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मलेशिया की कुल आबादी से अधिक लोग भारत में सड़कों पर रहने को मजबूर

एनजीओ सेंटर ऑफ होलिस्टिक डिपार्टमेंट के कार्यकारी निर्देशक सुनील कुमार अलेडिया के मुताबिक इस बार सर्दी के मौसम में 1 दिसम्बर से 14 दिसम्बर के बीच लगभग 108 बेघर लोगों की मौत हो चुकी है.

नई दिल्ली: देशभर में कड़ाके की ठंड ने दस्तक दे दी है. तापमान के गिरने से देश के अलग-अलग इलाकों में ठंड बढ़ने लगा है. ऐसे में लोग सर्दी से बचने के लिए अलाव जलाना शुरू कर दिया है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि देश में कई ऐसे लोग हैं जो कंपकपाती ठंड में भी खुले आसमान के नीचे, सड़क किनारे सोने के लिए मजबूर हैं. भारत में ऐसे लोगों की संख्या मलेशिया की कुल आबादी से भी ज्यादा है. अगर भारत के बेघर लोगों को एक साथ रखा जाए तो इनकी आबादी 83 देशों की जनसंख्या से भी ज्यादा होगी.

पहले नंबर है कानुपर

मार्च 2017 में छपी हिंदुस्तान टाइम्स की एक खबर के मुताबिक देश में सबसे ज्यादा बेघर लोगों की संख्या यूपी के कानपुर शहर में है. यहां एक हजार की आबादी में 18 लोग बेघर हैं. कानपुर शहर यूपी का व्यवसायिक केंद्र माना जाता है. खासकर चमड़ा उद्योग को लेकर शहर की एक अलग पहचान है. लेकिन इसके साथ ही ये भी सच्चाई है कि यहां बेघर लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है. ये आंकड़े साल 2011 की जनगणना के आधार पर हैं.

कानपुर के बाद कोलकाता का नंबर आता है. बेघर लोगों की आबादी के हिसाब से कानपुर दूसरे नंबर पर है. यहां एक हजार की आबदी पर 15 लोग बेघर हैं. चौथे नंबर पर मुंबई का नाम आता है. यहां एक हजार की आबादी पर 12 लोग बेघर हैं.

तीसरे नंबर पर है दिल्ली

बेघर लोगों की आबादी के मामले में देश की राजधानी दिल्ली का भी नाम है. दिल्ली के तीन इलाके तीसरे, पांचवें और छठे नंबर पर आते हैं. तीसरे नंबर पर सेंट्रल दिल्ली है. पांचवे नंबर नई दिल्ली और छठे नंबर पर उत्तरी दिल्ली का नाम आता है. ध्यान देने वाली बात ये है कि राजधानी में जो लोग बेघऱ हैं वे दिल्ली के रहने वाले नहीं हैं.

दिल्ली में रैनबसेरे

दिल्ली सरकार के दिल्ली नगरीय आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) ने 15 दिसम्बर 2017 को 'विंटर एक्शन प्लान' की घोषणा करते समय कहा था कि दिल्ली में इस समय 251 रैन बसेरे हैं. इनमें 83 रैन बसेरे इमारतों में बने हैं, 113 रैन बसेरे अस्थाई केबिन में संचालित हैं, जबकि 55 अस्थाई रैन बसेरे टेंट में बनाए गए हैं. हालांकि, बोर्ड यह दावा करता है कि रैन बसेरों में लगभग 20000 लोग रह सकते हैं और मात्र 10000 लोग इस समय उनका उपयोग कर रहे हैं. दिल्ली सरकार ने यह भी घोषणा की कि जनवरी खत्म होने से पहले रैन बसेरों में रह रहे लोगों को नाश्ते में चाय और रस्क दिया जाने लगेगा.

दिल्ली में कितने लोग हैं बेघर?

बोर्ड ने कहा कि बेघरों को रैन बसेरों में लाने के लिए 20 दल सक्रिय हैं और वे प्रतिदिन रात में गश्त करते हैं. बेघर लोगों की सूचना देने के लिए कोई भी नागरिक दिन के 24 घंटे हमारे कंट्रोल रूम में (011-23378789/8527898295/96) पर फोन कर सकता है. रैनसेरा मोबाइल एप पर भी सूचना दे सकता है. लेकिन, सरकार के प्रयासों के बाबजूद हजारों लोग अभी भी दिल्ली की सड़कों पर रहने को मजबूर हैं. बोर्ड के 2014 में कराए एक सर्वे के अनुसार दिल्ली में 16000 बेघर लोग हैं जबकि विभिन्न गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के अनुमान के मुताबिक यह संख्या एक लाख तक या उससे भी ज्यादा हो सकती है.

एनजीओ सेंटर ऑफ होलिस्टिक डिपार्टमेंट के कार्यकारी निर्देशक सुनील कुमार अलेडिया ने कहा कि राष्ट्रीय शहरी जीवन अधिकार मिशन के मानकों के अनुसार रैन बसेरों में प्रति व्यक्ति कम से कम 50 वर्गफीट की जगह मिलनी चाहिए लेकिन दिल्ली में जगह की कमी के चलते लोगों को मात्रा 10 से 12 वर्गफीट जगह ही मिल पाती है. इसलिये ज्यादातर लोग क्षमता से अधिक भरे रैन बसेरों में नहीं रहना चाहते हैं.

अलेडिया के अनुसार इस बार सर्दी के मौसम में 1 दिसम्बर से 14 दिसम्बर के बीच लगभग 108 बेघर लोगों की मौत हो चुकी है. उनके अनुसार 2016, 2015 और 2014 के दिसम्बर महीने में क्रमश: 235, 251 और 279 लोगों की मौत हुई थी.

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