Explained: पेपर लीक के बाद क्या सदन में पेश होगा परिसीमन बिल?
Monsoon Session 2026: 27 जुलाई से 13 अगस्त तक के 17 दिन भारतीय राजनीति के लिए ऐतिहासिक साबित हो सकते हैं. या तो डिलीमिटेशन बिल पास होकर सदन की सीटों का नक्शा बदल देगा, या फिर मामला आगे खिंचता रहेगा.

27 जुलाई 2027 यानी आज तक पेपर लीक का मुद्दा खत्म हो चुका है. धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है. मोदी सरकार ने नंदन नीलेकणी की लीडरशिप में हाई-लेवल टास्क फोर्स बनाने का ऐलान किया है और एंटी-पेपक लीक कानून को सख्त करने वाला बिल सदन में पेश किया जा रहा है. इससे इतर सरकार की नजर है डिलीमिटेशन (परिसीमन) बिल पर. वह बिल जो लोकसभा की सीटें बढ़ाएगा. यह महिला आरक्षण लागू करके उत्तर-दक्षिण की राजनीति को पूरी तरह से बदल सकता है. तो आखिर अगले 17 दिनों में सरकार क्या दांव खेलेगी...
संसद में सीटों का खेल कितना बदल गया है?
परिसीमन बिल पास होने में असली मसला यही है. संविधान संशोधन के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत चाहिए. 543 सीटों में से 3 सीटें खाली हैं, तो कुल 540 सदस्यों में से 360 वोट चाहिए. अप्रैल 2026 में यह बिल पहली बार पेश किया गया था. तब NDA के पास 298 सीटें थीं. विपक्ष ने एकजुट होकर इसे हरा दिया. लेकिन अप्रैल के बाद से राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं:
- TMC के 20 सासंद NDA में शामिल हो गए.
- शिवसेना (UBT) के 6 सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय कर गए.
- आप के भी 7 राज्यसभा सासंद बीजेपी से मिल गए.
अब NDA के पास 329 सांसद हैं. हालांकि, 360 के आंकड़े से 329 दूर है. सरकार को अभी भी 31 सांसदों के समर्थन की जरूरत है. ये सांसद NDA के बाहर की पार्टियों से आने होंगे.
परिसीमन बिल पास होने में दक्षिण का अड़ंगा क्या है?
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना परिसीमन बिल का सबसे ज्यादा विरोध कर रहे हैं. क्योंकि डिलिमिटेशन आबादी के आधार पर सीटें बांटेगा. दक्षिणी राज्य जनसंख्या कंट्रोल करने में कामयाब हुआ है. इसका मतलब है कि उत्तर के राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी, दक्षिण को कम. दक्षिणी राज्यों का कहना है, 'हमने जनसंख्या नियंत्रण किया, तो हमें सजा क्यों मिले?'
VCK प्रमुख थोल. थिरुमावलवन ने कहा, 'इस बिल से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व असमान रूप से घट जाएगा.'
कांग्रेस ने भी साफ कह दिया कि वह इस बिल का पुरजोर विरोध करेगी.
तो इसके बीच मोदी सरकार क्या तिगड़म लगा रही है?
सरकार को 31 वोट चाहिए. वह इन वोटों के लिए कई पार्टियों को साध रही है:
- DMK: यह INDIA गठबंधन का हिस्सा था, लेकिन तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस से उसके रिश्ते बिगड़ गए. बीजेपी को उम्मीद है कि DMK को अपने पाले में किया जा सकता है.
- समाजवादी पार्टी: उत्तर प्रदेश को डिलीमिटेशन से सबसे ज्यादा फायदा होगा. बीजेपी को उम्मीद है कि सपा इस फायदे के लिए बिल का समर्थन कर सकती है.
- NCP (शरद पवार): NCP (SP) की सुप्रिया सुले ने कहा कि अगर हर राज्य को 50% सीटों की बढ़ोतरी की गारंटी दी जाए, तो वे समर्थन कर सकते हैं. यानी सीटें आबादी के आधार पर न बांटी जाएं, बल्कि हर राज्य को समान रूप से 50% अतिरिक्त सीटें मिलें.
- BJD और YSRCP: इन पार्टियों से भी संपर्क किया जा रहा है.
- शिवसेना (UBT): 6 सांसद तो शिंदे में मिल गए, बाकी 3 सांसद अभी भी UBT के साथ हैं. उन्हें भी मनाने की कोशिश हो रही है.
मानसून सत्र के बचे हुए 17 दिनों में क्या होगा?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यहां तीन सिनेरियो बन सकते हैं:
सिनेरियो 1: बिल पेश ही नहीं होगा
सरकार ने अभी तक डिलीमिटेशन बिल को आधिकारिक एजेंडा में नहीं डाला है. 20 जुलाई को जो बिल लिस्ट जारी हुई थी, उसमें डिलीमिटेशन का जिक्र नहीं था. कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है, 'सरकार तब तक बिल नहीं लाएगी जब तक उसे नंबरों का भरोसा न हो.' अगर नंबर नहीं जुटे, तो सरकार बिल को वापस ले सकती है और विंटर सेशन या स्पेशल सेशन का इंतजार कर सकती है.
सिनेरियो 2: बिल पेश होगा, लेकिन पास नहीं होगा
मोदी सरकार कोशिश कर सकती है, लेकिन अगर विपक्ष एकजुट रहा और 31 वोट नहीं जुटे, तो बिल फिर हार जाएगा. कांग्रेस ने INDIA गठबंधन के साथ मिलकर रणनीति बनाई है.
सिनेरियो 3: सरकार को नंबर मिल जाएंगे
अगर सपा, DMK, NCP (SP), BJD और YSRCP जैसी कुछ पार्टियां समर्थन कर देती हैं, तो सरकार 360 का आंकड़ा पार कर सकती है. अगर ऐसा हुआ तो 2029 के चुनाव से पहले ही देश की सीटों का नक्शा बदल जाएगा. संविधान के जानकार PDT आचार्य का कहना है, 'संविधान संशोधन साधारण बहुमत से नहीं हो सकता. जब तक सरकार को नंबरों का भरोसा न हो, वह बिल पेश नहीं करेगी.'
परिसीमन बिल की ऐतिहासिक कहानी क्या है?
भारत में लोकसभा सीटें 1976 में आखिरी बार तय हुई थीं. तब इंदिरा गांधी सरकार ने 2001 की जनगणना तक सीटों को फ्रीज र दिया. फिर 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सराकर ने इस फ्रीज को 2026 तक बढ़ा दिा. यानी पिछले 50 सालों से लोकसभा की सीटें 543 पर अटकी हुई हैं, भले ही आबादी कितनी भी बदल गई हो.
अब 2026 आ गया है. फ्रीज खत्म हो गया है और सराकर नया डिलीमिटेशन करना चाहती है. 131वें संविधान संशोधन बिल लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखता है. इसके साथ ही यह महिला आरक्षण (33%) लागू करने का रास्ता भी साफ करता है. अगर ये बिल पास हो गए, तो 2029 के आम चुनाव से पहले पूरे देश की सीटें बदल जाएंगी.
























