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Explained: कर्नाटक के जिस ऐतिहासिक मदरसे में भीड़ ने की पूजा, जानिए उससे जुड़ा इतिहास

Bidar Mahmud Gawan Madrasa: कर्नाटक के बीदर में एक मदरसे में भीड़ पर ताला तोड़कर घुसने और उसमें पूजा करने का आरोप लगता है. इसके बाद इस मामले पर बवाल होना शुरू हो जाता है. जानिए पूरी कहानी.

Mahmud Gawan Madrasa: कर्नाटक (Karnataka) के बीदर (Bidar) जिले में जुलूस निकाल रहे लोगों की भीड़ एक मदरसे में घुस जाती है और वहां पूजा करती है. इसके बाद इलाके में अशांति का माहौल हो जाता है. मामला पुलिस (Police) तक पहुंचता है और पुलिस धर-पकड़ चालू करती है और 9 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करते हुए 4 लोगों गिरफ्तार कर लेती है. 5 आरोपी अभी फरार चल रहे हैं. आरोप लगता है कि भीड़ मदरसे (Madrasa) का ताला तोड़कर अंदर गई और पूजा की. ये घटना गुरुवार 6 अक्टूबर 2022 को घटती है.

इस मामले पर पुलिस का कहना है कि निजाम काल से ही दशहरा के मौके पर पूजा करने का रिवाज यहां चलता आ रहा है. तो वहीं गृह मंत्री अरागा ज्ञानेंद्र ने इस मामले पर कहा है कि ऐसा बताया गया है कि मदरसे के पास एक पेड़ था जिसकी हर साल पूजा होती है. ये पूजा कई सालों से चली आ रही है. इस घटना के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं, विभाग से जानकारी ली जाएगी. जिस मदरसे की यहां चर्चा हो रही है वो कोई आम मदरसा नहीं है. ये एक ऐतिहासिक मदरसा है और सदियों पुराना है. इसलिए इसके बारे में चर्चा ज्यादा हो रही है.

क्या है मदरसे का इतिहास?

जिस मदरसे के अंदर भीड़ घुसी उस मदरसे को बीदर के महमूद गवां मदरसा के नाम से जाना जाता है. इसका निर्माण साल 1460 के आसपास का बताया जाता है. ये मदरसा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत आता है और ये राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की सूची में भी आता है. कहा जाता है कि महमूद गवां ने इस मदरसे का निर्माण अपने पैसे से किया था. इस मदरसे का इस्तेमाल आवासीय विश्वविद्यालय की तरह किया जाता रहा.

इस मदरसे को खुरासान के मदरसे की तर्ज पर बनवाया गया था. इस मदरसे की भव्य और विशाल इमारत बीदर की पहचान है. इससके अलावा इस मदरसे के परिसर में एक बड़ी मीनार, एक लाइब्रेरी, एक मस्जिद, लैब, लेक्चर रूम और एक बड़ा सा आंगन हुआ करता था. इस मदरसे की क्षमता 1000 छात्रों और अध्यपकों की रही. महमूर गवां का प्रभाव ही था जिसकी वजह से इस मदरसे में ईरान और ईराक से उस समय के कई विद्वान पढ़ाने आते थे.

कौन थे महमूद गवां?

कहा जाता है कि 15वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन तुगलक (Muhammad Bin Tuglaq) के शासन काल के आखिरी दौर में दक्षिण भारत (South India) में बहमनी सल्तनत की स्थापना की गई थी. इस सल्तनत में ही महमूद गवां (Mahmud Gavan) का जन्म हुआ और उन्हें एक विद्वान की उपाधि दी गई. मुख्य रूप से ईरान के पारसी समुदाय से आने वाले महमूद गवां को एक और नाम से जाना जाता है और वो नाम है ख्वाजा महमूद गिलानी.

महमूद गिलानी फारजा के गवन गांव से थे तो ऐसे में उनके नाम के आगे गवां जुड़ा. महमूद गवां को इस्लाम, धर्मशास्त्र, फारसी और गणित जैसे विषयों महारत हासिल था. कहा जाता है कि वो एक कवि भी थे और लेखक भी. महमूद गवां ने साल 1458 से 1481 तक तीन बहमनी सुल्तानों के प्रधानमंत्री के रूप में काम किया था और साल 1482 में उनकी हत्या करवा दी गई थी.

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