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'समान मानदंडों पर महिला-पुरुष अधिकारियों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता', सुप्रीम कोर्ट को बताया गया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि थलसेना की अधिकारियों के बैच की याचिका के बाद वह नौसेना और फिर वायुसेना की अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करेगा, जिन्होंने उन्हें स्थाई कमीशन नहीं दिए जाने को चुनौती दी है.

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार (6 अगस्त, 2025) को बताया गया भारतीय सेना के महिला और पुरुष अधिकारी दो असमान और अलग-अलग वर्ग हैं इसलिए उन्हें समान मानदंडों और कट-ऑफ अंकों के आधार पर स्थाई कमीशन देने के लिए एक साथ विचार नहीं किया जा सकता.

जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्ल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की उन महिला सैन्य अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की है, जिन्होंने दावा किया है कि उनके पुरुष समकक्षों से भेदभाव के कारण उन्हें स्थायी कमीशन नहीं दिया जा रहा है. बेंच सेवारत और सेवा से मुक्त की गई अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि थलसेना की अधिकारियों के बैच की याचिका के बाद वह नौसेना और फिर वायुसेना की अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करेगा, जिन्होंने उन्हें स्थाई कमीशन नहीं दिए जाने को चुनौती दी है. सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी, मेनका गुरुस्वामी और वी. मोहना और अन्य वकीलों ने एसएससी की महिला अधिकारियों का कोर्ट में प्रतिनिधित्व किया और भेदभाव किए जाने का उल्लेख किया.

सितंबर 2010 में कमीशन प्राप्त महिला अधिकारियों की ओर से पेश हुए अहमदी ने कहा कि वे 15 जनवरी 1991 के नीति पत्र के अनुसार रिक्तियां पाने की हकदार थीं. अहमदी ने कहा, 'दो असमान और अलग-अलग वर्गों, यानी महिला अधिकारियों और पुरुष अधिकारियों को दिसंबर 2020 में चयन बोर्ड संख्या 5 की ओर से समान चयन मानदंड और समान कट-ऑफ के आधार पर एक साथ स्थायी कमीशन (PC) प्रदान करने पर विचार करना समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है.'

उन्होंने कहा कि 2010 के बैच पर विचार करने के लिए जून 2020 में निर्धारित चयन बोर्ड की बैठक स्थगित कर दी गई और अंततः रिक्तियों की कमी के आधार पर 53 व्यक्तियों को स्थायी कमीशन देने से इनकार कर दिया गया. अहमदी ने कहा कि उनकी रिक्तियों की गणना गलत तरीके से की गई थी और यह गणना 15 जनवरी 1991 की नीति के मद्देनजर त्रुटिपूर्ण थी. उन्होंने कहा कि बोर्ड के संचालन वर्ष या परिणाम के प्रकटीकरण का स्थायी कमीशन के लिए रिक्तियों की गणना से कोई लेना-देना नहीं है.

अन्य महिला अधिकारियों के वकीलों ने दलील दी कि उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में लापरवाह तरीके से ग्रेडिंग की जा रही है और उन्हें पुरुष समकक्षों की तुलना में समान अवसर नहीं दिए जा रहे हैं. बेंच ने स्थाई कमीशन देने के लिए समान दिशानिर्देश प्रस्तावित किए, लेकिन विशेष प्रशिक्षण जैसे कारकों को भी ध्यान में रखने की बात कही.

कोर्ट ने अधिकारियों से यह भी पूछा कि उनके अनुसार स्थाई कमीशन के मूल्यांकन का आधार क्या होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट विभिन्न आधारों पर उन्हें स्थाई कमीशन देने से इनकार करने को चुनौती देने वाली 75 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले पारित अंतरिम आदेश लागू रहेंगे, जिसके तहत केंद्र को अधिकारियों की याचिकाओं पर निर्णय होने तक उन्हें सेवा मुक्त करने से रोका गया था. कोर्ट ने 9 मई को, केंद्र से उन एसएससी महिला सैन्य अधिकारियों को सेवा मुक्त नहीं करने का निर्देश दिया था जिन्होंने स्थाई कमीशन देने से इनकार करने के फैसले को चुनौती दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा स्थिति में उनका मनोबल कम नहीं करने को कहा था. केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि यह सशस्त्र बलों को युवा बनाए रखने की नीति पर आधारित एक प्रशासनिक निर्णय था.

कर्नल गीता शर्मा की ओर से पेश हुईं गुरुस्वामी ने इससे पहले कर्नल सोफिया कुरैशी के मामले का उल्लेख किया था, जो उन दो महिला अधिकारियों में से एक थीं, जिन्होंने 7 और 8 मई को ऑपरेशन सिंदूर के बारे में मीडिया को जानकारी दी थी. महिला अधिकारियों ने कोर्ट के 2020 के उस फैसले का हवाला दिया है, जिसमें सेना को उन्हें स्थाई कमीशन देने का निर्देश दिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी 2020 को अपने फैसले में कहा था कि सेना में स्टाफ पदों को छोड़कर, सभी पदों से महिलाओं को पूरी तरह से बाहर रखे जाने का समर्थन नहीं किया जा सकता और बिना किसी औचित्य के कमांड नियुक्तियों में उन पर विचार न करना कानूनन उचित नहीं ठहराया जा सकता.

साल 2020 के फैसले के बाद से, सुप्रीम कोर्ट ने सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन के मुद्दे पर कई आदेश पारित किए हैं और नौसेना, वायु सेना और तटरक्षक बल के मामले में भी इसी तरह के आदेश पारित किये गए.

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