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चीन के इस पैंतरे से बढ़ेगी भारत की रणनीतिक चिंता

इस दांव से जहां नेपाल को चीन के प्रति झुकाव का मौका मिलेगा वहीं काठमांडू को भारत के साथ चल रही परियोजनाओं में अधिक मोल-भाव का भी वजन हासिल हो सकेगा.

नई दिल्लीः दक्षिण एशियाई मोहल्ले में अपना दबदबा बढ़ाने में लगे चीन ने नेपाल के साथ रिश्तों का एक नया दांव चला है जो भारत की चिंताएं बढ़ाने वाला है. भारत पर नेपाल की कारोबारी निर्भरता कम करने की जुगत में चीन ने शुक्रवार अपने चार बंदरगाह और तीन लैंड पोर्ट नेपाली इस्तेमाल के लिए मुक़र्रर कर दिए हैं. चीन का यह पैंतरा अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य के लिए जमीन से घिरे नेपाल की भारत पर व्यापारिक निर्भरता कम करने की कोशिशों के मद्देनजर है. इस दांव से जहां नेपाल को चीन के प्रति झुकाव का मौका मिलेगा वहीं काठमांडू को भारत के साथ चल रही परियोजनाओं में अधिक मोल-भाव का भी वजन हासिल हो सकेगा.

हालांकि नेपाल के लिए बंदरगाह चिह्नित करने का चीनी ऐलान नया नहीं है. यह घोषणा तीन बरस पहले दोनो देशों के बीच हुए ट्रेड, ट्रांज़िट और टांसपोर्ट अग्रीमेंट की ही कड़ी है. इसके तहत ही चीन के शेन्ज़ेन, लिआनयुंगांग, झांजियांग और तियांजिन बंदरगाहों पर नेपाल अपने सामान का कारोबार कर सकेगा. इसी तरह से चीन ने नेपाल को लंझाऊ, ल्हासा और शीगाट्स लैंड पोर्टों (ड्राई पोर्ट्स) के इस्तेमाल करने की भी इजाज़त दे दी.

हालांकि जानकारों के मुताबिक नेपाल से संपर्क का यह पैंतरा नया नहीं है. इससे पहले भी चीन ऐसी परियोजनाओं का ऐलान करता रहा है. मगर, भौगोलिक हकीकत और आर्थिक सहूलियत के लिहाज से भारत की दावेदारी चीनी योजनाओं की हवा निकलती रही हैं. भारत-नेपाल संबंधों के जानकार और जेएनयू में प्रोफेसर महेंद्र पी लामा 60 के दशक में नेपाल को चीन से जोड़ने वाले काठमांडू-कोडारी राजमार्ग जैसी योजनाओं का हवाला देते हुए कहते हैं कि उस रास्ते पर द्विपक्षीय कारोबार कभी भी 5-6 फीसद से ज़्यादा नहीं बढ़ पाया. यहां तक कि चीन भी अपना साज़ों समान भेजने के लिए कोलकाता और विशाखापत्तनम जैसे भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल करता है जो नेपाल के साथ अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए निर्धारित हैं. नेपाल की ज़रूरत वाली आयात सामग्री को भी देखें तो भी यह साफ हो जाता है कि उसे कोलकाता और विशाखापट्टनम के रास्ता आयात करना ज़्यादा कारगर भी है और किफायती भी है. लिहाज़ा ऐसी घोषणाओं की व्यवहारिकता के तराजू पर तौलना ज़रूरी है.

दरअसल, चीन ने नेपाल के लिए जो बंदरगाह मुकर्रर किए है उनमें सबसे नजदीकी तियानजिन बंदरगाह भी नेपाली सीमा से 3000 किमी दूर है. जबकि कोलकाता की दूरी करीब 700 किमी और विशाखापट्टनम की दूरी 1200 किमी की है. ऐसी में चीन के साथ इन बंदरगाहों के ज़रिए नेपाली कारोबार तभी संभव है जब बीजिंग इसके लिए ज़रूरी ढांचागत सुविधाएं बनाकर नेपाल को तोहफे में दे.

रणनीतिक जानकार सी. उदय भास्कर जैसे जानकर इसे चीन का एक राजनीतिक संदेश करार देते हैं. खासतौर पर चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना में शामिल होने से भारत के इनकार के मद्देनजर. उदय भास्कर के मुताबिक चीन पिछले कुछ सालों से काफी तेज़ी के साथ इस परियोजना को भारत के करीबी पड़ोसी मुल्कों में बढ़ा रहा है. पाकिस्तान और चीन के खास संबंधों को छोड़ भी दें तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग के महत्वाकांक्षी बीआराई कार्यक्रम से जुड़ी परियोजनाएं चीनी विदेश की नीति प्राथमिकता के तौर पर बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार जैसे पड़ोसी मुल्कों में देखने को मिल रही हैं.

उदय भास्कर के शब्दों में चीन के नेपाल में अपनी मौजूदगी बढ़ाने से ज़्यादा भारत के लिए खतरे की घंटी क्या होगी? हालांकि नेपाल के लोग समझदार हैं और उनके सामने श्रीलंका में हम्मन टोटा जैसा उदाहरण भी है जहां चीनी कर्ज़ के बोझ तले दबे कोलंबो को 99 साल की लीज पर अपना बंदरगाह देना पड़ा. लिहाज़ा चीन से नेपाल को सुविधाएं किस शक्ल में मिल रही है, क्या उसमें कोई कर्ज़ का फंदा तो नहीं है, ये सब देखने के बाद ही सही आकलन हो पायेगा. वैसे भी चीन के साथ कारोबार में कोई फ्री लंच नहीं होता यह बात जग जाहिर है.

हालांकि चीन और नेपाल के बीच इस साझेदारी के ऐलान की टाइमिंग भी कई सवाल उठाती है. महज़ एक हफ्ते पहले बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में भारत समेत 6 देशों के प्रमुखों की नेपाल ने मेज़बानी की थी जिसमें कनेक्टिविटी पर ही ज़ोर था. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की गर्मजोश मुलाकात भी हुई. साथ ही दोनों मुल्कों के बीच रक्सौल काठमांडू रेल लाइन के लिए इंजीनियरिंग व ट्रैफिक सर्वे रिपोर्ट के सामझौते पर भी दस्तखत होकर मंजूरी दी गई. भारत में कोंकण रेलवे को इस सर्वे का काम सौंपा गया है. इसके अलावा अप्रैल 2018 में पीएम मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान दोनों मुल्कों के बीच इनलैंड वाटरवेज के जरिये माल ढुलाई की सुविधा खोलने का भी समझौता हुआ था. दोनों देशों के बीच खुली सीमा भी कारोबारी सहूलियत की बड़ी गारंटी है. ऐसे में यह सवाल लाज़िमी है कि आखिर ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी कि भारतीय पीएम के दौरे के महज़ चंद दिनों में नेपाल ने चीन के साथ इस करारनामे ऐलान कर दिया? इतना ही नहीं नेपाल ने बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान भारत में होने वाली इस समूह के संयुक्त सैन्य अभ्यास में भी भाग न लेने का फैसला लिया है. नेपाली मीडिया ने इस बाबात खबर ओली के प्रेस सलाहकार के हवाले से चलाई है.

काठमांडू के इन फैसलों की घोषणा भी ऐसे समय हुई जब नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल प्रचंड भी भारत में हैं. सवाल लाज़िमी हैं कि क्या भारत के साथ दोस्ती की मीठी बोली के साथ साथ ओली सरकार चीन को काठमांडू में अपना किला मजबूत करने की दावत भी देकर दोहरा खेल खेल रही है?

विदेश नीति जानकारों के मुताबिक चीन के साथ करीबी दरअसल प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का कूटनीतिक पैंतरा है जिसका इस्तेमाल वो अपनी घरेलू सियासत और भारत के साथ मोलभाव के लिए करना चाहते हैं. मधेसी आबादी के आंदोलन और नाकाबंदी को भारत के माथे मढ़कर नेपाली राष्ट्रवाद के नायक बने ओली को अब इसे भारत के प्रभाव के खिलाफ एक फायदेमंद सौदे के तौर पर प्रचारित करने का मौका मिलेगा.

ऐसे में चीन के बंदरगाहों से कारोबार कितना होता है उससे ज़्यादा अहम है कि नेपाल में चीनी मौजूदगी और दबदबा बढ़ने का नया दरवाजा ज़रूर खुल गया है. रोटी-बेटी के रिश्ते और खुली सरहद वाली पड़ोसी नेपाल के आंगन में चीन की मौजूदगी भारत के लिए चिंता का नया सबब ज़रूर बढ़ती हैं.

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