जनगणना में जातियों के आधार पर गिनती रोकने की मांग सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई, कहा- "कल्याण योजनाएं लागू करने के लिए पिछड़ेपन का आंकड़ा ज़रूरी"
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि कल्याणकारी योजनाओं को लागू करते समय पिछड़े वर्गों और दूसरे सामाजिक समूहों की सही स्थिति को समझना जरूरी है.

जनगणना में जातियों के आधार पर गिनती के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा है कि यह नीतिगत मसला है. वह इसमें दखल नहीं देगा. अगर सरकार पिछड़ी जातियों की गणना नहीं करेगी तो उनके लिए कल्याण योजनाएं लागू करना मुश्किल होगा.
हाल ही में शुरू राष्ट्रीय जनगणना से जातिगत गणना को बाहर रखने की मांग वाली यह याचिका हैदराबाद के रहने वाले सुधाकर गुम्मुला ने दाखिल की थी. याचिकाकर्ता की दलील थी कि जातिगत डेटा के संग्रह से सामाजिक और राजनीतिक जटिलताएं बढ़ सकती हैं. इस आंकड़े का एजेंसियों की तरफ से दुरुपयोग किया जा सकता है.
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मामला चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच में सुनवाई के लिए लगा. जजों ने याचिकाकर्ता के तर्क को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने साफ किया कि जनगणना में जाति आधारित आंकड़ों को शामिल करना या न करना पूरी तरह से नीतिगत मसला है, जो सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है. कोर्ट इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता.
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सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि कल्याणकारी योजनाओं को लागू करते समय पिछड़े वर्गों और दूसरे सामाजिक समूहों की सही स्थिति को समझना जरूरी है. इसके लिए सरकार को सही आंकड़ों की जरूरत है. जनगणना के जरिए यह आंकड़े जुटाए जा सकते हैं.
Source: IOCL


























