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विशेष: सूटकेस पर लद कर जाने को मजबूर मज़दूर के बच्चे की लाचारी दिखाती तस्वीरें देखिये

एक वीडियो को लेकर खूब चर्चा हो रही है. इस वीडियो में एक महिला अपने बच्चे को सूटकेस पर सुलाकर पैदल सफर कर रही हैं. महिला महोबा जा रही हैं

नई दिल्ली: आत्मनिर्भर बनने चले हिंदुस्तान की अतंहीन तस्वीरें हैं ये, हिंदुस्तान के मस्तक से गुजरती तकलीफ और वेदना की लकीरें हैं ये, गुरबत की माटी में उग चुकी भूख-प्यास की अटूट जंजीरें हैं ये, मगर इस स्थिति मे भी बताइए भला इनसे भी ज्यादा कोई आत्मनिर्भर है क्या? ना किसी ने मदद की, ना किसी साथ दिया खुद से चले हैं, खुद की सांसों के लिए, भूख से तड़पती बच्चों की मासूम और लाचार आंखें समूचे सिस्टम और सरकारी तंत्र को घूर कर कहती हैं, वीरान सा मजंर हूं, तेरे वादे और दावे सा जर्जर हूं. देख मेरी ओर, मैं भी तो आत्मनिर्भर हूं क्योंकि और जिन सड़कों को गुमान था अपनी लंबाई पर, उनको मेरे इन आत्मनिर्भर कदमों ने दो वक्त की रोटी के लिए नाप कर रख दिया है.

कहते हैं ना कि मां से बड़ा योद्धा कोई नहीं होता, नहीं तो इससे बड़ा आत्मनिर्भर भी कोई है नहीं, ये मां पंजाब से चली है, बच्चे को अटैची के बोझे पर लादे आगरा पार कर रही हैं, सरकारी सिस्टम की धूल फांकते हुए बड़ी आत्मनिर्भरता से आगे बढ़ रही है, जिंदगी से लड़ रही है. इस मां को झांसी तक जाना है, हालात को हराना है और मासूम बच्चे को भी बचाना है तो जिस अटैची को खरीदा साजो सामान के लिए, उसका बखूबी इस्तेमाल हो रहा है बच्चे की जान के लिए.

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यह मजदूर महिलायें बच्चों को साथ लिये दिल्ली से महोबा के लिये पैदल ही निकल पड़ीं. रास्ते में जब बच्चा थक गया तो उसे अपने सामान की ट्रॉली पर महिला ने सुला दिया और ट्रॉली खींचने लगी. जब इनसे पूछा गया कि सरकार बसें चला रही है, उससे चले जाइये तो महिला ने उल्टा सवाल किया, कहां हैं बसें? . . . . . abplive.com . . . . . #COVID19 #migrantworkers #migrantsontheroad #Lockdown #instavideo

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बच्चा अटैची पर आधा शरीर रख कर सो गया, मां चल पड़ी लेकिन इस एक अकेली तस्वीर ने तमाम धड़कती धड़कनों को एक वक्त के लिए थाम सा दिया, क्योंकि इसने समूची जीवंत संवेदना को झकझोर कर रख दिया था. ये ना सिर्फ कहती हैं, बल्कि धिक्कारती भी हैं, धिक्कारती हैं सरकारी योजनाओं को, धिक्कारती है विकास की परियोजनाओं को, नीतियों को, नियंताओं को कि तुमने में हमें सड़कों पर ला पटका है, कहीं का नहीं छोड़ा है.

जिन प्लास्टिक की गाड़ियों को खिलौना जानते हैं, वही इनके बच्चों के लिए जिंदगी की गाड़ियां बन गई हैं, अब तक शहरों में काम था तो मां रोटी लाती थी पत्थर तोड़तर, बच्चे खाते और सो जाते जमीन बिछाकर आसमान ओढ़ कर. लेकिन कोरोना ने उनकी रोटियों तक कर्फ्यू लगा दिया तो गांव की ओर चलना पड़ा और जब आधे रास्ते पहुंचे तक सरकार ने ऐलान किया-ठहरो जरा, सुनो तो अब सरकार कहती है गांवों में रोजगार देंगे, तीन वक्त खाने को भी देंगे लेकिन ये चेहरे कहते हैं, पहले गांव तो पहुंच जाएं क्योंकि निकलता हर कोई है मगर पहुंचता हर कोई नहीं है. कोई एमपी के गुना में सड़क चलते हुए मारा जाता है तो कभी यूपी के मुज्जफरनगर में कुचला जाता है, कहीं 6 मरतें हैं, कहीं 8 मारे जाते हैं, शहरों में रहें तो भूख से मारे जाएं, सड़क चलें हैं तब भी मरते हैं, ट्रैक पर चलते हैं तब मरते हैं, वो मजदूर हैं और सच कहें तो उनकी जान की कोई कीमत इस मुल्क में है नहीं.

इस भीषण पलायन के दौर में देश में अब तक 89 मजदूर चलते-चलते रोड और ट्रेन एक्सीडेंट में मारे जा चुके हैं, भुखमरी की वजह से 58 मजूदरों की मौत हुई, चलते-चलते हुई थकान से 29 मजदूर जान से हाथ धो बैठे, चिकित्सा के अभाव में 40 मजदूरों की जान गई, 91 प्रवासी मजदूरों ने अकेलेपन में डर से आत्महत्या कर ली. तो फिर ऐसे में सरकार ने क्यों नहीं पहले ही सोच लिया कि भूखे लोगों को रोटी नहीं मिलेगी हाल यही होगा और वो लाखों की तनख्वाह उठाने वाले अधिकारी कहां हैं जो सरकारी नीतियां बनाते थे, कहां थी उनकी दुहाई, कहां थी उनकी पढ़ाई लिखाई, जिन्होंने इस दिशा में सोचा ही नहीं, सरकार को समझाया ही नहीं.

स्थिति ये है कि आज इंसान भेड़-बकरियों से बदतर स्थिति में पहुंच गया और इसके लिए जितनी जिम्मेदार सरकार है, उतना ही दोषी है पढ़ा-लिखा शहरी समाज, क्योंकि पिछले कई दिनों और हफ्तों से पैदल ही चलते जा रहे ये वो लोग हैं, जो शहरों के बंगलों- बिल्डिंगों के लिजलिजे तहखानों में जानवरों की तरह पड़े थे, हमारे आस-पास ही रहते थे, कभी दिखते थे, कभी हम देखना नहीं चाहते थे और इस कोरोना काल में शहरों ने दुत्कार दिया, अमीरों ने पैसे देने से इनकार किया तो फिर अब ये दाल-भात की तलाश में सड़कों पर सरफरोशी तमन्ना पाले निकल पड़े तो हर किसी को बखूबी नजर आने लगे, वो भी सैकड़ों-हजारों की संख्या में और इस संख्या के आगे सरकारें और सुविधाएं दोनों बेबस हो गईं.

मुश्किल हालत में भी चेहरे मुस्कुराते हैं, लेकिन सवाल भी उठाते हैं कि आखिर कब, आखिर कब तक ये तस्वीरें देश को देखने को मिलती रहेंगी, कब तक लोग पैदल और ट्रकों में भरे चलते रहेंगे, सिस्टम कब सुधरेगा, सरकारें कब सोचेंगी और सच भी यही है कि सरकार सिस्टम से पार पाना हर किसी के बस की बात है नहीं, ट्रेन-बस भी सिर्फ जुगाड़ वालों को मिल पाती हैं, बाकी बेजार ही चले जाते हैं मगर साथ में आइना भी दिखाते हैं कि देश की सड़कों पर खींची जा चुकी मुफलिसी की तमाम लकीरें ये बताती हैं कि आपके खूबसूरत और चमकते-धमकते शहरों के अंदर कितना अंधेरा है और शायद इसीलिए ये लोग जिनका शरीर भी ठीक से साथ नहीं दे रहा, इनको अब अपने गांव की झोपड़ी के अंधकार में ही जिदंगी का आफताब नजर आने लगा है.

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