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कैसे मोदी सरकार बनाएगी रेलवे को बेहतर, क्या निजीकरण से होगा बीमार रेलवे का इलाज?

सब्सिडी की वजह से रेलवे को भारी नुकसान हो रहा है और 2016-17 में 39 हज़ार करोड़ से ज्यादा का नुकसान रेलवे को हुआ. ऐसे में अगर रेलवे का निजीकरण होगा तो प्राइवेट कंपनियां सिर्फ ट्रेन चलाएंगी और ट्रेनों पर अधिकार सरकार का ही होगा. यात्रियों से मनमाना किराया भी नहीं वसूला जा सकेगा.

नई दिल्लीः भारतीय रेलवे के अच्छे दिन लाने की कोशिश में मोदी सरकार 2 ने एक और कदम बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है. कुछ चुनिंदा रूट्स पर यात्री ट्रेनों को चलाने की जिम्मेदारी प्राइवेट कंपनियों को दी जा सकती है, 100 दिनों के भीतर इसके लिए टेंडर भी मंगाए जा सकते हैं, मोदी सरकार की कोशिश है कि यात्रियों को और ज्यादा बेहतर सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें.

जब भी भारतीय रेल का ज़िक्र होता है तब ऐसी तस्वीर ज़ेहन में आती है जो खुश करने वाली तो कतई नहीं होती. सरकारें आईं और चली गयीं लेकिन रेलवे की हालत बहुत खराब से थोड़ा कम खराब भी नहीं कर पाईं. हालांकि मोदी सरकार आयी तो उसने रेलवे की बेहतरी के लिए काम करना शुरु किया, टिकटिंग सिस्टम को दुरुस्त करने की कोशिश की हालांकि अभी और ज्यादा सुधार की गुंजाइश है.

मोदी सरकार के दावों के मुताबिक नई ट्रेनें शुरू की गईं और पटरियों को ठीक किया गया. सफर के वक्त को घटाने के लिए सेमी हाईस्पीड ट्रेनों की शुरूआत की गई है और बुलेट ट्रेन पर अभी काम चल रहा है, उम्मीद है जल्दी ही अहमदाबाद से मुंबई के बीच बुलेट ट्रेन गोली की रफ्तार से भागती हुई दिखेगी. वहीं अब मोदी सरकार 2 ने खस्ताहाल रेलवे को ठीक करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाने का सोचा है, मोदी सरकार ने रेलवे में प्राइवेट कंपनियों को मौका देने की योजना बनाई है. प्रस्ताव के मुताबिक कुछ खास रूट पर निजी कंपनियों को ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी

रेल राज्य मंत्री सुरेश अंगड़ी ने कहा है कि इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए सरकार की ओर से 100 दिनों का वक्त दिया गया है. इसी एजेंडे पर काम करते हुए रेलवे ने एक प्रपोजल तैयार कर आईआरसीटीसी को तो भेजा ही है लेकिन उसके साथ एक टीम को जिम्मेदारी दी गई है कि इस प्रपोजल पर काम शुरू करें.

रेलवे के निजीकरण का जो प्रस्ताव आया है वो क्या है? अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक राजधानी, शताब्दी और दुरंतो जैसी प्रीमियम ट्रेनों के निजीकरण की शुरुआती योजना पर विचार हो रहा है. यात्रियों से जो किराया मिलेगा वो निजी कंपनी ही वसूलेगी लेकिन निजी कंपनी रेल चलाने के एवज में रेल मंत्रालय को पैसा दिया करेगी. 100 दिनों के भीतर रेलवे प्राइवेट कंपनियों की बोलियां मंगवा सकता है. कुछ ट्रेनों को प्राइवेट हाथों में देना एक अच्छा फैसला हो सकता है क्योंकि जिस तरह का फर्क हम सरकारी बैंकों और प्राइवेट बैंकों की सेवाओं में देखते हैं, हो सकता है आने वाले वक्त में यही फर्क रेलवे में भी देखने को मिले.

इससे रेलवे का फायदा होगा या नुकसान? टूरिज्म को देखते हुए जो अहम रूट हैं उनपर ट्रेन चलाने के लिए निजी क्षेत्र को मौक दिया जा सकता है और दो बड़े शहरों को जोड़ने वाले रूट पर भी फैसला हो सकता है. इससे पहले कई स्टेशनों पर मिलने वाली सुविधाओं को निजी हाथों में दिया जा चुका है.

रेलवे के लिए काम कर रहे लाखों लोगों पर इसका किस तरह का असर पड़ सकता है? इन सबके साथ ही रेलवे ट्रैक की देखरेख और ट्रेन के अंदर मिलने वाली सुविधाओं की जिम्मेदारी आईआरसीटीसी को मिल सकती है, इसके साथ ही रेलवे की तरफ से ये भी सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि निजी कंपनियां अपने हिसाब से मनमाना किराया तय ना कर पाए, रेलवे ने इसको लेकर भी है योजना तैयार की है. इसके मुताबिक रेलवे की तरफ से निजी कंपनियों को किराया तय करने की एक अधिकतम सीमा दे दी जाएगी निजी कंपनियां अधिकतम सीमा से ज्यादा किराया नहीं वसूल सकेंगे. आंशिक रूप से रेलवे के निजीकरण के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं मिलेंगी.

कुछ अहम सवाल लेकिन सवाल ये है कि कहीं ये रेलवे को पूरी तरह से निजीकरण करने की दिशा में उठाया गया कदम तो नहीं है और क्या रेलवे ट्रेड यूनियन इसके लिए तैयार हो जाएंगे? वहीं ट्रेड यूनियन पहले भी इसके विरोध में रहे हैं, क्या इस बार वो मान जाएंगे, नहीं माने तो सरकार के पास किस तरह के विकल्प हैं? तो इसका जवाब है कि हालांकि सरकार की ओर से पूरी तरह रेलवे के निजीकरण पर कहा गया है कि प्राइवेट कंपनियों की जिम्मेदारी ट्रेन चलाने की होगी न कि कंपनियों का उन पर अधिकार होगा, पीएम मोदी पहले भी साफ कर चुके हैं है कि रेलवे के निजीकरण का कोई सवाल ही नहीं है

कांग्रेस को भी ऐतराज़ नहीं ट्रेन चलाने के लिए प्राइवेट कंपनियों को देने में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को भी ऐतराज़ नहीं है, पूर्व रेल राज्य मंत्री रह चुके कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि फैसले का स्वरूप कैसा होगा ये देखने वाली बात होगी. कांग्रेस के सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि प्रपोजल तो सालों से चल रहा है लेकिन हमको यह देखना होगा कि अगर इस पर कोई फैसला लिया जाता है तो वह फैसला किस तरह से लिया जाता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि मुनाफा कमाने वाले रूट को ही निजी कंपनियों को दे दिया जाए. हमको निजीकरण से ऐतराज नहीं लेकिन किस तरीके से निजीकरण होगा यह देखना होगा

भारतीय रेलवे की कुछ खास बातें भारतीय रेलवे दुनिया की 7वीं सबसे बड़ी रोजगार देने वाली कंपनी है और रेलवे में करीब 13 लाख लोग काम करते हैं. देशभर में करीब 1 लाख 15 किलोमीटर रेलवे ट्रैक हैं, 12 हजार से भी ज्यादा ट्रेनों का रोजाना संचालन होता है और रोजाना औसतन 2 करोड़ 30 लाख यात्री सफर करते हैं.

बड़े सवाल सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर रेलवे की ओवरहॉलिंग की ज़रूरत क्यों है, क्यों प्राइवेट कंपनियों को इनके परिचालन में शामिल किया जा रहा है, इसे समझने के लिए उन बड़े देशों में रेलवे चलाने के फॉर्मूले को जानना होगा, जहां करीब-करीब पूरी तरह से रेलवे का निजीकरण हो चुका है. दुनिया के चार बड़े देशों अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और कनाडा में रेलवे का परिचालन निजी हाथों में है, और यहां पर इनका सफल परिचालन हो रहा है, यात्रियों को यहां सुविधाएं भी विश्वस्तरीय मिलती हैं.

दूसरे कई देशों में रेलवे निजी हाथों में है और वहां पर इसे चलाने का फॉर्मूला क्या है आपको बता दें कि 2016-17 में रेलवे को यात्री गाड़ियों में करीब 39 हज़ार 607 करोड़ का नुकसान हुआ है, और इसकी वजह है वो सब्सिडी जो टिकट पर दी जाती है. यानी एक यात्री को उसकी मंज़िल तक पहुंचाने में सरकार का जितना खर्च होता है उससे बहुत कम पैसे टिकट के रूप में लिए जाते हैं, हमारे यहां ट्रेन के किराए में पांच दस रुपये का इज़ाफा हो जाए तो हल्ला मच जाता है, आपको दिखाते हैं दुनिया के कुछ बड़े देशों में रेल से सफर करने में कितना खर्च करना पड़ता है लेकिन तुलना करने से पहले भारत में औसत ट्रेन किराया कितना है आपको बता देते हैं

कुछ उदाहरण दिल्ली से बरेली की दूरी करीब 258 किमी है, अगर एसी टू टियर में आप टिकट लेते हैं तो इसकी कीमत करीब 700 रुपये है और इतनी ही दूरी ब्रिटेन में लंदन और मैनचेस्टर के बीच है, यहां पर औसत टिकट करीब 8746 रुपये का है. वहीं जापान की राजधानी टोक्यो से नागोया तक की इतनी दूरी के लिए ट्रेन का टिकट करीब 9487 रुपये का है. हालांकि सीधा इन किरायों के आधार पर बात नहीं की जा सकती क्योंकि भारतीय रेलवे और विदेश में चल रही ट्रेनों के संचालन का ढांचा अलग-अलग है.

फिर भी इतना तो साफ है अगर सुविधाएं चाहिए तो उसके लिए पैसे खर्च करने के लिए भी तैयार रहना होगा, लेकिन ये सिर्फ पैसे खर्च करके भी ठीक नहीं किया जा सकता क्योंकि सरकारी ढर्रे को भी तोड़ना होगा और ये तभी मुमकिन होगा जब सरकारी रेल और प्राइवेट रेल में प्रतियोगी भावना आएगी. रेलवे के सूत्रों से सामने आई जानकारी के मुताबिक सिर्फ यात्री गाड़ियां ही नहीं बल्कि आने वाले दिनों में माल गाड़ियों में भी इस तरह से निजी कंपनियों को जोड़ने पर विचार किया जा रहा है.

इसी के साथ रेलवे यात्रियों से टिकट की कीमत पर मिलने वाली सब्सिडी को छोड़ने का अभियान भी शुरू करने की योजना पर विचार कर रहा है. यह अभियान कुछ उसी तरह का होगा जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गैस सिलेंडर पर सब्सिडी छोड़ने का बयान चलाया था और जिसकी वजह से सरकार को हर साल करोड़ों रुपए की बचत हुई थी.

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