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Morbi Bridge Collapse: 2008 से मोरबी पुल का रखरखाव कर रही थी ओरेवा कंपनी, कांट्रेक्ट में दे दिया गया था पूरा चार्ज

Morbi Tragedy: ओरेवा कंपनी 2008 से मोरबी पुल के रखरखाव का काम देख रही थी. इस साल 7 मार्च को नए करार पर हस्ताक्षर करने बाद कंपनी ने पुल की मरम्मत का काम शुरू किया था.

Morbi Bridge Collapse News: गुजरात के मोरबी (Morbi) में रविवार (30 अक्टूबर) को हुए केबल पुल हादसे को लेकर पुलिस ने ओरेवा कंपनी (Oreva Company) के दो प्रबंधकों को हिरासत में लिया है. यह कंपनी पुल के प्रबंधन और रखरखाव का काम देख रही थी. इसके लिए मोरबी नगर पालिका (Morbi Municipality) ने कंपनी के साथ करार (MoU) किया था. जानकारी के मुताबिक 2008 से ओरेवा कंपनी मोरबी के इस पुल की देखरेख कर रही थी. 

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, मोरबी नगर पालिका ने ओरेवा ग्रुप की ही एक प्रमुख कंपनी अजंता मैन्युफैक्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड के साथ 15 वर्षों की अवधि के लिए एक ताजा करार किया था, जिसमें केबल पुल का  संचालन, रखरखाव, सुरक्षा, साफ-सफाई और टिकट बिक्री समेत पुल के प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी दी गई थी. यहां तक कि कर्मचारियों की तैनाती भी कंपनी के जिम्मे थी.

नए करार में कही गईं ये बातें

करार में कहा गया है कि केवल 2027-28 के बाद दो रुपये की दर से हर साल टिकट दरों में वृद्धि की अनुमति दी जाएगी. वर्तमान में वयस्क टिकट का मूल्य 15 रुपये हैं. इस साल 7 मार्च को समझौते पर हस्ताक्षर करने बाद 765 फुट लंबे इस पुल की मरम्मत का काम ओरेवा कंपनी ने शुरू किया था. इस दौरान कई महीनों के लिए पुल जनता के लिए बंद कर दिया गया था.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पुल के संचालन को लेकर केवल टिकट की कीमत का मामला मोरबी जिला कलेक्टर और नगरपालिक के बीच चर्चा का विषय था. समझौते में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि एक बार में कितने लोग पुल पर जमा हो सकते थे. समझौते की अवधि के दैरान ओरेवा को व्यावसायिक गतिविधियां चलाने और ब्रांडिंग करने की अनुमति दी गई थी. 

फिटनेस सर्टिफिकेट के बिना पुल खोलने पर कार्रवाई क्यों नहीं?

मोरबी नगर पालिका के मुख्य अधिकारी संदीप सिंह जाला के मुताबिक, पुल को फिटनेस प्रमाणपत्र नहीं दिया गया था क्योंकि इसका सुरक्षा ऑडिट होना बाकी था. उन्होंने बताया कि ओरेवा ग्रुप ने नगर पालिका को सूचना नहीं दी कि वह 26 अक्टूबर को पुल को फिर से खोल रहा है.

फिटनेस प्रमाणपत्र के बगैर पुल खोले जाने पर नगरपालिका ने कंपनी को कारण बताओ नोटिस या जनता के प्रवेश पर प्रतिबंध संबंधी आदेश क्यों नहीं दिया, यह पूछे जाने पर जाला ने कहा, "हमारे पास समय नहीं था. अभी दो दिन पहले की बात है. हमारे पास ऐसी कार्रवाई करने का कोई मौका नहीं था." बीजेपी शासित नगर पालिका की अध्यक्ष कुसुम परमार ने बताया, "हमने पुल को पूरी तरह से ओरेवा को सौंप दिया था और इसलिए आगंतुकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी थी. उन्होंने पुल की देखरेख करने और इसे संचालित करने के समझौते के लिए हमसे संपर्क किया था."

तय अवधि से पहले खोला गया पुल?

समझौते के मुताबिक, पुल के प्रबंधन के लिए आय-व्यय ओरेवा की ओर से वहन किया जाएगा और इसमें सरकारी, गैर-सरकारी, नगर पालिका, निगम या किसी अन्य एजेंसी का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा. मोरबी आधारित ओरेवा कंपनी की स्थापना जयसुख पटेल ने की थी, जो कि संस्थापक ओधवजी पटेल के चार बेटों में से एक हैं. वह दीवार घड़ी और ई-बाइक निर्माण के क्षेत्र में भी हैं. 

पुल की मरम्मत के बाद समझौते की तारीख से इसे आठ से दस महीने में खोलने का समय दिया गया था. हालांकि, मरम्मत का काम बंद होने के बाद कंपनी ने इसे सात महीने के भीतर ही खोल दिया. जयसुख पटेल ने इसका उद्घाटन किया था. 

पुराने नियम में पुल पर 15 लोगों की थी इजाजत

2010 के मोरबी नगरपालिका प्रकाशन के अनुसार, एक नियम हुआ करता था जो एक समय में पुल के डेक पर केवल 15 व्यक्तियों की अनुमति देता था और नदी के पूर्वी तट पर एक रेलवे कार्यशाला खुलने तक यह लागू था. हालांकि, जिस तरह से रविवार (30 अक्टूबर) को लोग हादसे का शिकार हुए, उससे पता लगता है कि डेक पर करीब 300 लोग मौजूद थे.
  
नगर पालिका के प्रकाशन के मुताबिक, जब लोग पुल पर चलते हैं तो यह इतना डोलता है कि इसे इस्तेमाल करने वाले को सावधान रहना पड़ता है. इसलिए एक समय में केवल सीमित लोगों को ही पुल पर जाने की अनुमति थी. इसके लिए नगर पालिका ने शुल्क एक रुपये रखी थी. 1960-61 में जब नगर निकाय का गठन हुआ तब पुल नगर पालिका को सौंप दिया गया था. ताजा करार के बाद ओरेवा ने पश्चिमी छोर पर बने पुराने प्रवेश द्वार को बंद कर दिया था और इसके बजाय टिकट खिड़की के पास से एंट्री रखी थी. जयसुख पटेल के एक वीडियो के मुताबिक, 2001 के भूकंप से हुए नुकसान के बाद 2007 में धरांगधरा नाम की एक फर्म को पुल की मरम्मत का ठेका दिया गया था और दो करोड़ रुपये की लागत से इसका सौ फीसदी जीर्णोद्धार किया गया था. 

टिकट की कीमत का फंसा रहा पेंच

ओरेवा समूह के पास 2008 और 2018 के बीच पुल के प्रबंधन का करार था. कंपनी ने टिकट दरों को लेकर नगर पालिका के साथ कथित मतभेदों के चलते 2008 के करार को रिन्यू कराने के लिए अप्लाई नहीं किया था. कंपनी टिकट का रेट 10 रुपये से बढ़ाकर 15 रुपये करना चाहती थी. इसलिए समझौते को रिन्यू करने का काम अधर में लटक गया था. नगरपालिका के अधिकारियों का दावा है कि ओरेवा ग्रुप ने 2018 से 2022 की अंतरिम अवधि में पुल के प्रबंधन और रखरखाव का काम जारी रखा था. 

राज्य सरकार को देना पड़ा दखल

सूत्रों के मुताबिक, राज्य सरकार के अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद नगर पालिका ने 2022-23 के लिए वयस्कों के लिए टिकट की कीमत 15 रुपये तक बढ़ाने पर सहमति जताई थी. ओरेवा ने 3 जून 2020 को नगरपालिका से संपर्क कर 15 साल के लिए नए करार का प्रस्ताव रखा था. रिकॉर्ड के मुताबिक, 27 अगस्त 2020 को नगर पालिका के जनरल बोर्ड ने अपनी बैठक में ओरेवा के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी थी. कोरोना महामारी के बाद पुल बंद था. इस साल मार्च में पुल के प्रबंधन और रखरखाव को लेकर नए करार पर हस्ताक्षर किए गए थे.

ओरेवा ग्रुप के एक प्रबंधक दीपक पारेख के मुताबिक, मूल पुल का निर्माण मुंबई की इंजीनियरिंग कंपनी रिचर्डसन एंड क्रूडस ने किया था. इस कंपनी की स्थापना 1858 में की गई थी. पुल के निर्माण के सारा मैटेरियल इंग्लैंड से लाया गया था. तब गुजरात बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा था.

यह भी पढ़ें- न जारी किए गए टेंडर, न बदली पुरानी वायर... मोरबी हादसे में पिछले 40 घंटे के दौरान क्या-क्या हुआ! 10 अपडेट्स

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