Xप्लेन: अब आतंकी हाफिज सईद पर चलेगा मुकदमा, कैसे भारत के नए कानून से कसेगा शिकंजा
इस कानूनी कार्रवाई के केंद्र में हाफिज़ सईद है, जो प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उसके राजनीतिक संगठन जमात-उद-दावा (JuD) का संस्थापक और प्रमुख है

मुंबई पुलिस और गृह मंत्रालय ने 26 नवंबर, 2008 के मुंबई आतंकी हमलों की साज़िश रचने के आरोपी छह पाकिस्तानी नागरिकों के खिलाफ उनकी गैर-मौजूदगी में औपचारिक आपराधिक मुकदमा चलाने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है. यह पहली बार है जब किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 356 के तहत 'ट्रायल इन एब्सेंटिया' यानी आरोपी की गैर-मौजूदगी में मुकदमा चलाने के प्रावधान का इस्तेमाल किया जा रहा है. BNSS ने 1 जुलाई, 2024 से पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह ली थी.
इस कानूनी कार्रवाई के केंद्र में हाफिज़ सईद है, जो प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उसके राजनीतिक संगठन जमात-उद-दावा (JuD) का संस्थापक और प्रमुख है.
हाफिज़ सईद के अलावा अभियोजन पक्ष लश्कर-ए-तैयबा के ऑपरेशनल कमांडर ज़की-उर-रहमान लखवी, मुख्य हैंडलर साजिद मीर, कराची कंट्रोल रूम के मैनेजर अबू अलकामा, आसिम उर्फ़ अबू कहफ़ा और पाकिस्तान सेना के पूर्व अधिकारी मेजर अब्दुर रहमान पाशा के खिलाफ भी कार्रवाई कर रहा है.
यह प्रक्रिया तब औपचारिक रूप से शुरू हुई जब मुंबई पुलिस आयुक्त देवेन भारती ने विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम को इस संबंध में आधिकारिक सूचना दी. उन्होंने अभियोजन पक्ष से अनुरोध किया कि नए आपराधिक कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाए ताकि विदेशों में छिपे भगोड़े आरोपी न्यायिक प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक बाधित न कर सकें.
अभियोजन पक्ष की याचिका पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश एस.आर. नवान्दर ने छहों आरोपियों के खिलाफ कानूनी नोटिस जारी किए और उन्हें 18 अगस्त तक अदालत में पेश होने का निर्देश दिया. तय समय सीमा के भीतर उनके पेश नहीं होने के बाद अब अदालत सबूत दर्ज कर सकती है, गवाहों के बयान रिकॉर्ड कर सकती है और आरोपियों के खिलाफ अंतिम फैसला भी सुना सकती है.
भारत में गैर-मौजूदगी में मुकदमा कैसे चलता है?
पहले भारत में नियम यह था कि यदि कोई आरोपी अदालत में मौजूद नहीं है, तो उसके खिलाफ मुकदमा पूरा करके अंतिम फैसला नहीं सुनाया जा सकता था. यानी अदालत आरोपी की गैर-मौजूदगी में उसे दोषी या बरी घोषित नहीं कर सकती थी.
हालांकि, एक सीमित अपवाद जरूर था. यदि कोई आरोपी फरार हो गया हो और उसके जल्द गिरफ्तार होने की संभावना न हो, तो अदालत गवाहों के बयान पहले से रिकॉर्ड कर सकती थी ताकि आरोपी के पकड़े जाने के बाद उन बयानों का इस्तेमाल किया जा सके.
लेकिन अदालत केवल गवाहों के बयान सुरक्षित रख सकती थी. वह न तो मुकदमा पूरा कर सकती थी और न ही आरोपी को दोषी या बरी घोषित कर सकती थी. अंतिम फैसला तभी संभव था, जब आरोपी अदालत के सामने पेश हो.
यही कानूनी सीमा सीमा-पार आतंकवाद से जुड़े मामलों में बड़ी बाधा बन जाती थी. विदेशी देशों में छिपे आरोपी वर्षों तक भारतीय अदालतों की पहुंच से बाहर रहते थे और मुकदमा अंतिम चरण तक नहीं पहुंच पाता था.
अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 356 लागू होने के बाद स्थिति बदल गई है. इस प्रावधान के तहत यदि कोई आरोपी जानबूझकर न्यायिक प्रक्रिया से बचता है और भारतीय एजेंसियों की पहुंच से बाहर रहता है, तो अदालत उसकी गैर-मौजूदगी में भी मुकदमा पूरा कर सकती है, साक्ष्य दर्ज कर सकती है और अंतिम फैसला सुना सकती है.
सेक्शन 356 में कुछ कड़े कानूनी नियम शामिल किए गए हैं. 'इन एब्सेंटिया' (आरोपी की गैर-मौजूदगी में) ट्रायल शुरू होने से पहले इन नियमों को पूरा करना ज़रूरी है-

1-अपराध की गंभीरता: यह प्रावधान सिर्फ़ गंभीर आपराधिक मामलों तक सीमित है, जिनमें 10 साल या उससे ज़्यादा की सज़ा, उम्रकैद या मौत की सज़ा का प्रावधान हो.
2-घोषित अपराधी का दर्जा: न्यायिक समन का बार-बार जवाब न देने पर, आरोपी को सबसे पहले BNSS के सेक्शन 84 के तहत औपचारिक रूप से 'घोषित अपराधी' (Proclaimed Offender) घोषित किया जाना चाहिए.
3-दोहरे वारंट का नियम: पीठासीन मजिस्ट्रेट या जज को लगातार दो गैर-ज़मानती गिरफ्तारी वारंट जारी करने होंगे, और दोनों वारंट जारी करने के बीच कम से कम 30 दिनों का अनिवार्य अंतर होना चाहिए.
4-कई माध्यमों से सार्वजनिक सूचना: कोर्ट की घोषणा को आरोपी के आखिरी ज्ञात पते वाले इलाके या अधिकार क्षेत्र में चलने वाले प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फरार लोगों के लिए, गृह मंत्रालय के माध्यम से इंटरपोल सहित अंतरराष्ट्रीय पुलिसिंग चैनलों को नोटिस भेजा जाना चाहिए.
5-90 दिनों का अनिवार्य इंतज़ार का समय: BNSS औपचारिक रूप से आरोप तय होने के बाद 90 दिनों का अनिवार्य इंतज़ार का समय तय करता है. यह अतिरिक्त समय आरोपी को सरेंडर करने या कानूनी पक्ष रखने का आखिरी मौका देता है, इससे पहले कि कोर्ट उनकी गैर-मौजूदगी में आगे बढ़े.
6-राज्य द्वारा वित्तपोषित कानूनी बचाव: एकतरफा कार्रवाई के दुरुपयोग को रोकने और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया बनाए रखने के लिए, सेक्शन 356 कहता है कि अगर फरार आरोपी वकील नहीं रख पाता है, तो कोर्ट को राज्य द्वारा वित्तपोषित डिफेंस काउंसिल (कानूनी सहायता) नियुक्त करना होगा. यह वकील अभियोजन पक्ष के गवाहों से जिरह करेगा, दस्तावेजी सबूतों की जांच करेगा और आरोपी की ओर से अंतिम बहस करेगा.
एक बार जब ये शर्तें पूरी हो जाती हैं, तो ट्रायल सामान्य न्यायिक नियमों के तहत आगे बढ़ता है. अगर दोषी ठहराया जाता है, तो सज़ा हमेशा लागू रहेगी. इसका मतलब है कि अगर अपराधी कभी भारतीय अधिकार क्षेत्र में आता है या उसे प्रत्यर्पित (extradited) किया जाता है, तो मामले की दोबारा सुनवाई किए बिना उसे तुरंत गिरफ्तार करके जेल भेजा जा सकता है.
हाफिज़ सईद कौन है?
हाफिज़ मुहम्मद सईद प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का संस्थापक है. उसका नाम 26/11 मुंबई आतंकी हमलों सहित कई आतंकवादी हमलों की साज़िश से जुड़ा रहा है.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित किया है. वहीं, अमेरिकी विदेश विभाग ने भी उसे आतंकवादी घोषित किया है और 'रिवॉर्ड्स फॉर जस्टिस' कार्यक्रम के तहत उसकी गिरफ्तारी और दोषसिद्धि में मदद करने वाली जानकारी के लिए 1 करोड़ अमेरिकी डॉलर (10 मिलियन डॉलर) तक के इनाम की घोषणा की है.
पाकिस्तान में भी हाफिज़ सईद के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई है और आतंकवाद के वित्तपोषण (टेरर फंडिंग) से जुड़े मामलों में उसे सजा सुनाई गई है. हालांकि भारत लंबे समय से उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई और उसके प्रत्यर्पण की मांग करता रहा है.
भारत का आरोप है कि हाफिज़ सईद 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के मुख्य साज़िशकर्ताओं में से एक है, जिनमें 166 लोगों की मौत हुई थी. भारत लगातार पाकिस्तान से उसे भारत को सौंपने की मांग करता रहा है ताकि उसके खिलाफ भारतीय अदालतों में मुकदमा चलाकर सजा दिलाई जा सके.






















