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किसान आंदोलन: चुनावी राज्यों में सियासी तपिश बढ़ाने की तैयारी

किसानों ने तय किया है कि आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर धरना स्थलों पर बड़ी संख्या में महिलाओं को जुटाकर शक्ति प्रदर्शन किया जाये. अगले दिन यानी नौ मार्च को किसानों का संयुक्त मोर्चा आगे की रणनीति तय करेगा.

नई दिल्ली: अपने सौ दिन के सफर में हर तरह के उतार-चढ़ाव देख चुका किसान आंदोलन फ़िलहाल खत्म होता नहीं दिखता. सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं है तो किसान भी झुकने को राजी नहीं. ऐसे में, सरकार की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि आखिर बीच का रास्ता क्या निकाला जाये. पर, सरकार को अब इसलिये और भी ज्यादा गंभीरता से सोचना होगा कि किसानों का आंदोलन भले ही एक मोर्चे पर शुरू हुआ था, लेकिन अब वह पूरे देश में फैलता जा रहा है. कहीं ऐसा न हो कि इस आंदोलन की तपिश पांच राज्यों के चुनावों का रुख ही बदलकर रख दे.

वैसे किसान संगठनों के साथ हुई पिछली वार्ता में सरकार ने बीच का रास्ता निकालते हुए ही यह प्रस्ताव रखा था कि वह तीनों कृषि कानूनों को डेढ साल तक स्थगित रखने के लिए तैयार है, लेकिन किसानों ने उसे एक सुर से ठुकरा दिया. वे तो दिल्ली की सीमाओं पर खूंटा गाड़कर अब इस जिद के साथ बैठे हैं कि कानून वापसी तक घर वापसी नहीं.

किसानों ने तय किया है कि आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर धरना स्थलों पर बड़ी संख्या में महिलाओं को जुटाकर शक्ति प्रदर्शन किया जाये. अगले दिन यानी नौ मार्च को किसानों का संयुक्त मोर्चा आगे की रणनीति तय करेगा. रणनीति क्या होगी, इसका पूरा खुलासा नहीं किया गया है. लेकिन मोर्चा से जुड़े किसान नेता योगेंद्र यादव की बातों से लगता है कि अब किसानों का सारा फ़ोकस पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों पर ही रहेगा. उनके मुताबिक "इन राज्यों में बड़ी संख्या में किसानों के जत्थे गांव-गांव जाकर लोगों से अपील करेंगे कि किसान विरोधी कानून लाने वाली इस सरकार की जो पार्टी है, उसे वोट न दें. हम लोगों से यह बिल्कुल भी नहीं कहेंगे कि वे किस पार्टी को वोट दें, वे जिसे चाहें उसे वोट देने के हकदार हैं. हमारा मकसद सिर्फ इतना रहेगा कि लोग कानून बनाने वाली पार्टी का साथ न दें. हम किसी पार्टी का नाम भी नहीं लेंगे."

यादव के बयान से साफ जाहिर है कि किसान खुलकर बीजेपी के खिलाफ प्रचार करेंगे. अभी यह कहना मुश्किल है कि मतदाताओं पर किसानों की इस अपील का कितना असर पड़ेगा. लेकिन शहर के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में किसान अपनी बात समझा पाने में अगर कामयाब होते हैं, तो बीजेपी के लिये यह स्थिति अच्छी नहीं होगी.

चूंकि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का बिगुल बज चुका है, लिहाजा वेस्ट यूपी में किसान महापंचायत का सिलसिला बढ़ता जा रहा है. इनमें प्रियंका व राहुल गांधी से लेकर आरएलडी नेता जयंत चौधरी और सपा नेता अखिलेश यादव शामिल हो रहे हैं. उधर, राजस्थान व हरियाणा में भी ऐसी खाप पंचायतें हो रही हैं, जिसमें विपक्षी दलों के नेता हिस्सा ले रहे हैं. जाहिर है कि वे किसानों के बहाने अपनी सियासत ही कर रहे हैं, लेकिन इस सारी कवायद से आखिरकार बट्टा तो सरकार की साख पर ही लग रहा है.

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