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Explained: दिल्ली के चुनावी समर को कैसे अमित शाह ने बराबरी का मुकाबला बना दिया

सरकारी कामकाज से जब अमित शाह को फुर्सत मिलती वह दिल्ली विधानसभा चुनाव की बैठकों में शामिल हो जाते थे.खुद अमित शाह दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों पर पहुंचे या तो उन्होंने वहां रोड शो किए या फिर सभाएं की.

नई दिल्ली: दिल्ली में विधानसभा चुनाव ने जब दस्तक दी तो माना जा रहा था कि अरविंद केजरीवाल के लिए ये चुनाव फटाफट क्रिकेट की तरह साबित होगा और वे चुनाव जीत कर फिर से मुख्यमंत्री बन जाएंगे. सभी राजनीतिक पंडित चुनाव की एकतरफा होने की भविष्यवाणी कर रहे थे लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह अलग रणनीति पर काम कर रहे थे. आइए आपको बताते हैं कि कैसे अमित शाह ने दिल्ली चुनाव की एकतरफा बाजी को पलट दिया.

23 मई 2019 में बीजेपी में उत्सव का माहौल था. लोकसभा चुनाव में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और मोदी के जादू ने कमाल कर दिखाया था. बीजेपी 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 21 सीटें ज्यादा जीतकर 303 लोकसभा सीटें जीत चुकी थी. अब माना जा रहा था कि बीजेपी एक बार फिर से पूरे भारत में अजय बनकर बढ़ेगी. इस बड़ी जीत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कंधों पर और ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी डाल दी थी. प्रधानमंत्री मोदी ने इस बड़े मैंडेट को कुछ यूं पढ़ा कि बीजेपी के सभी कोर मुद्दों को हल करना शुरू कर दिया. जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35 ए संसद में कानून बनाकर खत्म कर दिया. तीन तलाक बिल को पास कराया और पिछले 4 साल से अटके पड़े नागरिकता संशोधन एक्ट को संसद में पास करके कानून बना दिया.

चुनाव की दस्तक

कानून के बनते ही देश में जगह-जगह के सीएए के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे. इसी दौरान अमित शाह दिल्ली विधानसभा चुनाव की तैयारी करने लगे थे. जनवरी के पहले हफ्ते में उन्होंने दिल्ली बीजेपी के कोर ग्रुप की बैठक में कहा, "दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीतने जैसा चुनाव है, केजरीवाल सरकार के खिलाफ और उसके झूठ के खिलाफ लोगों में गुस्सा है. लोग इस सरकार को दोबारा नहीं देखना चाहते हैं. हम यह चुनाव जीत सकते हैं और हमें चुनाव जीतने के लिए मैदान में उतरना है".

इसी बैठक में यह भी तय हो गया कि पार्षद हो या पूर्व विधायक या फिर कोई और, किसी को भी टिकट दिया जा सकता है बस उसका चुनाव जिताऊ होना जरूरी है.

विरोधी की कमजोरियों को भांंपना

अब तक यह साफ हो गया था कि बीजेपी अध्यक्ष और देश के गृह मंत्री अमित शाह अपने विरोधी और आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कमजोरी भांप चुके हैं. सूत्रों के मुताबिक अमित शाह ने पूरी दिल्ली का एक सर्वे कराया था. उस सर्वे में यह बात उभरकर आई कि बड़ी तादाद में दिल्ली के लोग अरविंद केजरीवाल से नाराज हैं. यह नाराजगी उनकी वादाखिलाफी से है.

इसी सर्वे में यह बात भी उभर कर सामने आई कि आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है. बड़ी तादाद में पार्टी से जुड़े लोग नाराज होकर दूर चले गए हैं. आम आदमी पार्टी का वॉलिंटियर बेस भी दरक चुका है. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की कार्यप्रणाली और उनकी सरकार के काम करने के तरीके के खिलाफ नाराजगी थी. इसी नाराजगी को भुनाने के लिए अमित शाह ने एक प्लान तैयार करने में जुट गए.

योजना बनाकर रणनीति पर काम करना शुरू किया

19 जनवरी को रात को अमित शाह ने देशभर से छांट कर बुलाए गए संगठन कौशल में पारंगत 312 कार्यकर्ताओं की बैठक की. इस बैठक में प्रदेश स्तर के पदाधिकारी, कुछ विधायक, सांसद कुछ केंद्रीय मंत्री और कुछ साधारण कार्यकर्ता शामिल थे. इन सभी की खूबी यह थी कि अमित शाह ने अपने माइक्रोमैनेजमेंट के प्लान के मुताबिक काम करने वालों को मानते हैं. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इन सभी के सामने दिल्ली चुनाव का प्लान रख दिया और सभी से कह दिया कि अगले एक महीने के लिए आप सब कुछ भूल जाएं. आपको दिल्ली में रहना है, दिल्ली में खाना है, दिल्ली में सोना है, और दिल्ली के लिए ही जीना है, दिल्ली चुनाव होने तक आपको दिल्ली छोड़कर नहीं जाना है. अमित शाह ने दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतने के लिए अपनी टीम तैयार कर ली थी. यह वो टीम थी जिसे अमित शाह "चुनाव जिताऊ टीम" मानते हैं.

टीम को काम बांटना

अमित शाह ने इस टीम को तीन हिस्सों में बांटा. हर लोकसभा में एक प्रमुख नेता को इसकी जिम्मेदारी दी गई. हर लोकसभा की 10 विधानसभा सीटों पर दो-दो नेताओं को लगाया गया. इन पर भाषण, व्यवस्था और चुनाव संचालन की जिम्मेदारी थी. किस विधानसभा क्षेत्र में किस नेता के भाषण, किस नेता के रोड शो और संसाधनों की कैसी व्यवस्था और किस रणनीति के संचालन की जरूरत है यह तय करना इन नेताओं का काम था.

इसके अतिरिक्त इन नेताओं को अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र में घर-घर संपर्क, स्थानीय मुद्दों की पहचान कर उन मुद्दों को भाषण में शामिल करवाना, स्थानीय आबादी, जाति, समुदाय के मुताबिक देशभर के बड़े नेताओं, मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों को जनसंपर्क और भाषण के लिए बुलाना जैसी जिम्मेदारियां सौंपी गई.

पार्टी की शीर्ष इकाई केंद्रीय चुनाव समिति से दिल्ली विधानसभा के लिए उम्मीदवारों के नाम तय होने के बाद अमित शाह ने माइक्रोमैनेजमेंट शुरू कर दिया. दिन प्रतिदिन चुनाव प्रचार और मुद्दों पर देर रात तक समीक्षा बैठक करते और पूरी रिपोर्टिंग लेते. कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे जहां पर अमित शाह दो बार भी पहुंचे हैं.

20 जनवरी 2019 को पार्टी की कमान जेपी नड्डा के हाथ जा चुकी थी. अब पार्टी के नए अध्यक्ष जेपी नड्डा बन गए थे, लेकिन गृह मंत्री अमित शाह दिल्ली विधानसभा चुनाव में उसी ताकत से जुटे रहे जैसे पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर भी जुटे हुए थे. पूरी दिल्ली की सभी विधानसभा सीटों का उन्होंने वर्गीकरण किया. 27 सीटें ऐसी थी जहां बीजेपी को 35 फीसदी वोट पिछले विधानसभा चुनाव में मिला था, इन सीटों को "ए" कैटेगरी में रखा गया और सबसे ज्यादा ताकत इन्ही सीटों पर झोंकी गई. इसी दौरान विधानसभा सीटों पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए बीजेपी अध्यक्ष खुद देर रात तक उस विधानसभा क्षेत्र में घूमते थे. विधानसभा में पार्टी उम्मीदवार के कार्यालय तक में देर रात तक बैठक लेते थे.

इन्हीं बैठकों के दौरान अमित शाह को शाहीन बाग के मुद्दे पर लोगों में नाराजगी का एहसास हुआ पार्टी के इंटरनल सर्वे में भी शाहीन बाग के मुद्दे पर दिल्ली की जनता में गुस्सा होने की बात सामने आई.

मुद्दे और सुर बदलना, पूरी टीम को एक लय-ताल में लाना

अब तक माना जा रहा था कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के सामने कोई चुनौती नहीं है. यह चुनाव लगभग एकतरफा है, लेकिन अमित शाह हर बार की तरह इस बार भी जैसे मौके का इंतजार कर रहे थे, शाहीन बाग के मुद्दे पर जैसे ही उन्हें दिल्ली की जनता में नाराजगी का एहसास हुआ उन्होंने अपनी रणनीति बदल दी. मोदी के चेहरे और मोदी के विकास पर चुनाव लड़ रही बीजेपी, राष्ट्रवाद वर्सेज शाहीन बाग के रूप में नया मुद्दा ही मिल गया.

24 जनवरी की देर रात प्रमुख नेताओं की बैठक में यह तय हो गया कि पूरा का पूरा चुनाव और शाहीन बाग के मुद्दे और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ा जाएगा. बड़े से लेकर छोटे नेता और कार्यकर्ता तक को इस बात की सूचना दी गई और नागरिकता संशोधन कानून और शाहीन बाग से जुड़े हर पहलू और हर मुद्दे से प्रमुख लोगों और कार्यकर्ताओं को अवगत कराया गया. उनको कहा गया कि अपने भाषणों में शाहीन बाग और राष्ट्रवाद का जिक्र जरूर करें.

खुद अमित शाह ने नरेला में अपने भाषण में कहा, "8 फरवरी को कमल के फूल का बटन इतनी जोर से दबाना के बटन यहां दबे लेकिन करंट शाहीन बाग में लगे".दिल्ली में उत्तर-पश्चिम लोकसभा सीट के प्रभारी बनाए गए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने एक सभा में नारा लगवा दिया " देश के गद्दारों को बी बी बी बी बी बी बी".

कपिल मिश्रा ने ट्वीट कर साधा निशाना

दिल्ली के मॉडल टाउन से बीजेपी के प्रत्याशी कपिल मिश्रा ने ट्वीट कर अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा. हालांकि इस ट्वीट को चुनाव आयोग के कहने पर ट्विटर ने इसे डिलीट कर दिया लेकिन उसके बावजूद कपिल मिश्रा पर 48 घंटे का प्रतिबंध चुनाव आयोग ने लगा दिया. अब तक अरविंद केजरीवाल अपनी सरकार के विकास पर ही चुनाव लड़ रहे थे लेकिन बीजेपी के उग्र राष्ट्रवाद के आगे वह भी पस्त पड़ गए और अचानक से उन्होंने भी एक दिन शाहीन बाग का जिक्र कर दिया. उन्होंने गृहमंत्री अमित शाह पर आरोप लगाया कि शाहीन बाग के धरने और प्रदर्शन को वह खत्म नहीं करना चाहते हैं अगर हमेशा चाहे तो यह धरना प्रदर्शन आज ही खत्म हो सकता है.

अरविंद केजरीवाल के इस ट्वीट के बाद यह माना गया कि अब तक अपनी पिच पर बल्लेबाजी कर रहे हैं. अरविंद केजरीवाल बीजेपी की पिच पर खेलने आ गए हैं और यह इस वजह से हुआ है क्योंकि उग्र राष्ट्रवाद के मुद्दे ने आम आदमी पार्टी को बैकफुट पर ला दिया है.

प्रवेश वर्मा ने कहा केजरीवाल को आंतकवादी

इसके बाद तो मानो पूरी पार्टी सुर और एक लय में में बोलने लगी. दिल्ली से सांसद प्रवेश वर्मा तो सीमाएं ही लांग गए. उन्होंने अरविंद केजरीवाल को आतंकवादी कह दिया इसके बाद चुनाव आयोग ने प्रवेश वर्मा पर भी 92 घंटे तक प्रचार ना करने की पाबंदी लगा दी. साथ ही चुनाव आयोग ने अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को स्टार प्रचारकों की सूची से बाहर करने के आदेश भी दे दिए.

लेकिन अब तक शाहिनबाग वर्सेस राष्ट्रवाद का मुद्दा सर चढ़कर बोलने लगा था. अकाली दल जिससे 25 साल पुराना गठबंधन नागरिकता संशोधन कानून की वजह से टूट गया था उसने भी बीजेपी उम्मीदवारों का समर्थन करने का एलान कर दिया. अमित शाह की रणनीति अपने सहयोगी को यह समझाने में सफल रही कि दिल्ली का चुनाव एकतरफा नहीं है.

बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने की दिल्ली में सभा

इस बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ दिल्ली में दो दो सभाएं की. इन सभाओं में पूर्वांचली कार्ड को जमकर खेला गया. दिल्ली में पूर्वांचलियों की आबादी पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी है और पूर्वांचली वोटरों को लुभाने के लिए अरविंद केजरीवाल के पुराने बयान को मुद्दा बनाया गया. जिसमें अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि बिहारी 500 रुपये लेकर आता है और 5 लाख का इलाज मुफ्त करा कर चला जाता है.

अमित शाह की चौतरफा रणनीति काम कर रही थी मोदी सरकार के कामकाज, अरविंद केजरीवाल की नाकामियां, पूर्वांचलियों का अपमान और राष्ट्रवाद विरुद्ध शाहीन बाग जैसे मुद्दों ने बीजेपी के बुजुई उम्मीदों में रोशनी का दीपक जला दिया. उसका का डर और खड़ा हुआ.

बीजेपी के पिच पर खेलने के लिए मजबूर हुए केजरीवाल

इस सबके बीच बीजेपी राष्ट्रवाद की लहर पर सवार होकर दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की बराबरी में खड़ी हुई. अब तक दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और उनके फिर से मुख्यमंत्री बनने की चर्चा हो रही थी. अब शाहीन बाग का मुद्दा गरम हो गया और इस मुद्दे पर सभी पार्टियां बैकफुट पर चली गईं. राष्ट्रवाद का ज्वार इस कदर सर चढ़कर बोला कि अरविंद केजरीवाल को अपने हिंदू होने के प्रमाण देने पड़ गए. इसके लिए उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ भी करना शुरू कर दिया.

एबीपी न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में अरविंद केजरीवाल ने कहा कि वे रोज हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं उन्होंने हनुमान चालीसा पढ़ कर भी सुनाया. राजनीतिक पंडित मानते हैं कि हमेशा की रणनीति मुद्दों की समझ और मौके का इंतजार कर विरोधी पर पलटवार करने की क्षमता ने ही बीजेपी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से आम आदमी पार्टी की टक्कर में ला कर खड़ा कर दिया है. राजनीतिक पंडित यह भी कहते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे 11 फरवरी को पता चलेंगे लेकिन चुनाव कैसे लड़ा जाए यह अमित शाह और बीजेपी से सीखना चाहिए.

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