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राजनीतिक पार्टियों को RTI के दायरे में लाने पर विस्तृत सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट, 2 महीने बाद की तारीख तय की

ADR के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड मामले के फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों के कामकाज में पारदर्शिता की बात कही है.

राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून (RTI) के दायरे में लाए जाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट अप्रैल में सुनवाई करेगा. चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले को 21 अप्रैल से शुरू हो रहे सप्ताह में सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग समेत सभी पक्षों को जवाब दाखिल करने को कहा है.

याचिकाकर्ता एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने 2013 में आए केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के फैसले का हवाला दिया है. ADR ने कहा है कि CIC ने सभी पार्टियों को आरटीआई के दायरे में करार दिया था, लेकिन किसी भी पार्टी ने इस पर अमल नहीं किया. ADR की यह यह याचिका 2015 से लंबित है. बाद में इसी मसले पर वकील अश्विनी उपाध्याय ने भी याचिका दाखिल की थी. कोर्ट ने दोनों याचिकाओं को एक साथ जोड़ दिया था.

शुक्रवार, 14 फरवरी को हुई संक्षिप्त सुनवाई में ADR के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड मामले के फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों के कामकाज में पारदर्शिता की बात कही है. इस पर चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सभी पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई करेगा.

याचिकाओं में कहा गया है कि राजनीतिक दल सरकारी नीतियों को तय करने में भूमिका निभाते हैं. उन्हें सरकार से रियायती दर पर जमीन, इनकम टैक्स में छूट और सरकारी टीवी/रेडियो पर मुफ्त प्रचार का मौका भी मिलता है इसलिए, उन्हें RTI के दायरे में लाना चाहिए. ADR की याचिका में 6 पार्टियों- कांग्रेस, बीजेपी, एनसीपी, बीएसपी, सीपीआई और सीपीएम को भी पक्ष बनाया गया है.

कुछ राजनीतिक दलों ने यह स्टैंड लिया है कि पार्टी के अंदरूनी कामकाज को RTI के दायरे में लाना गलत होगा. कल को लोग यह भी पूछने लगेंगे कि पार्टी को आंतरिक बैठकों में किस बात पर चर्चा हुई? क्या भविष्य में पार्टी कोई आंदोलन करने वाली है? पार्टी ने किसी प्रत्याशी को चुनाव लड़ने का टिकट क्यों दिया? केंद्र सरकार ने भी 2016 में दाखिल जवाब में कहा था कि CIC ने RTI एक्ट की धारा 2 (h) का ज्यादा उदार विश्लेषण किया है. राजनीतिक पार्टियों का रजिस्ट्रेशन जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत जरूर होता है, लेकिन उन्हें सरकार का हिस्सा नहीं कहा जा सकता.

 

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करीब 2 दशक से सुप्रीम कोर्ट के गलियारों का एक जाना-पहचाना चेहरा. पत्रकारिता में बिताया समय उससे भी अधिक. कानूनी ख़बरों की जटिलता को सरलता में बदलने का कौशल. खाली समय में सिनेमा, संगीत और इतिहास में रुचि.
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