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किसान आंदोलन: कर्ज माफी राज्यों के लिए मुश्किल क्यों हैं?

नई दिल्ली: देश के किसान एक बार फिर बारी परेशानी का सामना कर रहे हैं. वोटों की फसल काटने के लिए लगभग सभी राजनीति दल किसानों की कर्जमाफी का वादा करते हैं. लेकिन सत्ता में आते ही उन्हें हकीकत समझ में आने लगती है. कर्जमाफी का वादा करना जितना आसान है उसे पूरा करना उतना ही मुश्किल. भारत की मौजूदा अर्थव्यवस्था में कोई भी राज्य इस हालत में नहीं है कि वो अपनी आय के दम पर किसानों का कर्जमाफ कर सके यानी अगर कोई राज्य कर्जमाफी का फैसला करता है तो निश्चित तौर पर उसकी कीमत पूरे राज्य को चुकानी होगी.

भारत की 65 करोड़ आबाद खेती पर है निर्भर भारत की 65 करोड़ आबादी खेती पर निर्भर है यानी संख्या के लिहाज से किसान सबसे बड़ा वोटबैंक है और इसी वोट बैंक के लिए बड़े बड़े वादे किए जाते हैं. कर्जमाफी वो शॉर्टकट है जिसके जरिए सत्ता का रास्ता आसान हो जाता है. लेकिन कुर्सी पर बैठते ही ये सवाल सामने खड़ा हो जाता है कि कर्जमाफी के लिए पैसा आएगा कहां से?

 दरअसल कर्ज सिर्फ किसानों की मुसीबत नहीं बल्कि राज्यों की भी सबसे बड़ी मुसीबत है यानी भारत के ज्यादातर राज्य कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं. ऐसे में अगर कोई भी राज्य सरकार किसानों की कर्जमाफी का फैसला करती है तो इसका सीधा मतलब है कि राज्य पर भी कर्ज का अतिरिक्त बोझ.

17 राज्यों पर बढ़ा है कर्ज का बोझ रिजर्व बैंक के मुताबिक देश में 17 ऐसे राज्य हैं जिन पर पिछले कुछ सालों में कर्ज को बोझ बढ़ता गया है. केंद्र सरकार के नियम के मुताबिक कोई भी राज्य अपने सकल घरेलू उत्पाद यानी GSDP के 3 फीसदी तक कर्ज ले सकता है. दूसरे शब्दों में किसी भी राज्य का वित्तीय घाटा यानी आय और व्यय का अंतर, GSDP के 3 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए. अब अगर देश के बड़े राज्यों पर नजर डालें तो 2015-16 में उत्तर प्रदेश का वित्तीय घाटा 5.6%, राजस्थान का वित्तीय घाटा 10%, हरियाणा का 6.3%, बिहार का 6.9% और मध्य प्रदेश का 3.9 प्रतिशत था.

इन आंकड़ों का सीधा मतलब ये है कि ये राज्य तय सीमा से ज्यादा कर्ज उठा चुके हैं. यानी इनके पास किसानों की कर्जमाफी के लिए पैसे होने का सवाल ही नहीं उठता. इसके बावजूद भी अगर वो कर्जमाफी का एलान करते हैं तो उसका सीधा असर राज्य के दूसरे विकास कामों पर पड़ना तय है. कर्जमाफी के लिए सरकार शिक्षा और दूसरे विकास कार्यों में कटौती करती है तो उसके आने वाले समय में गभीर परिणाम हो सकते हैं.

राज्य अपनी जेब से किसानों का कर्ज माफ करने में असमर्थ किसी भी राज्य सरकार के लिए अपनी जेब से किसानों का कर्जमाफ करना लगभग नामुमकिन है और केंद्र सरकार बार बार ये कह चुकी है कि वो इस मामले में राज्य सरकारों की कोई मदद नहीं कर सकती. किसी राज्य के पास अपनी क्षमता होती है कि वो राज्य अपने साधन जुटाए. कुल मिलाकर कर्जमाफी का फैसला किसी भी स्थिति में राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला बड़ा बोझ है.

एक अनुमान के मुताबिक किसानों की कर्जमाफी से पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर करीब 2600 अरब रुपए का बोझ पड़ सकता है. इसीलिए रिजर्व बैंक हमेशा से ही कर्जमाफी का विरोध करता रहा है. RBI गवर्नर उर्जित पटेल की अगुवाई वाली मौद्रिक नीति समिति की दो दिनों की बैठक में किसानों की कर्जमाफी का मुद्दा उठा, जिस पर समिति ने कहा कि कर्जमाफी के एलान की वजह से वित्तीय लक्ष्यों में गिरावट और उससे महंगाई पर बुरा असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है.

कर्जमाफी की वजह से कर्ज चुकाने की संस्कृति पर असर पड़ने की चेतावनी रिजर्व बैंक पहले ही दे चुका है. अब रिजर्व बैंक का कहना है कि इससे महंगाई दर बढ़ने का खतरा हो सकता है जो आम आदमी के लिए अच्छी खबर नहीं है. महंगाई दर बढ़ी तो ब्याज दर में कमी करने का रास्ता बंद हो जाएगा.

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