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महाराष्ट्र में बदलते सियासी समीकरणों के बीच राज ठाकरे और पीएम मोदी के बनते बिगड़ते रिश्ते

अब महाराष्ट्र के बदले सियासी समीकरण को राज ठाकरे अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाने की खातिर भुनाने की सोच रहे हैं. राज ठाकरे जल्द ही अपनी पार्टी के झंडे का रंग भगवा करने जा रहे हैं.

मुंबई: मंगलवार की शाम महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस की मुलाकात ने सियासी हलकों में चर्चा गर्म कर दी है कि दोनो पार्टियां जल्द ही महाराष्ट्र में गठबंधन का ऐलान कर सकतीं हैं. राज ठाकरे जल्द ही अपनी पार्टी के झंडे का रंग भगवा करने जा रहे हैं. शिवसेना के हिंदुत्व के मुद्दे पर नरम पड़ने और बीजेपी से अलगाव के बाद एमएनएस अब हिंदुत्व का मुद्दा अपनाकर बीजेपी की महाराष्ट्र में नई पार्टनर बन सकती है. बीते दशक भर को अगर देखें तो राज ठाकरे और बीजेपी का रिश्ता कभी दोस्ती तो कभी दुश्मनी वाला रहा है.

2006 में राज ठाकरे ने जब अपनी पार्टी एमएनएस शुरू की तो मुख्य दुश्मन शिवसेना को माना, बीजेपी को नहीं जिसका कि तब शिवसेना के साथ गठबंधन था. राज ठाकरे साल 2011 में गुजरात भी गये जब नरेंद्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे. ठाकरे का कहना था कि वे गुजरात इसलिये गये थे क्योंकि वे जानना चाहते थे कि मोदी किस तरह भ्रष्टाचार मुक्त और सक्षम सरकार चला रहे हैं. 9 दिनों के दौरे के बाद राज ठाकरे और नरेंद्र मोदी ने एक दूसरे की खूब तारीफ की. ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र के राजनेताओं को भी मोदी के मॉडल से सीख लेनी चाहिये.

2014 के लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस भी उतरी. राज ठाकरे ने बीजेपी की सहयोगी शिवसेना के उम्मीदवारों के खिलाफ तो अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन बीजेपी के जिन सीटों पर उम्मीदवार थे वहां अपने प्रत्याशी नहीं उतारे. राज ठाकरे का तब कहना था कि वे मोदी का पीएम पद के लिये समर्थन करने की खातिर बीजेपी के हिस्से में आई सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतार रहे.

नोटबंदी का राज ठाकरे ने विरोध किया

मोदी प्रधानमंत्री तो बन गये लेकिन इस बीच राज ठाकरे को उनकी कई नीतियां पसंद नहीं आईं. नोटबंदी का तो राज ठाकरे ने विरोध किया ही लेकिन सबसे ज्यादा वे मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट बुलेट ट्रेन के खिलाफ थे. ठाकरे का कहना था कि मुंबई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन चलाया जाना गैर जरूरी है और ये सिर्फ गुजरातियों को फायदा पहुंचाने के लिये किया जा रहा है. चीनी पीएम को गुजरात ले जाने का भी उन्होंने विरोध किया. रक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ बडे प्रोजक्ट जब गुजरात स्थानांतरित किये गये तो उसपर ठाकरे नाराज हो गये. ठाकरे की मोदी से नाराजगी इस कदर हो गई कि उन्होने एक इंटरव्यू में कहा कि वे देश के नहीं गुजरात के पीएम लगते हैं.

2019 का लोकसभा चुनाव राज ठाकरे ने न लड़ने का फैसला किया, लेकिन चुनावों से पहले वे लगातार खबरों में बने रहे. इसका कारण था कि ठाकरे राज्यभर में घूम-घूम कर मोदी के खिलाफ प्रचार कर रहे थे. मंच पर वीडियो स्क्रीन के जरिये वे मोदी के पुराने भाषणों का हिस्सा दिखाते थे और समझाने की कोशिश करते थे कि मोदी कितने झूठे हैं. सियासी जानकार मानते हैं कि ऐसा वे कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को फायदा पहुंचाने के लिये कर रहे थे. खुद तत्कालीन सीएम देवेंद्र फडणवीस ने आरोप लगाया कि ठाकरे बारामती की (यानी कि शरद पवार की) दी हुई स्क्रिप्ट पढ रहे हैं. राज ठाकरे की बीजेपी के खिलाफ चलाई गई वीडियो मुहिम में भीड़ तो खूब जुटती थी लेकिन इसका कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को कोई फायदा नहीं हुआ. गठबंधन को 48 में से महज 5 सीटें ही मिल पाईं जो कि लगभग पिछले चुनाव जितनी ही थीं.

राज ठाकरे कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन से जुड़ना चाहते थे

लोकसभा चुनाव के बाद हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में राज ठाकरे कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन से जुड़ना चाहते थे. लेकिन कांग्रेस ने उन्हें साथ लेने से इंकार कर दिया. कांग्रेस को लग रहा था कि ठाकरे की उत्तर भारतीय विरोधी छवि होने के कारण उसे महाराष्ट्र के बाहर नुकसान हो सकता है. राज ठाकरे ने एनसीपी के साथ एक अनौपचारिक समझौता किया और कुछ सीटों पर दोनों ने एक दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारे. राज ठाकरे को इसका कोई फायदा नहीं मिला और उनकी पार्टी पिछले चुनाव की तरह सिर्फ 1 सीट ही जीत पायी.

अब महाराष्ट्र के बदले सियासी समीकरण को राज ठाकरे अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाने की खातिर भुनाने की सोच रहे हैं. बीजेपी को भी शिवसेना का साथ छूटने के बाद एक स्थानीय पार्टनर की जरूरत महसूस हो रही है. ऐसे में पुरानी बातें भूल कर दोनों फिर एक साथ आने की कोशिश कर रहे हैं. सवाल इतना ही है कि बीजेपी जब यूपी, बिहार में वोट मांगने जायेगी तो उत्तरभारतियों को पिटवाने वाले राज ठाकरे से दोस्ती के पीछे क्या तर्क देगी?

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