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Xप्लेन: 'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' क्या है? क्यों नहीं नई जगह सो पाते हैं लोग

नई जगह पर पहली रात ठीक से नींद न आने की समस्या को वैज्ञानिक 'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' (First-Night Effect) कहते हैं. इस पर पिछले कई दशकों से शोध हो रहे हैं.

'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' का मतलब है नई जगह पर पहली रात सोने के दौरान नींद की गुणवत्ता में कमी आना. यह स्थिति तब देखी जाती है, जब लोग किसी नई जगह, जैसे स्लीप लैबोरेटरी, होटल या किसी अनजान स्थान पर सोते हैं.

इसके लक्षणों में नींद आने के बाद बार-बार जागना, नींद की क्षमता (Sleep Efficiency) कम होना, गहरी नींद में कमी आना और मस्तिष्क की गतिविधियों में बदलाव शामिल हैं.

FNE तब होता है, जब सेंट्रल नर्वस सिस्टम और ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम अनजान माहौल का सामना करते हुए अधिक सतर्क (Hypervigilant) हो जाते हैं. हालांकि, आमतौर पर बाद की रातों में इसका असर कम हो जाता है, लेकिन इसकी तीव्रता व्यक्ति के स्वभाव, उम्र और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करती है.

आइए जानते हैं कि इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं.


नई जगह पर कई लोगों को सोने में परेशानी क्यों होती है?

यह सब 'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' (पहली रात का असर) की वजह से होता है. इसके मुख्य कारण ये हैं—

1. आपका दिमाग पूरी तरह नहीं सोता

जब कोई व्यक्ति नई जगह पर पहली बार सोता है, तो उसका दिमाग पूरी तरह आराम की स्थिति में नहीं जाता. खासकर मस्तिष्क का एक हिस्सा अधिक सक्रिय बना रहता है. इसी प्रक्रिया को 'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' कहा जाता है. इसकी वजह से व्यक्ति आसपास की आवाज़ों या हलचल के प्रति अधिक संवेदनशील रहता है और रात में उसकी नींद बार-बार खुल सकती है.

2. यह जीवित रहने की एक पुरानी रणनीति है

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह प्रतिक्रिया शुरुआती इंसानों को अनजान जगहों पर सुरक्षित रखने के लिए विकसित हुई थी. थोड़ा सतर्क रहने से जंगली जानवरों या अन्य खतरों के अचानक हमले का जोखिम कम हो जाता था. हालांकि आज के होटल और घर सुरक्षित होते हैं, लेकिन हमारा दिमाग आज भी उसी तरह प्रतिक्रिया करता है.

3. गहरी नींद कम हो जाती है

नई जगह पर पहली रात व्यक्ति स्लो-वेव स्लीप (Slow-wave Sleep) यानी गहरी नींद में कम समय बिताता है. इसके कारण नींद अपेक्षाकृत हल्की रहती है. नतीजतन, लोग रात में कई बार जाग सकते हैं, उन्हें अधिक स्पष्ट सपने आ सकते हैं और पर्याप्त समय तक सोने के बाद भी थकान महसूस हो सकती है.


Xप्लेन: 'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' क्या है? क्यों नहीं नई जगह सो पाते हैं लोग

4. अनजान माहौल नींद में बाधा डालता है

अलग तरह का गद्दा, तकिया, कमरे का तापमान, रोशनी, गंध या आसपास का शोर—ये सभी चीज़ें नींद को प्रभावित कर सकती हैं. इसके अलावा, छुट्टियों का उत्साह या किसी महत्वपूर्ण मीटिंग से पहले की चिंता जैसे मनोवैज्ञानिक कारण भी सतर्कता बढ़ा देते हैं और नींद आने में देरी कर सकते हैं.

5. यह समस्या आमतौर पर अस्थायी होती है

अच्छी बात यह है कि 'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' स्थायी नहीं होता. जब दिमाग नए माहौल को सुरक्षित मान लेता है, तो आमतौर पर दूसरी या तीसरी रात नींद सामान्य हो जाती है. नियमित सोने का समय बनाए रखना और आरामदायक माहौल तैयार करना इसके प्रभाव को कम करने में मदद करता है.


सबसे ज़्यादा असर किन लोगों पर होता है?

  • बार-बार यात्रा करने वाले लोग
  • एंग्ज़ायटी (चिंता) से ग्रस्त लोग
  • हल्की नींद लेने वाले लोग
  • बिज़नेस प्रोफ़ेशनल्स
  • प्रतियोगिता से पहले एथलीट
  • अस्पताल में भर्ती मरीज़

इन लोगों में 'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' का असर अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है.


क्या यह नुकसानदायक है?

नहीं. यह आमतौर पर शरीर और दिमाग की एक सामान्य तथा अस्थायी प्रतिक्रिया है. अधिकांश लोग दूसरी या तीसरी रात बेहतर नींद लेने लगते हैं, क्योंकि तब तक मस्तिष्क नए माहौल से परिचित हो चुका होता है.


Xप्लेन: 'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' क्या है? क्यों नहीं नई जगह सो पाते हैं लोग

नई जगह पर बेहतर नींद के लिए आप ये उपाय अपना सकते हैं—

  • सोने का समय नियमित रखें.
  • हो सके तो अपना तकिया या कंबल साथ ले जाएँ.
  • सोने से पहले कैफ़ीन और शराब से बचें.
  • स्क्रीन टाइम कम करें.
  • ईयरप्लग या स्लीप मास्क का इस्तेमाल करें.
  • कमरे को ठंडा, शांत और अंधेरा रखें.

रिसर्च क्या कहती है?

नई जगह पर पहली रात ठीक से नींद न आने की समस्या को वैज्ञानिक 'फ़र्स्ट-नाइट इफ़ेक्ट' (First-Night Effect) कहते हैं. इस पर पिछले कई दशकों से शोध हो रहे हैं, लेकिन 2016 में अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पहली बार विस्तार से बताया कि ऐसा आखिर क्यों होता है.

शोधकर्ताओं ने 35 स्वस्थ लोगों पर अध्ययन किया. प्रतिभागियों को स्लीप लैब में दो अलग-अलग रातों तक सुलाया गया. उनकी नींद के दौरान EEG (इलेक्ट्रोएन्सेफैलोग्राफी), MRI और अन्य ब्रेन इमेजिंग तकनीकों की मदद से मस्तिष्क की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया गया.

अध्ययन में पाया गया कि नई जगह पर पहली रात सोते समय मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा (Left Hemisphere) पूरी तरह आराम की अवस्था में नहीं जाता, बल्कि अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय रहता है. यही हिस्सा आसपास की आवाज़ों और हलचल पर अधिक तेज़ी से प्रतिक्रिया देता है.

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों के सोने के समय हल्की 'बीप' (Beep) की आवाज़ें भी सुनाईं. उन्होंने पाया कि पहली रात लोगों का दिमाग इन आवाज़ों पर जल्दी प्रतिक्रिया देता था और वे अधिक आसानी से जाग जाते थे. वहीं, दूसरी रात जब वही लोग उसी स्थान पर दोबारा सोए, तो यह अंतर लगभग समाप्त हो गया और मस्तिष्क के दोनों हिस्सों की गतिविधि सामान्य हो गई.

संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.

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