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ओडिशा के पुरी से लड़ सकते हैं लोकसभा चुनाव, क्या इस मास्टर प्लान से 2019 में पीएम मोदी बदलेंगे तस्वीर?

नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2014 को देश के प्रधान मंत्री पद की शपथ ली थी. सरकार के चार साल पूरे होने पर वे ओडिशा के कटक में रैली कर रहे हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि मोदी ने ओडिशा को ही क्यों चुना ?

नई दिल्ली: क्या पीएम नरेन्द्र मोदी इस बार वाराणसी के साथ साथ पुरी से भी चुनाव लड़ सकते हैं ? ओडिशा में इस बात की बड़ी चर्चा है. बीजेपी के कई नेता ऐसा ही चाहते हैं. उनकी मानें तो मोदी के बहाने लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पार्टी के ‘अच्छे दिन’ आ सकते हैं. वैसे तो पुरी से बीजेपी कभी जीत नहीं पाई है. बीजेपी नेताओं को लगता है कि मोदी के जगन्नाथ पुरी आ जाने भर से बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की 105 सीटों पर चुनाव में फ़ायदा हो सकता है. पिछली बार इनमें से सिर्फ़ 6 सीटों पर पार्टी को जीत नसीब हुई थी.

नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2014 को देश के प्रधान मंत्री पद की शपथ ली थी. सरकार के चार साल पूरे होने पर वे ओडिशा के कटक में रैली कर रहे हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि मोदी ने ओडिशा को ही क्यों चुना ?

चार साल के सरकार का कार्यक्रम तो उन्हें यूपी या एमपी में करना चाहिए था लेकिन सब जानते हैं कि मोदी ने बिना चुनावी फ़ायदे के ये फ़ैसला नहीं किया होगा. ओडिशा में इन दिनों चर्चा पीएम मोदी के पुरी से चुनाव लड़ने की भी है. पुरी यानी भगवान जगन्नाथ का धाम. मोदी अभी यूपी के वाराणसी से सांसद हैं. वाराणसी यानी काशी विश्वनाथ का धाम. पिछली बार मोदी वाराणसी के साथ साथ गुजरात के वडोदरा से भी चुनाव लड़े थे.

चर्चा है कि इस बार वे वाराणसी और ओडिशा के पुरी से लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं. हिंदू समाज की भगवान जगन्नाथ में बड़ी आस्था रही है. पश्चिम बंगाल से लेकर आंध्र प्रदेश तक हर घर में उनकी पूजा होती है.

पिछले लोकसभा चुनाव से पहले मोदी पुरी आए थे, भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए थे. पीएम बनने के बाद भी वे यहां आए. जगन्नाथ मंदिर के पुजारी ईपसित प्रतिहारी बताते हैं, “ जब गुंडीचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ की पूजा मोदी जी ने की तो उनके गले से फूलों की माला गिर गई थी, तभी हमें लग गया था वे पीएम बनेंगे.”

पुरी लोकसभा सीट पर बीजेपी कभी जीत नहीं पाई है. पिछले पांच बार से यहां बीजेडी ही जीत रही है. पिनाकी मिश्र यहां के एमपी हैं. दूसरे नंबर पर हर बार कांग्रेस रही है. बीजेपी को तीसरे नंबर पर ही संतोष करना पड़ता है. लेकिन अगर नरेन्द्र मोदी पुरी से चुनाव लड़े तो राजनैतिक तस्वीर बदल सकती है. बीजेपी नेता और केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान कहते हैं कि “पुरी से मोदी लड़ेंगे या नहीं, ये फ़ैसला तो पार्टी करेगी. इसके लिए पार्टी में संसदीय बोर्ड है”

कहते हैं कि भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद मिल गया तो समझिए सब मिल गया. पुरी से चुनाव लड़ने पर नरेन्द्र मोदी को दिल्ली की गद्दी पर बने रहने का आशीर्वाद मिल सकता है. पुरी मंदिर के पुजारी ऐसा मानते हैं. शैवायत सोमेंद्र मुदली कहते हैं, “ओडिशा ही नहीं, बंगाल से लेकर गुजरात तक लोग भगवान जगन्नाथ की पूजा करते हैं, यहां से मोदी जी के चुनाव लड़ने पर उनको बहुत फ़ायदा होगा”

ओडिशा में लोकसभा की 21 सीटें हैं. पिछले चुनाव में मोदी लहर के बावजूद बीजेपी एक ही सीट पर जीत पाई थी. सुंदरगढ से जीते जोएल ओराम अब मोदी सरकार में मंत्री हैं. तीन सीटों पर जीत हार का फासला बहुत कम रहा. बाक़ी बीस सीटों पर नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल जीत गई. विधानसभा चुनाव में भी बीजेडी को बंपर जीत मिली. 147 में से बीजेडी को 117 सीटें मिली. कांग्रेस के हिस्से में 16 सीटें आयीं.

दस सीटों के साथ बीजेपी ओडिशा विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी रह गई. 2014 के लोकसभा चुनाव में ओडिशा में बीजेडी को 43.4%, कांग्रेस को 25.7% और बीजेपी को 18 फ़ीसदी वोट मिले. लेकिन पिछले साल हुए पंचायत के चुनाव में बीजेपी ने अपने विरोधियों के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी.

आदिवासी बहुल इलाक़ों में बीजेपी को शानदार जीत मिली. ज़िला परिषद के चुनाव में बीजेपी को 297 सीटों पर जीत नसीब हुई. जबकि पिछले पंचायत चुनाव में पार्टी को सिर्फ़ 36 सीटें मिली थी. नवीन पटनायक की पार्टी को 473 सीटें मिली जबकि पिछले पंचायत चुनाव में बीजेडी को 651 सीटें मिली थीं.

पंचायत चुनाव में कांग्रेस को पीछे छोड़ कर बीजेपी ओडिशा में दूसरे नंबर की पार्टी बन गई. बीजेडी को 40.8%, बीजेपी को 33.03% और कांग्रेस को 18 प्रतिशत वोट मिले. इसके बाद तो बीजेपी ने ओडिशा में नवीन पटनायक के ख़िलाफ़ हल्ला बोल दिया. बात पिछले साल के पंद्रह अप्रैल की है.

बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भुवनेश्वर में थी. पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था, “बीजेपी के लिए स्वर्णिम काल तब आएगा जब ओडिशा, केरल और पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार होगी.”

बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आए पीएम नरेन्द्र मोदी ने भुवनेश्वर में रोड शो किया था. केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान बीजेपी का सीएम चेहरा बन कर प्रचार में जुट गए. अभी नहीं तो फिर कभी नहीं के फ़ार्मूले पर पार्टी काम कर रही है. बीजेपी की नज़र ओडिशा के साथ साथ पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की 105 सीटों पर है.

2014 के चुनाव में पार्टी को इनमें से सिर्फ़ 6 सीटें ही मिली थीं. पार्टी अगले चुनाव के लिए नये गढ़ की तलाश में है. यूपी और एमपी जैसे राज्यों में नुक़सान हुआ तो इन इलाक़ों से बीजेपी की जान बच सकती है. ऐसे में भगवान जगन्नाथ से बड़ा सहारा मोदी के लिए और कौन हो सकता है ? धर्मेंद्र प्रधान बोले, “ मोदी जी और अमित शाह जी के लिए ओडिशा हमेशा से प्राथमिकता में रहा है. हम इस बार चौंकनेवाले नतीजे ला सकते हैं. ”

पिछले साल पंचायत चुनाव के नतीजे आने के पाद बाद से ओडिशा में राजनैतिक घमासान तेज़ हो गया. सीएम नवीन पटनायक के काम काज पर सवाल उठने लगे. वो भी उनकी पार्टी के अंदर से ही. ऐसे असंतुष्ट बीजेडी नेताओं पर बीजेपी डोरे डालने लगी लेकिन नवीन बाबू स्मार्ट निकले. अधिकतर नेताओं को वे लाईन पर ले आए.

कभी नवीन बाबू के दाहिने हाथ रहे सांसद जय पांडा पार्टी से बाहर कर दिए गए हैं. बीजेपी से गठबंधन तोड़ने के बाद नवीन पटनायक ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. पिछले 17 सालों से ओड़िशा में नवीन बाबू का राज है.

बीजेपी और नरेन्द्र मोदी को रोकने की उनकी अपनी तैयारी है. हाल में ही बीजेपी छोड़ कर बीजू जनता दल के सांसद बने सौम्य रंजन पटनायक कहते हैं, “अगर मोदी जी पुरी से चुनाव लड़ना चाहते हैं तो उनका स्वागत है, हमारे नेता नवीन बाबू के सामने सब फीके हैं”

सात सालों तक बीजेपी और बीजू जनता दल का ओडिशा में गठबंधन रहा, वो दौर अटल बिहारी वाजपेयी का था. 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 7 तो बीजेडी को 9 सीटें मिलीं. साल भर बाद हुए चुनाव में बीजेपी को 9 और बीजेडी को 10 सीटें मिली.

2004 के चुनाव में बीजू जनता दल 11 और बीजेपी 7 सीटों पर जीती. क्या बीजेपी इस बार नवीन पटनायक सरकार के ख़िलाफ़ एंटी इनकंबेंसी का माहौल बना पाएगी ? यही पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. जब नवीन बाबू पहली बार सीएम बने थे तब एक बड़े पत्रकार ने लिखा था, “ओडिशा में भगवान जगन्नाथ के बाद नवीन पटनायक ही वो नाम हैं, जिसे सब जानते हैं.” 18 सालों बाद भी यहां वही हालात हैं न ही कांग्रेस और न ही बीजेपी अब तक उनके लिए चुनौती बन पाए हैं.

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