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जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा कब होगा बहाल? जानें किसने CJI गवई को लिख दिया ओपन लेटर

CJI: अनुच्छेद 370 को लेकर पांच प्रमुख याचिकाकर्ताओं ने सीजेआई गवई को पत्र लिखते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने आठ महीने पहले राज्य के दर्जे के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया था.

अनुच्छेद 370 मामले में पांच प्रमुख याचिकाकर्ताओं ने भारत के मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई को एक खुला पत्र लिखा है, जिसमें उनसे जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे को खत्म करने की संवैधानिक वैधता पर फैसला सुनाने के लिए एक पीठ गठित करने और इसकी बहाली के लिए एक ठोस समय सीमा तय करने का आग्रह किया गया है. याचिकाकर्ताओं ने आगे किसी भी सरकार को किसी भी भारतीय राज्य का एकतरफा राज्य का दर्जा खत्म करने से रोकने के लिए कानूनी सुरक्षा उपाय भी मांगे हैं. 

हस्ताक्षरकर्ताओं, पूर्व जम्मू-कश्मीर वार्ताकार राधा कुमार, पूर्व गृह सचिव जी के पिल्लई, सेवानिवृत्त मेजर जनरल अशोक के मेहता, सेवानिवृत्त एयर वाइस मार्शल कपिल काक और पूर्व अंतर-राज्य परिषद सचिव अमिताभ पांडे ने चिंता व्यक्त की कि हाल ही में हुए पहलगाम हमले का इस्तेमाल केंद्र सरकार द्वारा राज्य का दर्जा बहाल करने के वादे को अनिश्चित काल के लिए टालने के बहाने के रूप में किया जा सकता है. 

संघवाद और संवैधानिक औचित्य की भावना से पलट

संसद में केंद्र की तरफ से, खासकर गृह मंत्री अमित शाह की तरफ से बार-बार दिए गए आश्वासनों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की देरी संघवाद और संवैधानिक औचित्य की भावना के विपरीत है. याचिकाकर्ताओं ने मुख्य न्यायाधीश से उनके खुले पत्र का खुद संज्ञान लेने और जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे को समाप्त करने की न्यायिक समीक्षा में तेजी लाने को लेकर बात कही. समूह आगामी मानसून सत्र से पहले पार्टी लाइन से परे सांसदों से संपर्क करने की भी योजना बना रहा है, ताकि सदन में इस मुद्दे को उठाया जा सके.

उन्होंने इस तर्क का जोरदार तरीके से विरोध किया कि पहलगाम हमले के कारण देरी ठीक है. पत्र में कहा गया, 'अगर कुछ है, तो यह बहाली के लिए सही समय है.' उन्होंने अक्टूबर 2024 के चुनावों में शांतिपूर्ण आचरण और उच्च मतदाता मतदान की ओर इशारा किया, जिसने नेशनल कॉन्फ्रेंस को पूर्ण बहुमत दिया और निर्वाचित शासन के लिए स्पष्ट सार्वजनिक जनादेश पेश किया.

कश्मीरियों को दोषी ठहराने की पुलिस की कहानी बेबुनियाद

पत्र में स्थानीय आबादी द्वारा पहलगाम हिंसा से खुद को दूर रखने के तरीके की सराहना की गई और एनआईए के फैसले की ओर इशारा किया गया कि कश्मीरियों को दोषी ठहराने वाली पिछली पुलिस की कहानी बेबुनियाद थी. इसमें मनोज सिन्हा के नेतृत्व वाले प्रशासन की "अनुचित दंडात्मक कार्रवाई" करने के लिए तीखी आलोचना की गई, जिसमें घरों को गिराना भी शामिल है, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि इससे व्यापक आक्रोश पैदा हुआ. 

हस्ताक्षरकर्ताओं ने चेतावनी दी कि इस तरह की कार्रवाइयों के साथ-साथ सुरक्षा और नीतिगत चर्चाओं से निर्वाचित प्रतिनिधियों को बाहर रखने से घाटी में शांति का माहौल खराब होने का जोखिम है. उन्होंने जोर देकर कहा, 'आगे बढ़ने का एकमात्र स्थायी रास्ता राजनीतिक और नागरिक अधिकारों की बहाली है, जो पूर्ण राज्य के दर्जे के साथ आते हैं.' 

बिना किसी शर्त के होनी चाहिए बहाली

याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने आठ महीने पहले राज्य के दर्जे के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया था और उपराज्यपाल ने इसे राष्ट्रपति को भेज दिया था, फिर भी मुख्यमंत्री के चेतावनी के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई है. सॉलिसिटर-जनरल के दिसंबर 2023 के बयान की आलोचना करते हुए कि राज्य का दर्जा चरणों में बहाल किया जाएगा. याचिकाकर्ताओं ने चेतावनी दी कि यह एक खतरनाक मिसाल कायम करता है.

उन्होंने तर्क दिया, 'यह दृष्टिकोण संवैधानिक स्थिति को कमजोर करता है कि किसी भी राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में नहीं बदला जा सकता है. यदि पदावनति असंवैधानिक थी, तो बहाली पूर्ण और बिना शर्त होनी चाहिए.' भारत के इतिहास में यह पहला मामला है, जब एक पूर्ण राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया गया और तर्क दिया कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है, जो भारत की संघीय प्रकृति को बनाए रखता है.

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से नहीं सुनाया फैसला

याचिकाकर्ताओं ने यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई की संवैधानिक वैधता पर स्पष्ट रूप से फैसला नहीं सुनाया, लेकिन सरकार के इस आश्वासन को स्वीकार कर लिया कि राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने समय पर कार्रवाई का आग्रह किया था और न्यायमूर्ति संजय खन्ना ने सीधे तौर पर इस पद में नीचे गिरने को असंवैधानिक बताया था. पत्र का समापन न्यायिक और विधायी हस्तक्षेप की तत्काल अपील के साथ होता है, ताकि जम्मू-कश्मीर की पूर्ण राज्य के रूप में गरिमा बहाल हो सके और भारतीय संविधान के संघीय ढांचे की रक्षा हो सके.

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