के लिए लाया गया हो, लेकिन इसका असर सबसे ज्यादा सामान्य वर्ग के छात्रों पर पड़ेगा. छात्रों को डर है कि शिकायत दर्ज होते ही उन्हें पहले से दोषी मान लिया जाएगा.

भेदभाव की शिकायतों के आंकड़े
UGC ने संसद समिति और सुप्रीम कोर्ट के सामने जो आंकड़े रखे हैं, उनके मुताबिक-  2019-20 में 173 शिकायतें, 2023-24 में 378 शिकायतें और पांच साल में कुल 1160 शिकायतें मिली हैं. यानि शिकायतों में करीब 118 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. लेकिन आलोचक इन आंकड़ों का दूसरा पक्ष भी सामने रख रहे हैं.

आंकड़ों का दूसरा पक्ष यह है कि देश में फिलहाल 1153 विश्वविद्यालय, 48 हजार से ज्यादा कॉलेज हैं, लगभग 4 करोड़ 20 लाख छात्र पढ़ाई कर रहे हैं. अगर इनमें से करीब 50 प्रतिशत छात्र SC, ST, OBC, EWS और दिव्यांग वर्ग से भी मान लिए जाएं, तब भी भेदभाव की शिकायत करने वालों का प्रतिशत करीब 0.0018 प्रतिशत ही बैठता है. आलोचकों का कहना है कि इतनी कम शिकायतों के आधार पर पूरे सामान्य वर्ग को शक के दायरे में लाना गलत है.

गलत शिकायतों पर कार्रवाई का अभाव
छात्रों और विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नए नियम में झूठी शिकायत करने वालों पर सख्त सजा का कोई साफ प्रावधान नहीं है. सिर्फ इतना कहा गया है कि अगर कोई समिति के फैसले से असंतुष्ट है, तो वह 30 दिन में अपील कर सकता है. ओम्बड्समैन को भी 30 दिन में अपील निपटानी होगी, लेकिन झूठे आरोप लगाने वालों पर कोई दंड तय नहीं किया गया है. इससे छात्रों को डर है कि कानून का गलत इस्तेमाल हो सकता है.

क्यों बढ़ता जा रहा है विरोध?
छात्रों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि वे भेदभाव के खिलाफ हैं, लेकिन कानून सभी के लिए बराबर होना चाहिए. गलत इस्तेमाल की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कैंपस में भरोसे का माहौल बनाए रखना जरूरी है.

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