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शिवसेना की सियासत जो दिखती है उससे ज्यादा चौंकाती है, एक उदाहरण से समझिए

तमाम सियासी झंझावतों के बीच आज बीजेपी-शिवसेना में सीटों का समीकरण बैठने की संभावना है. आज शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फणनवीस साझा बयान जारी करेंगे. उम्मीद है कि सीटों का एलान हो... ऐसी चर्चा है.

नई दिल्ली: तमाम सियासी झंझावतों के बीच आज बीजेपी-शिवसेना में सीटों का समीकरण बैठने की संभावना है. आज शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फणनवीस साझा बयान जारी करेंगे. उम्मीद है कि सीटों का एलान हो... ऐसी चर्चा है.

चलिए आज हम ठाकरे परिवार और उसके सियासी सफर पर चर्चा करते हैं. उद्धव ठाकरे समय-समय पर नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना करते रहे हैं. कई मौके पर दोनों पार्टियों में खटास भी नजर आई है लेकिन आपसी मतभेदों के बावजूद दोनों पार्टियों के विचार एक-दूसरे से काफी हद तक मिलते हैं. उद्धव ठाकरे अपने पिता की तरह चुनाव नहीं लड़ते लेकिन पार्टी की नीतियों एवं संगठन पर उनकी अच्छी पकड़ और प्रभाव है.

शिवसेना की सियासत जो दिखती है उससे ज्यादा चौंकाती है. एक उदाहरण से समझिए... 2007 के राष्ट्रपति चुनाव में शिव सेना ने दशकों से अपनी सहयोगी रही बीजेपी उम्मीदवार की जगह कांग्रेस की प्रतिभा पाटिल का समर्थन कर दिया. साल 2012 में भी कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी के समर्थन में उतर आए थे. जब पूरे विपक्ष और आम लोगों में आपातकाल को लेकर रोष था तो चौंकाने वाला पल था वह जब शिवसेना ने इमरजेंसी का समर्थन कर दिया था.

तीखी नोंकझोंक की झलक पिछले विधानसभा में दिखी. दशकों का रिश्ता 'जूनियर' और 'सीनियर' के द्वंद में चंद सीटों के लिए टूट गया. फिर खास तरह की नैतिकता के आगे नतमस्तक होकर साथ सरकार बनाए और 2019 लोकसभा में दोनों पार्टियां साथ-साथ चुनाव लड़ीं. चुनावी अंकगणित के पैमाने पर गठबंधन सफल रहा. लेकिन दोनों दलों के बीच बयानों के तीर तरकश से छूटते रहते हैं. एक बार फिर विधानसभा समर की तैयारी जोरों पर हैं. सियासी गलियारे में यह चर्चा है कि बीजेपी जितना भी शिवसेना पर दबाव बनाए लेकिन सच्चाई ये है कि बीजेपी शिवसेना का साथ नहीं छोड़ना चाहती. जहां एक तरफ शिवसेना का साथ बीजेपी के लिए जरूरी है कि वहीं शिवसेना भी ये जानती है कि गठबंधन नहीं हुआ तो उनके कई विधायक और नेता बीजेपी में शामिल हो सकते हैं.

वक्त का पहिया कुछ साल पीछे चलिए और जरा डीटेल्स में समझिए... नवंबर 2012 बाल ठाकरे का निधन हो गया. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर पर सवार होकर शिवसेना ने भी महाराष्ट्र में अपनी जबरदस्त वापसी की. पार्टी ने 18 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही. कुछ महीने बाद ही महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए. इन चुनावों में बीजेपी और शिवसेना का 25 साल पुराना गठबंधन टूट गया. इसके बावजूद बीजेपी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. आखिरकार दोबारा गठबंधन की सरकार बनी. मख्यमंत्री बीजेपी के देवेंद्र फड़नवीस बने. राज्य में शिवसेना के साथ बीजेपी के साथ गठबंधन तो हुआ लेकिन पहले जैसी बात ना रही.

उद्धव ठाकरे का राजनीतिक सफर

जब तक बाला साहेब ठाकरे राजनीति में सक्रिय रहे तो उद्धव राजनीतिक परिदृश्य से लगभग दूर ही रहे. वह इस दौरान 'सामना' का संपादन करते रहे. साल 2000 में वह सक्रिय राजनीति में आए. साल 2002 में बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (बीएमसी) के चुनावों में शिवसेना ने शानदार प्रदर्शन किया और इस जीत का पूरा श्रेय उद्धव ठाकरे को गया. इसके बाद साल 2003 में उन्हें पार्टी का कार्यकारी अधिकारी बनाया गया. इसके बाद बाल ठाकरे ने अपने बेटे उद्धव को उत्तराधिकारी चुना और इसी बात से नाराज होकर राज ठाकरे ने 2006 में पार्टी छोड़ दी और नई पार्टी का गठन किया. उद्धव ठाकरे ने रश्मि ठाकरे से शादी की है और उनके दो बेटे आदित्य और तेजस हैं. उनका बड़ा बेटा आदित्य दादा और पिता की तरह राजनीति में सक्रिय है और शिवसेना की युवा संगठन युवा सेना का राष्ट्रीय अध्यक्ष है.

क्या रहे थे साल 2014 के नतीजे साल 2014 में बीजेपी ने सबसे ज्यादा 122 सीटों पर जीत दर्ज की थी. वहीं उसकी सहयोगी शिवसेना ने दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा 63 सीटों पर जीत दर्ज की थी. यहां बता दें कि शिवसेना और बीजेपी ने चुनाव अलग-अलग लड़ा था लेकिन नतीजों के बाद गठबंधन में आ गए थे. साल 2014 में कांग्रेस, राज्य में 41 सीटों के साथ तीसरी बड़ी पार्टी रही थी. 2014 में दोनों ही गठबंधन टूट गए थे. एक तरफ बीजेपी और शिवसेना तो दूसरी तरफ कांग्रेस और एनसीपी ने भी अलग अलग चुनाव लड़ा था.

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