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‘वोटर लिस्ट से नाम गायब, वोट के अधिकार पर हमला...’, पश्चिम बंगाल में जारी SIR पर प्रशांत भूषण ने उठाए कई सवाल

SIR in West Bengal: प्रशांत भूषण ने कहा कि नागरिकता के आधार पर किसी का नाम इस तरह से नहीं हटाया जा सकता, जब तक कोई कोर्ट या फॉरेन ट्रिब्यूनल यह तय न कर दे कि कोई व्यक्ति नागरिक नहीं है.

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  • पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने पर विवाद, समुदाय विशेष को निशाना बनाने का आरोप।
  • वकीलों ने कहा, नागरिकता तय किए बिना नाम हटाना स्थापित प्रक्रिया के खिलाफ है।
  • विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर मताधिकार पर हमला, लोगों में रोष।
  • सरकार वोटर चुन रही है, यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत पर हमला है।

पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक और सामाजिक तबकों में विवाद तेज होता जा रहा है. इसी मुद्दे पर एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स की ओर से सोमवार (6 अप्रैल, 2026) को एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित की गई. इस प्रेस कांफ्रेंस में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, प्रोफेसर अजीत झा, शिक्षक नदीम खान, सोशल एक्टिविस्ट साबिर अहमद (ऑनलाइन) जुड़े और SIR के मुद्दे पर तथ्य रखे.

सम्मेलन में सबसे प्रमुख मुद्दा यह रहा कि SIR के नाम पर पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट से नाम हटाए जा रहे हैं और इसका असर विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय पर पड़ रहा है. इस मुद्दे पर बात रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि SIR के नाम पर पूरी तरह से नई वोटर लिस्ट तैयार की जा रही है, जो कि स्थापित प्रक्रियाओं के खिलाफ है. उन्होंने 2003 का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय पुरानी वोटर लिस्ट के आधार पर संशोधन किया गया था, लेकिन इस बार पूरी सूची ही नए सिरे से बनाई जा रही है.

प्रशांत भूषण ने चुनाव आयोग पर लगाए आरोप

प्रशांत भूषण ने स्पष्ट किया कि नागरिकता के आधार पर किसी का नाम इस तरह से नहीं हटाया जा सकता, जब तक कोई कोर्ट या फॉरेन ट्रिब्यूनल यह तय न कर दे कि कोई व्यक्ति नागरिक नहीं है, तब तक उसका नाम हटाना कानूनन गलत है. उन्होंने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया में इन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा. उन्होंने चुनाव आयोग पर भी सवाल उठाए और कहा कि वह दिल्ली से बैठकर राज्यों की चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है.

उनके अनुसार पश्चिम बंगाल में खासतौर पर मुस्लिम समुदाय को टारगेट किया जा रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि SIR के तहत लोगों से 10-11 दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जबकि कानून ऐसा करने की अनुमति नहीं देता. फॉर्म-6 के तहत केवल सामान्य पहचान के प्रमाण जैसे राशन कार्ड या आधार कार्ड पर्याप्त होते हैं, नागरिकता का अलग से प्रमाण देना आवश्यक नहीं होता. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर कोई नागरिक नहीं है. तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है, लेकिन बिना प्रक्रिया के नाम हटाना गलत है.

SIR का नहीं किया गया सही तरह से इस्तेमालः भूषण

प्रशांत भूषण ने राजनीतिक संदर्भ जोड़ते हुए कहा कि जब भाजपा सरकार सत्ता में आई थी, तब हिंदू राष्ट्र की बात की गई थी. उन्होंने आरोप लगाया कि पहले NRC के जरिए मुस्लिमों को बाहर करने की कोशिश की गई और अब SIR के जरिए चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर उनके नाम हटाने की कोशिश हो रही है. उन्होंने यह भी कहा कि SIR को जल्दबाजी में लागू किया जा रहा है और इसमें चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित डुप्लीकेशन हटाने वाले सॉफ्टवेयर का भी सही इस्तेमाल नहीं किया जा रहा, जबकि मैनुअल में फोटो और डेमोग्राफिक ऑथेंटिकेशन की स्पष्ट प्रक्रिया दी गई है.

SIR के जरिए लोगों के मताधिकार पर हमलाः नदीम खान

इस दौरान एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स से जुड़े नदीम खान ने भी गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने सवाल उठाया कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, वे सामने क्यों नहीं आ रहे ऐसा बोला जाता है. उन्होंने खुद मुर्शिदाबाद और मालदा के कई इलाकों का दौरा करने का दावा किया और कहा कि जिन क्षेत्रों में भाजपा को जीत दिलाने की कोशिश हो रही है, वहां मुस्लिम समुदाय के नाम व्यवस्थित तरीके से हटाए जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि उनकी दो बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) से भी मुलाकात हुई और उनके पास एक सूची है, जिसमें यह दर्ज है कि शबाना समिति स्कूल के पोलिंग स्टेशन पर 534 नामों को दोबारा आवेदन करना पड़ा, यानी पूरा पोलिंग स्टेशन ही लगभग खत्म कर दिया गया.

खान के अनुसार, विद्यासागर स्कूल जैसे कई पोलिंग स्टेशनों से सभी नाम हटा दिए गए हैं. जहां-जहां 100 प्रतिशत नाम हटाए गए हैं, वहां के लोग अब आवाज उठा रहे हैं. उनके अनुसार यह सीधे-सीधे लोगों के राइट टू वोट पर हमला है. उन्होंने दावा किया कि उपलब्ध सूची के अनुसार 87.9 प्रतिशत मुसलमानों के नाम हटाए गए हैं.

विरोध करने पर केंद्रीय एजेंसियों की होती है कार्रवाईः नदीम खान

नदीम खान ने यह भी कहा कि जब लोगों से पूछा जाता है कि वे विरोध क्यों नहीं कर रहे, तो जवाब मिलता है कि अगर वे विरोध करते हैं तो उनके खिलाफ NIA जैसी एजेंसियों की कार्रवाई होती है. उन्होंने चुनाव आयोग पर भी गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वह मनमर्जी से चुनाव प्रक्रिया चला रहा है और SIR को चुनिंदा डिवीजन और विधानसभा क्षेत्रों में लागू किया जा रहा है. दावा है कि उनके पास 20 विधानसभा क्षेत्रों की विस्तृत जानकारी है, जहां 90 प्रतिशत तक नाम गायब हो चुके हैं और गांव के गांव खाली हो गए हैं. सम्मेलन में बंगाल से जुड़े कुछ लोगों को भी जोड़ा गया, जिन्होंने बार-बार यही सवाल उठाया कि उनका नाम वोटर लिस्ट में क्यों शामिल नहीं किया गया.

SIR में ऐसा लगता है कि सरकार ही वोटर को चुन रहीः अजीत झा

वहीं, सम्मेलन में मौजूद प्रोफेसर अजीत झा ने भी SIR प्रक्रिया में लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा कि कई मामलों में पिता का नाम दर्ज है, लेकिन बेटे का नाम सूची से गायब है, जो पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है. उन्होंने कहा कि जब बिहार में SIR चल रहा था, तब भी यह आशंका जताई गई थी कि असली निशाना पश्चिम बंगाल होगा. उनके अनुसार इस प्रक्रिया में अर्बिट्ररी पावर है, जिसमें किसी का भी नाम जोड़ा या हटाया जा सकता है.

प्रोफेसर झा ने लोकतंत्र के मूल सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि लोकतंत्र में वोटर सरकार को चुनते हैं, लेकिन SIR में ऐसा लगता है कि सरकार ही वोटर को चुन रही है. उन्होंने चेतावनी दी कि कोई भी सरकार केवल लोकप्रिय जनसमर्थन से चलती है और लोग इस प्रक्रिया को सफल नहीं होने देंगे. इस सम्मेलन में SIR को लेकर गहरी चिंता और असंतोष व्यक्त किया गया.

यह भी पढ़ेंः ‘नेताओं की हत्या से नहीं रुकेगा ईरान’, US अटैक पर ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई का बड़ा बयान

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