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जस्टिस एसए बोबडे बनेंगे भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश, वकीलों के बीच अपनी किस खूबी के लिए जाने जाते हैं

जस्टिस शरद अरविंद बोबडे देश के अगले मुख्य न्यायाधीश होंगे. राष्ट्रपति ने उनकी नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया है. अभी जस्टिस बोबडे सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम जज हैं.

नई दिल्ली: जस्टिस शरद अरविंद बोबडे देश के अगले मुख्य न्यायाधीश होंगे. राष्ट्रपति ने उनकी नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया है. अभी जस्टिस बोबडे सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम जज हैं. मौजूदा चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के रिटायर होने के बाद वह 18 नवंबर को कार्यभार संभालेंगे. वह देश के 47वें चीफ जस्टिस होंगे. उनका कार्यकाल 23 अप्रैल 2021 तक होगा.

24 अप्रैल 1956 को महाराष्ट्र के नागपुर में जन्मे बोबडे का परिवार वकालत से जुड़ा रहा है. उनके दादा एक वकील थे. पिता अरविंद बोबडे 1987 से 1991 के बीच महाराष्ट्र के एडोवोकेट जनरल रहे. उन्हें इस दौरान राज्य के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के शंकर राव चव्हाण और शरद पवार का विश्वासपात्र माना जाता था. उनके बड़े भाई विनोद बोबडे भी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील थे.

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जस्टिस बोबडे ने नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल करने के बाद 1978 में वकालत शुरू की. उन्होंने शुरू में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में प्रेक्टिस की. बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट की मुख्य बेंच और सुप्रीम कोर्ट में भी बतौर वकील पहचान बनाई. 1998 में उन्हें वरिष्ठ वकील का दर्जा मिला. मार्च 2000 में वह बॉम्बे हाई कोर्ट के जज बने. अक्टूबर 2012 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस नियुक्त किए गए. 12 अप्रैल 2013 को वे सुप्रीम कोर्ट के जज बने.

सौम्य स्वभाव के जस्टिस बोबडे वकीलों को जिरह का पूरा मौका देने के लिए जाने जाते हैं. 17 मई 2018 को रात 2 बजे कर्नाटक के राजनीतिक संकट पर सुनवाई करने वाली 3 जजों की बेंच के वह सदस्य थे. तब जस्टिस ए के सीकरी, एस ए बोबडे और अशोक भूषण की बेंच ने राज्यपाल की अधिकार क्षेत्र में दखल न देते हुए बीजेपी के येदियुरप्पा को सीएम पद की शपथ लेने से नहीं रोका. लेकिन अगले दिन हुई सुनवाई में साफ कर दिया कि नए सी को बहुमत साबित करने के लिए लंबा समय नहीं दिया जाएगा. कोर्ट ने विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के लिए लगभग 24 घंटे का समय दिया. सीएम ने उससे पहले ही इस्तीफा दे दिया.

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जस्टिस बोबडे निजता को मौलिक अधिकार घोषित करने वाली 9 जजों की बेंच के सदस्य थे. इस साल अप्रैल में उनकी अध्यक्षता वाली बेंच ने मस्ज़िद में महिलाओं को जाने और नमाज़ पढ़ने की इजाज़त मांगने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया.

वह 3 जजों की उस बेंच का भी हिस्सा रहे हैं जिसने यह कहा था कि आधार कार्ड न होने के चलते किसी नागरिक को बुनियादी सरकारी सुविधाओं और सब्सिडी से मना नहीं किया जा सकता. जस्टिस बोबड़े उस बेंच का भी हिस्सा थे जिसने 25 हफ्ते की गर्भवती महिला को गर्भपात की इजाज़त दी थी. गर्भ में पल रहे भ्रूण में कई तरह की विकृतियों और गर्भ जारी रखने पर महिला की जान को खतरे के मद्देनज़र यह इजाज़त दी गई थी.

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12 जनवरी 2018 को 4 वरिष्ठतम जजों के तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ सामने आने से पैदा संकट के हल में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी. उस वक्त वह छठे वरिष्ठतम जज थे. जस्टिस जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ की प्रेस कांफ्रेंस के बाद जस्टिस बोबडे उनसे मिलने वाले पहले जज थे. माना जाता है कि उन्होंने न सिर्फ कामकाज के बंटवारे से नाराज़ जजों को समझाया, बल्कि विवाद को बढ़ने से रोकने के लिए चीफ जस्टिस को भी इस पर खुली प्रतिक्रिया न देने के लिए तैयार किया. बाद में उन्होंने जजों के कामकाज का बंटवारा करने वाले रोस्टर को बनाने में अहम भूमिका निभाई. इस तरह वह अपनी परिपक्वता से न्यायपालिका पर आया एक बड़ा संकट टालने में सफल रहे.

वह अयोध्या मामले की सुनवाई करने वाली 5 जजों की बेंच के भी सदस्य हैं. उनके सुझाव पर ही मामला 3 सदस्यों के मध्यस्थता पैनल को भेजा गया था. सुनवाई के दौरान उन्होंने दोनों पक्षों से कई अहम सवाल किए.

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