Explained: चौतरफा घिरे CEC ज्ञानेश कुमार, SC के जज, सहयोगी समेत इन लोगों ने अबतक लगाए गंभीर आरोप
जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बड़े पैमाने पर भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी और असंवैधानिक है.

भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस समय मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया, एकतरफ़ा निर्णय शैली और प्रशासनिक अनियमितताओं को लेकर चौतरफा आलोचनाओं, कानूनी चुनौतियों और विरोध-प्रदर्शनों का सामना कर रहे हैं. संवैधानिक संस्थाओं के भीतर से लेकर शीर्ष न्यायपालिका, पूर्व नौकरशाहों, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज तक, ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाने और उनके इस्तीफे की मांग करने वालों की सूची हर दिन के साथ लंबी होती जा रही है.
चुनाव आयोग के भीतर से विरोध
ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर सबसे पहला और सबसे गंभीर सवाल खुद भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर से उठा. इंडियन एक्सप्रेस ने खुलासा किया कि आंतरिक फाइलों में सामने आया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार ज्ञानेश कुमार के निर्णयों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं.
दोनों आयुक्तों को मतदाता डेटाबेस प्रबंधन, सॉफ्टवेयर बदलावों और फॉर्म-6 (नए मतदाताओं का पंजीकरण) की शर्तों में किए गए बदलावों जैसे महत्वपूर्ण परिचालन निर्णयों से दूर रखा गया. उन्होंने आरोप लगाया कि CEC ने बहु-सदस्यीय आयोग के बहुमत सिद्धांत का उल्लंघन कर एकतरफ़ा फैसले लिए और आयोग के आईटी सिस्टम का नियंत्रण केंद्रीयकृत कर दिया.
पूर्व उच्च नौकरशाहों और वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के आरोप
आर.के. सिंह जो पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और पूर्व IAS अधिकारी रहे हैं उन्होंने भी गंभीर सवाल उठाए. पूर्व गृह सचिव ने एक खुला पत्र जारी कर SIR प्रक्रिया के क्रियान्वयन में गंभीर "गैर-कानूनी कार्यों" का आरोप लगाया. उन्होंने मतदाता पंजीकरण फॉर्मों में बिना संवैधानिक अधिकार के जटिल शर्तें जोड़ने का विरोध किया जैसे युवा मतदाताओं से उनके माता-पिता के 2003 के वोटर रोल का विवरण मांगना. उन्होंने यह भी कहा कि मतदाताओं का नाम हटाने की प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के तय दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाई गईं. आर.के. सिंह ने विपक्षी दलों से अपील की कि जब तक CEC इस्तीफा नहीं देते, तब तक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं.
सर्वोच्च न्यायालय और न्यायिक हस्तियों की कड़ी टिप्पणियां
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां जो सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज हैं उन्होंने ताजा बयान दिया है. हैदराबाद में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और अनुच्छेद 326 पर व्याख्यान देते हुए जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बड़े पैमाने पर भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी और असंवैधानिक है. उन्होंने आगे कहा, "अनुच्छेद 326 से कोई भी अथॉरिटी छेड़छाड़ नहीं कर सकती; कोई अदालत इसे स्वीकार नहीं कर सकती और संविधान से ऊपर कोई नहीं है." उनकी इस टिप्पणी ने विपक्षी दलों को CEC के खिलाफ बड़ा नैतिक हथियार दिया है.
उनके अलावा राकेश कुमार सिंह का नाम है जो सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता हैं. इन्होंने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर CEC ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने, उनके द्वारा लिए गए 14 एकतरफा फैसलों की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराने और आयोग के बहुमत के बिना पारित आदेशों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की.
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए तर्क दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त खुद को सर्वोच्च नहीं मान सकते और न ही वे चुनाव आयोग के बहु-सदस्यीय संवैधानिक ढांचे को दरकिनार कर सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने भी इस पूरे मुद्दे को गंभीर माना है. उन्होंने भारत के चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि अगर नियुक्ति सरकार के हाथों में होगी तो स्वतंत्रता कैसे बचेगी. जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने आगे कहा, 'मुश्किल यह है कि अगर नियुक्ति मौजूदा सरकार के हाथ में हो तो हटाने की यह प्रक्रिया आजादी या निष्पक्षता में ज्यादा कुछ नहीं जोड़ती. यह पहली उलझन है जिसका हमें सामना करना पड़ता है. दूसरी बात, उनके साथ जो दो कमिश्नर होते हैं, उनकी नियुक्ति भी मौजूदा सरकार ही करती है और उन्हें सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त की सहमति से ही हटाया जा सकता है.'
राजनीतिक दल और विपक्षी नेतृत्व
कांग्रेस पार्टी ने ज्ञानेश कुमार पर सत्ताधारी दल के हित में काम करने और लोकतांत्रिक संस्था की स्वायत्तता को समाप्त करने का सीधा आरोप लगाया. जस्टिस भुइयां के बयानों के बाद जयराम रमेश ने कहा कि ज्ञानेश कुमार अब अपने पद पर बने रहने का नैतिक और संवैधानिक अधिकार पूरी तरह खो चुके हैं.
विपक्षी दलों के संयुक्त मंच ने आरोप लगाया कि देश भर में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटने, पारदर्शिता के बिना सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम बदलने और एकतरफा तरीके से वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण करने के पीछे CEC की प्रशासनिक दुर्भावना है. विपक्षी दलों द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने पर भी विचार किया गया.
नागरिक समाज और एक्टिविस्ट समूह
CJP और छात्र संघों का प्रदर्शन; विभिन्न नागरिक अधिकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेफ्ट छात्र संगठनों ने लगातार प्रदर्शन कर इस मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त पर दवाब बनाया है. मुंबई, दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन शुरू किए हैं.
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मुंबई में कॉकरोच जनता पार्टी ने प्रदर्शन किया और सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा, "अगर गांधी इस देश की आत्मा हैं, तो आंबेडकर इस देश की रीढ़ हैं. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और नेहरू ने हमें वोट देने का अधिकार दिया मुख्य चुनाव आयुक्त को इस्तीफा देना चाहिए."
इन सभी का मानना है कि मतदाता सूची में बिना जांच-परख के किए गए संशोधनों से लाखों वास्तविक नागरिक मताधिकार से वंचित हो रहे हैं, जो भारतीय लोकतंत्र की नींव पर हमला है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस समय चुनाव आयोग के आंतरिक तंत्र, न्यायपालिका, पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक गलियारों की तरफ से अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं.





















