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जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे पर SC में सुनवाई टली, संविधान के अनुच्छेद 35ए को रद्द करने की है मांग

जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को चुनौती देने वाले याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टल गई है. अब 16 अगस्त को मामले पर सुनवाई होगी.

नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को चुनौती देने वाले याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टल गई है. आज केंद्र सरकार ने राज्य में शांति बहाली के लिए चल रही प्रक्रिया का हवाला दिया और सुनवाई टालने की दरख्वास्त की. अब 16 अगस्त को मामले पर सुनवाई होगी.

क्या है मामला

कोर्ट में लंबित याचिकाओं में संविधान के अनुच्छेद 35ए को रद्द करने की मांग की गई है. इसके चलते जम्मू-कश्मीर में बाहर से आकर बसे लोगों को सरकारी नौकरी, शिक्षा और सुविधाओं से वंचित रखा जाता है. साथ ही, राज्य से बाहर के व्यक्ति से शादी करने वाली लड़की भी कई ज़रूरी अधिकार गंवा देती है.

पहले भी टल चुकी है सुनवाई

दरअसल, इस मामले की सुनवाई पिछले साल ही होनी थी. लेकिन तभी केंद्र ने पूर्व आईबी निदेशक दिनेश्वर शर्मा को कश्मीर विवाद में अपना मध्यस्थ नियुक्त कर दिया. 30 अक्टूबर को सरकार ने कोर्ट से सुनवाई टालने के आग्रह किया. सरकार की तरफ से एटॉर्नी जनरल ने कहा कि इस सुनवाई से शांति बहाली की प्रक्रिया में अड़चन पड़ सकती है. कोर्ट ने सरकार के अनुरोध को मानते हुए सुनवाई 3 महीने के लिए टालने के आदेश दिया. उसके बाद से आज ये मामला कोर्ट में लगा.

आज क्या हुआ

आज एक बार फिर एटॉर्नी जनरल ने मध्यस्थता की प्रक्रिया का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि मध्यस्थ का काम आखिरी दौर में है. इसे पूरा करने में कुछ वक्त और लगेगा. इसलिए सुनवाई टाल दी जाए.

याचिकाकर्ताओं ने सुनवाई टालने का विरोध किया. उन्होंने कहा कि सुनवाई टालने का मतलब है कि इस साल भी बच्चे राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला नहीं ले पाएंगे. ऐसे तमाम बच्चें हैं, जो NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षा पास कर लेते हैं. फिर भी उन्हें राज्य के मेडिकल कॉलेज दाखिला नहीं देते. कोर्ट बच्चों के दाखिले में भेदभाव न करने का आदेश दे. लेकिन कोर्ट ने कोई अंतरिम आदेश देने से मना कर दिया.

संविधान पीठ के गठन की मांग

याचिकाकर्ताओं ने मामला संविधान पीठ को भी भेजने की मांग की. उन्होंने कहा कि कोर्ट सभी याचिकाओं पर औपचारिक नोटिस जारी करे और मामला 5 जजों की संविधान पीठ को सौंप दे. लेकिन कोर्ट ने इस पर भी कोई आदेश नहीं दिया.

राष्ट्रपति के आदेश से जोड़ा गया अनुच्छेद

अनुच्छेद 35ए को मई 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के ज़रिए संविधान में जोड़ा गया. ये अनुच्छेद जम्मू कश्मीर विधान सभा को अधिकार देता है कि वो राज्य के स्थायी नागरिक की परिभाषा तय कर सके. इन्हीं नागरिकों को राज्य में संपत्ति रखने, सरकारी नौकरी पाने या विधानसभा चुनाव में वोट देने का हक मिलता है.

याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि संसद में प्रस्ताव ला कर पास करवाए बिना संविधान में नया अनुच्छेद कैसे जोड़ दिया गया. कोर्ट से मांग की गई है कि वो इस आधार पर इस अनुच्छेद को तुरंत निरस्त कर दे.

कुल 4 याचिकाएं लंबित

35ए को निरस्त करने की मांग करने वाली 4 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं. इनमें से 2 याचिकाएं वी द सिटीजन, और वेस्ट पाकिस्तान रिफ्यूजी एक्शन कमेटी नाम की संस्थाओं ने दाखिल की हैं. इनमें राज्य में बाहर से आकर बसे लोगों के अधिकार का मसला उठाया गया है.

2 और याचिकाएं चारु वली खन्ना और सीमा राज़दान भार्गव नाम की महिलाओं की है. इन्होंने गैर कश्मीरी से शादी करने के चलते होने वाले भेदभाव का मसला उठाया है. उन्होंने इस भेदभाव को संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का हनन बताया है. उनका कहना है कि गैर कश्मीरी से शादी करने वाले कश्मीरी पुरुष के बच्चों को स्थायी नागरिक का दर्जा और तमाम अधिकार मिलते हैं. लेकिन राज्य के बाहर शादी करने वाली महिलाओं पर पाबंदी लगाई गई है.

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