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यूनेस्को से सम्मानित है उत्तराखंड की रामलीला, जानें देश के बाकी हिस्सों में कैसे मनाते हैं विजयदशमी

विविधता में एकता वाले इस देश में दशहरा मनाने के पीछे अपनी-अपनी मान्यताएं हैं. इस पर्व को मनाने की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध मान्यता मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम से जुड़ी है.

नई दिल्ली: भारत एक ऐसा देश है जहां सालभर कोई-न-कोई त्योहार मनाया जाता है. इसीलिए इसे 'त्योहारों का देश' कहा जाता है. वैसे तो यहां हर त्योहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है लेकिन 'दशहरा' और 'दुर्गा पूजा' को विशेष महत्व दिया जाता है. हिंदू धर्म में इसे केवल एक त्योहार नहीं माना जाता है बल्कि इससे समाज को एक संदेश देने की कोशिश की जाती है. इसके जरिए बताया जाता है कि बुराई कितनी भी बड़ी और ताकतवर क्यों न हो जाए, वो अच्छाई के सामने नहीं टिक पाती. आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला दशहरा 19 अक्टूबर को पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जा रहा है.

अलग-अलग मान्यताएं

विविधता में एकता वाले इस देश में दशहरा मनाने के पीछे अपनी-अपनी मान्यताएं हैं. इस पर्व को मनाने की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध मान्यता मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम से जुड़ी है. माना जाता है कि भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था. रावण ने भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण कर लिया था. सीता को छुड़ाने के लिए राम लंका गए थे. वहीं, राम ने रावण का वध करने से पहले आदि शक्ति मां दुर्गा की नौ दिनों तक पूजा की थी और दसवें दिन रावण का वध किया था. इसीलिए दशहरा से पहले नवरात्रि में नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है और दसवें दिन रावण दहन किया जाता है.

इसके अलावा ये भी मान्यता है कि दशमी के दिन ही मां दुर्गा ने 'महिषासुर' नाम के राक्षस का वध किया था. कुछ जगहों पर दशहरा को मां दंतेश्वरी की आराधना के रूप में मनाया जाता है. कुछ लोग दशहरा अपने कुलदेवी और कुलदेवताओं की पूजा के रूप में भी मनाते हैं. ये भी माना जाता है कि विजयदशमी के दिन ही महाभारत के पांडवों का अज्ञातवास खत्म हुआ था. लेकिन, हर जगह इस त्योहार को असत्य पर सत्य की जीत के रूप में ही मनाया जाता है.

अलग-अलग नामों और रिवाजों से मनाते हैं दशहरा

केवल मान्यताएं ही नहीं बल्कि दशहरा को देशभर में अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है और इसे मनाने के रिवाज भी अलग-अलग होते हैं.

उत्तर भारत

उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में दशहरा को ‘विजयदशमी’ के नाम से भी जाना जाता है. विजयदशमी से दस दिन पहले रामलीला का आयोजन किया जाता है, जिसमें रामायण के अलग-अलग दृश्यों का मंचन किया जाता है. दसवें दिन रावण, उसके भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद का पुतला दहन किया जाता है. कहीं-कहीं पर केवल रावण दहन ही किया जाता है.

यूनेस्को से सम्मानित है उत्तराखंड की रामलीला, जानें देश के बाकी हिस्सों में कैसे मनाते हैं विजयदशमी

हिमाचल प्रदेश में दशहरा को ‘कुल्लु दशहरा’ के नाम से जाना जाता है. कुल्लु दशहरा दुनिया भर में मशहूर है और इसे मेगा फेस्टिवल के तौर पर मनाया जाता है. अक्टूबर महीने में कुल्लु घाटी के धोलपुर मैदान में मनाए जाने वाले इस फेस्टिवल को देखने के लिए हर साल चार से पांच लाख लोग आते हैं. हिमाचल के लोग इस दशहरे को भगवान राम के लिए नहीं मनाते हैं, बल्कि इस दिन वो अपने पहाड़ी देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. लोग सज-धज कर भगवान की पालकी निकालते हैं और अपने कुल देवता रघुनाथ जी की पूजा करते हैं.

उत्तराखंड के कुमाऊं में रामलीला का मंचन, कथा गाते हुए किया जाता है. कुमाऊं में रामलीला को पेश करने का ये तरीका प्रख्यात नर्तक उदय शंकर ने दिया था और इसे उनके बाद मोहन उप्रेती और बिजेंद्र लाल शाह ने और भी ज्यादा प्रसिद्धि दिलाई. इस रामलीला को ‘अल्मोड़ा’ और ‘कुमाऊं शैली’ की रामलीला के नाम से भी जाना जाता है. रामलीला की इस शैली को साल 2008 में यूनेस्को ने काफी सराहा था और इस कला को विशेष दर्जा भी दिया था.

वाराणसी का रावण दहन भी दुनिया भर में मशहूर है. यहां हर साल हजारों लोग रामलीला देखने के लिए आते हैं. वाराणसी की रामलीला पूरी दुनिया में सबसे पुरानी मानी जाती है. करीब 200 साल पहले इसे काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने भव्य तरीके से करना शुरू किया था. तब से लेकर आज तक ये चला आ रहा है.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दशहरा मनाने का तरीका एकदम अलग है. यहां भी भगवान राम के लिए दशहरा नहीं मनाया जाता है. यहां के लोग दशहरा को मां दंतेश्वरी की आराधना करने के लिए मनाते हैं. मां दंतेश्वरी, मां दुर्गा का ही एक रूप हैं और यहां के लोगों की कुलदेवी हैं. यहां ये पर्व 75 दिनों तक मनाया जाता है.

दिल्ली में भी दशहरा बड़े धूम-धाम से मनाते हैं, यहां पुरानी दिल्ली के रामलीला मैदान में रामलीला का आयोजन किया जाता है. यहां की रामलीला की खास बात है कि इसमें बड़े-बड़े कलाकार हिस्सा लेते हैं. माना जाता है कि यहां रामलीला की शुरूआत करीब 170 साल पहले मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने किया था.

हरियाणा के अंबाला में विजयदशमी के दिन रावण दहन किया जाता है. यहां के रावण के पुतले की ऊंचाई सबसे ज्यादा होती है. यहां का रावण पांच बार लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है.

पश्चिमी भारत

पश्चिमी भारत में भी दशहरा और दुर्गा पूजा को लेकर काफी उत्साह रहता है. यहां भी ज्यादातर लोग इसे ‘दशहरा’ या ‘विजयदशमी’ ही बोलते हैं.

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गुजरात के अहमदाबाद में नवरात्रि बहुत धूम-धाम से मनाते हैं और यहां की नवरात्रि पूरी दुनिया में जानी जाती है. यहां नवरात्रि के नौ दिन ‘गरबा’ और ‘डांडिया’ खेला जाता है, जिसमें पुरुष, महिला, बच्चे सभी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं.

भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित राजस्थान के कोटा में भी दशहरा धूम-धाम से मनाते हैं. यहां रामलीला 25 दिनों तक चलती है. माना जाता है कि यहां रामलीला की शुरूआत कोटा के महाराजा दुर्जनसाल सिंह ने कराई थी. यहां दशहरे में काफी आतिशबाजियां भी होती हैं.

महाराष्ट्र में दशहरा के दिन रावण दहन तो होता ही है, इसके अलावा यहां कुछ जगहों पर इस दिन मां सरस्वती की भी पूजा की जाती है. विजयदशमी का दिन यहां बहुत ही शुभ माना जाता है.

पूर्वी भारत

पूर्वी भारत के ज्यादातर राज्यों में दशहरा को मां दुर्गा की आराधना करने के लिए मनाया जाता है.

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पश्चिम बंगाल में नवरात्रि के षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी का दिन काफी महत्व रखता है. यहां मां दुर्गा के रूप मां काली की विशेष पूजा की जाती है. दसवें दिन यहां दशहरा, सिंदूर की होली खेल मनाया जाता है. औरतें इस दिन देवी को सिंदूर समर्पित करती हैं और एक-दूसरे को लगा होली खेलती हैं. इसे यहां ‘सिंदूर खेला’ के नाम से भी जाना जाता है.

ओडिशा के कटक में दुर्गा पूजा का एक अलग ही माहौल होता है. पश्चिम बंगाल के कोलकाता की तरह यहां भी सेलिब्रेशन होता है लेकिन यहां काफी पैसे खर्च किए जाते हैं. पूरा शहर ऐसा लगता है मानो इस पर सोने-चांदी की चादर चढ़ी हो.

दक्षिण भारत

दक्षिण भारत हमेशा से ही त्योहार मनाने में देश के बाकी हिस्सों से ज्यादा अनूठा रहा है. यहां के लोग काफी धार्मिक माने जाते हैं. इसी वजह से यहां दशहरा और दुर्गा पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है. यहां इसे 'आयुध पूजा' के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें घर या दुकान के औजारों की पूजा की जाती है.

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कर्नाटक के मैसूर में दशहरा सबसे अलग और शानदार तरीके से मनाया जाता है. दस दिनों तक मनाए जाने वाले इस त्यौहार में हर दिन एक अलग रंग देखने को मिलता है. यहां ऐसी मान्यता है कि मैसूर का नाम भी महिषासुर के नाम पर रखा गया है. मां चामुंडेश्वरी देवी ने महिषासुर का वध किया था, इसीलिए यहां इनकी विशेष तौर पर पूजा की जाती है. इस दिन यहां सड़कों पर झांकी निकाली जाती है जिसमें हाथी रहते हैं. हाथी के ऊपर सोने से बने एक हौदे में मां चामुंडेश्वरी की सोने की मूर्ति रखी जाती है. सबसे पहले इस मूर्ति की पूजा मैसूर का शाही जोड़ा करता है जिसके बाद एक भव्य जुलूस निकाला जाता है. इस जुलूस में हाथी के अलावा ऊंट और घोड़े भी होते हैं. जुलूस के दौरान कलाबाजियां भी की जाती हैं. यहां दशहरे पर रावण दहन की कोई प्रथा नहीं होती है.

कर्नाटक के कूर्ग में ही दशहरा को ‘मडिकेरी दशहरा’ के रूप में मनाया जाता है. देश में ‘मैसूर दशहरा’ के बाद इसका नाम ही आता है.  इसे दस दिनों तक मनाया जाता है. इसकी तैयारी तीन महीने पहले से शुरु हो जाती है. इस त्योहार में देवी मरिअम्मा की पूजा की जाती है. इसे 'मरिअम्मा त्योहार' के नाम से भी जाना जाता है.

नवरात्रि में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कुछ जगहों पर मां गौरी, जिन्हें वहां ‘बतुकम्मा’ कहते हैं, की पूजा की जाती है. ये त्योहार यहां 7 दिनों तक मनाया जाता है.

देश से बाहर भी दशहरा मनाते हैं लोग

दशहरा केवल भारत में ही नहीं मनाया जाता. देश से बाहर भी लोग इसे धूम-धाम से मनाते हैं. नेपाल में दशहरा को 'दसायन' कहा जाता है. इसके आठवें दिन यहां लोग मां दुर्गा को जानवरों की बलि भी चढ़ाते हैं. दसवें दिन घर के बड़े, छोटों के माथों पर टीका लगाते हैं. बांग्लादेश में भी दशहरा मनाया जाता है. यहां दशहरा मनाने का तरीका पश्चिम बंगाल जैसा ही होता है. लोग अपनी समृद्धि के लिए मां दुर्गा की पूजा करते हैं. इंडोनेशिया, मॉरीशस, मलेशिया, श्रीलंका, चीन और थाइलैंड में भी दशहरा और दुर्गा पूजा मनाया जाता है. दशहरा मनाने की मान्यताएं और रिवाज भले ही अलग-अलग हों लेकिन इन सबसे एक ही संदेश मिलता है- अच्छाई से बुराई कभी जीत नहीं सकती है. विजयदशमी में कहीं-कहीं पर रावण दहन में रावण के दस सिर बनाए जाते हैं. रावण के ये दस सिर दस पाप माने जाते हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा, आलस्य, झूठ, अहंकार, मद और चोरी. इन सभी पापों से हम किसी-न-किसी तरह से छुटकारा पाना चाहते हैं और हमारी कोशिश भी यही होनी चाहिए. इसी उम्मीद में हर साल रावण दहन किया जाता है ताकि हमारी सारी बुराइयां भी इसी पुतले के साथ स्वाहा हो जाए.

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