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Air Strike के एक महीने बाद चुनिंदा मीडियाकर्मियों को लेकर बालाकोट पहुंची पाक सेना, उठे कई बड़े सवाल

बालाकोट के टेरर कैंप को दुनिया को दिखाने के लिए पाकिस्तानी सेना को आखिर पूरा एक महीना क्यों लग गया? क्या इस दौरान कैंप के भीतर पाकिस्तानी सेना ने कुछ मरम्मत या फिर रंग-रोगन कराया है?

नई दिल्ली: भारत की एयर-स्ट्राइक के ठीक एक महीने बाद पाकिस्तानी सेना पहली बार कुछ चुनिंदा मीडियाकर्मियों को लेकर बालाकोट के उसी जैश-ए-मोहम्मद के ट्रैनिंग कैंप लेकर पहुंची है, जिसको लेकर अभी तक सस्पेंस बना हुआ था. लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, जब पाकिस्तानी सेना 8 मीडियाकर्मियों को वहां लेकर पहुंची तो पता चला कि पाकिस्तानी सैनिकों ने उस कैंप को अपने कब्जे में ले रखा है. साथ ही कैंप के कुछ हिस्सों को तिरपाल से ढका हुआ था.

टेरर कैंप दुनिया को दिखाने में क्यों लगा एक महीना?

भारत के उच्चपदस्थ सूत्रों के मुताबिक, अगर पाकिस्तानी सेना कुछ चुनिंदा मीडियाकर्मियों को लेकर बालाकोट पहुंची थी तो उन जगहों को क्यों नहीं दिखाया जिन्हें तिरपाल से ढका हुआ था. सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान को ये भी बताना चाहिए कि बालाकोट के टेरर कैंप को दुनिया को दिखाने के लिए पाकिस्तानी सेना को आखिर पूरा एक महीना क्यों लग गया? क्या इस दौरान कैंप के भीतर पाकिस्तानी सेना ने कुछ मरम्मत या फिर रंग-रोगन कराया है?

जानकारी के मुताबिक, गुरूवार की सुबह करीब 10 बजे पाकिस्तानी सेना की मीडिया-विंग, आईेएसपीआर (इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशन) पाकिस्तान के कुल 08 चुनिंदा मीडियाकर्मियों को हेलीकॉप्टर के जरिए मरकज़ सैय्यद अहमद शहीद नाम के उस मदरसे में लेकर गई जहां आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद का टेरर कैंप चलता था और जहां पर 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने एयर-स्ट्राइक की थी.

पाकिस्तानी सेना ने मीडिया को नहीं दी थी कैंप तक जाने की  इजाजत

बालाकोट में हुए हवाई हमले के बाद भारत ने दावा किया था कि जैश ए मोहम्मद के टॉप कमांडर्स के साथ साथ बड़ी बड़ी तादाद में आतंकी मारे गए थे. लेकिन पाकिस्तानी सेना ने दावा किया था कि भारतीय लड़ाकू विमान जल्दबाज़ी में कैंप के करीब जंगल में बम फेंककर भाग खड़े हुए थे. लेकिन इस दावे के बाद भी पाकिस्तानी सेना ने किसी मीडिया को उस कैंप तक जाने की इजाजत नहीं दी थी. हमले के कुछ दिन बाद भी आईएसपीआर बड़ी तादाद में मीडियाकर्मियों को बालाकोट लेकर गई थी, लेकिन कैंप से कुछ किलोमीटर पहले ही रोक दिया गया था. उसके बाद कुछ अंतर्राष्ट्रीय न्यूज एजेंसी और मीडिया ने कैंप तक जाने की कोशिश की थी ये देखने के लिए कि आखिर भारत की एयर-स्ट्राइक के कितना नुकसान हुआ है, लेकिन वहां तैनात सैनिकों ने उन्हें कैंप के करीब तक भी नहीं जाने दिया था.

पाक ने सवाल उठने के बाद आयोजित किया मीडिया-टूर 

सूत्रों के मुताबिक, बालाकोट टेरर कैंप को मीडिया की नजरों से छिपाने से पाकिस्तानी सेना के दावों पर सवाल खड़े हो रहे थे, इसीलिए आईएसपीआर ने ये मीडिया-टूर आयोजित किया. लेकिन सूत्रों ने एबीपी न्यूज को बताया कि इस दौरान भी कैंप के अंदर के कुछ हिस्सों को जानबूझकर पाकिस्तान ने छिपा रखा था. यहां पर आईएसपीआर ने मदरसे में पढ़ने वाले करीब 375 बच्चों से भी मिलवाया और उनके वीडिया तैयार करवाए.

सूत्रों के मुताबिक, इस मीडिया-वीजिट के दौरान पाकिस्तानी सेना ने दिखाने की कोशिश की भारत की एयर-स्ट्राइक के कोई नुकसान नहीं हुआ है. साथ ही ये दर्शाने की कोशिश की यहां पर बच्चों को तालीम दिए जाने वाला एक मदरसा चलता है (ना कि कोई आंतकी कैंप).

5 घंटे बालाकोट में रहे 8 मीडियाकर्मी

जानकारी के मुताबिक, इस तथाकथित मदरसे को पाकिस्तान की फ्रंटियर-कोर के सैनिकों ने सुरक्षा प्रदान कर रखी है. फ्रंटियर कोर खबैर-पख्तूनखवां और बलूचिस्तान में कानून-व्यवस्था संभालने वाली एक अर्द्धसैनिक बल है.  करीब पांच घंटे यानि सुबह 10 बजे से दोपबर 3 बजे तक ये सभी आठों मीडियाकर्मी आईएसपीआर के अधिकारियों के साथ बालाकोट में ही रहे.

आपको बता दें कि बालाकोट में भारत के हवाई हमले से पहले भी किसी स्थानीय नागरिक को इस मदरसे के रूप में चलने वाले टेरर कैंप तक आने की इजाजत नहीं थी. बालाकोट का ये टेरर कैंप जाबा-हिल पहाड़ी पर चलता था. इस पहाड़ी तक जाने वाले रास्ते पर मदरसे और जैश ए मोहम्मद के मुखिया मौलाना मसूद अजहर के नाम का बोर्ड भी लगा था, जिसे एयर-स्ट्राइक के बाद हटा दिया गया था. इस बोर्ड से आगे किसी को भी बिना पाकिस्तानी सेना की आज्ञा के जाने की इजाजत नहीं थी.

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